इस समय नागपुर का मौसम

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

आभार समूची सृष्टि का


पूर्णता की ओर अग्रसर पुस्तक संतुलन का सच के पहले पृष्ठ की कविता-

Aksa Beach, Mumbai


उसमें भी मैं था
मुझमें भी मैं था
चीख भी मेरी थी
दर्द भी मेरा था
तूफान भी मेरा था
आनंद भी मेरा था
उसमें भी भगवान थे
मुझमें भी भगवान थे
सब कुछ सहज था
कायनात का साथ था
समंदर का किनारा था
बस उसका ही सहारा था
तन में अगन पर लय था
मन भी मगन, लय में था
मुझमें वो थी या उसमें मैं था
सच में समझना कठिन था
दोनों में समर्पण था
मन एक, तन भी एक था
समंदर की दूर उठती
लहरें भी बेचैन थीं
जल्दी आना चाहतीं
पर नियमों में आबद्ध थीं
उसकी अपनी प्रक्रिया थी
हमारी अपनी प्रक्रिया थी
मगर समा खामोश था
सबमें अपना जोश था
दूर दिखती बड़ी लहर
पास आती छोटी लहर
समंदर का मधुर कंठ था
कर्णप्रिय गीत-संगीत था
न स्पीकर का शोर था
न डीजे का उन्माद था
प्रकृति का यह सृजन था
नए सृजन का आगाज था
सांसों का ज्वार-भाटा था
वहां भी समंदर का गीत था
सबकुछ स्वचालित था
स्वानुभूत, स्वाभाविक था
समंदर विशाल था
अनंत था, शून्य था
शायद यही सत्य था
शाश्वत था सनातन था
संतुलन की पुस्तक
पूर्णता चाहती थी
मुझे मिलन का तत्व
समझाना चाहती थी
यह पूर्णता की प्रयोगशाला थी
संपूर्ण जीवन की पाठशाला थी
मैं छात्र, मेरी जान छात्रा थी
कायनात हमारी मार्गदर्शक थी
जिंदगी का एक और सफर पूरा हुआ
नए सफर का आधार पुख्ता हुआ
यही संतुलन का नियम है
सृष्टि के संचालन का सच है
नतमस्तक हूं, आभारी हूं मैं सबका
गुड़िया का, सृष्टि की हर रचना का 
समूची सृष्टि का
सृष्टि के नियंता का।।

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

जन्मदिन आना अच्छा लगा


कल सुबह 7 बजे मैं 46 साल का हो जाउंगा। इन वर्षों में जब से मुझमें समथिंग डिफरेंट का भाव प्रबल हुआ है, तब से मैंने जन्मदिन नितांत निजी क्षणों में जीते हुए ही मनाया है। यानी यह दिन किसी के साथ नहीं मनाया। इस बार लगता है मैं यह दिन सबके साथ मनाऊं।
पिछला एक साल मेरी जिंदगी में क्रांतिकारी वैचारिक परिवर्तन का रहा। प्रखर समाजवादी विचारक व लोहियाजी के निकटस्थ पं. अध्यात्म त्रिपाठी पर पुस्तक समाजवादी अध्यात्म त्रिपाठीः कुछ संस्मरण के प्रकाशन की सफलता के बाद परिवर्तन की प्रक्रिया दिखनी शुरू हो गयी। इसमें मेरे लिए सबसे बड़ा परिवर्तन था, सद्चरित्र की दृढ़ता का अध्ययन। खैर, इसी दौर में अध्यात्म के गूढ़ ज्ञान की ओर झुकाव बढ़ा। खुशी इस बात की होती है कि जहां-जहां जिस प्रकार के ज्ञान की जरूरत हो रही है, वह स्वमेव उपलब्ध होता जा रहा है। मगर कभी-कभी खीज इस बात की होती है कि जिन्दगी के इतने साल सिर्फ नींव मजबूत होने में ही निकल गए। इन सालों में सिर्फ जिज्ञासा की नींव ही पक्की हुई। उस पर इमारत बननी तो दूर मुझे एक ईंट भी नजर नहीं आ रही है।
पत्रकारिता में खुद को तुर्रमखां समझने के बाद अब जब किसी विषय पर चिंतन करता हूं तो पता चलता है मुझे तो सिर्फ सतही ज्ञान था। या फिर पत्रकारिता के लिए जरूरी जानकारी ही मेरे पास थी।
खैर, हर परिवर्तन को एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। दरअसल, परिवर्तन जैसा कुछ होता नहीं है। जिंदगी में वे परिवर्तन भी, जो इन आंखों से देखे नहीं जा सकते, सिर्फ महसूस किए जा सकते हैं, एक प्रक्रिया के तहत होते हैं। इसलिए किसी काल विशेष में परिवर्तन होने की बात कहना गलत है। लेकिन कुछ समय ऐसे होते हैं जब वे दिखने लगते हैं। पिछले एक साल में परिवर्तन की इस प्रक्रिया का प्रभाव दिखने लगा।

अब तक के जीवन के ४६ वर्षों में हुई हर घटना, अच्छी हो या बुरी, विवेकी हो या अविवेकी, उचित हो या अनुचित सभी के लिए मैं आज स्वयं को भाग्यशाली समझ रहा हूं। प्रकृति के, ईश्वर के इस खेल के प्रति कृतज्ञता महसूस कर रहा हूं। क्योंकि अब समझ में आ रहा है कि ये समूची घटनाएं, दृष्टांत एक प्रक्रिया के अंग थे जो उस परिवर्तन के थे, जिसका साक्षात्कार का आज मैं कर रहा हूं और भविष्य में करुंगा।

इसलिए अब मैं जन्मदिन आप सभी के बांट रहा हूं। इसलिए क्योंकि गत एक वर्ष ने मेरे जीवन में अच्छे-बुरे अनुभवों, ज्ञान, इंद्रीय भोगों के जरिये मुझे वैचारिक, शारीरिक संतुलन के ज्यादा निकट लाया है। यही प्रक्रिया प्रकृति में भी होती है। कुछ दिखती हैं, कुछ नहीं दिखती हैं। जो हमें नहीं दिखती हैं, वे उन्हें दिखती हैं, जिनके पास उन्हें देखने की जिज्ञासा होती है। प्रकृति के संतुलन के चक्र ने मुझे सिखाया है कि जीवन में अच्छी और बुरी हर घटना का स्वागत करना चाहिए, तभी संतुलन का पाठ पढ़ा जा सकेगा। और संतुलन की प्रकृति का उद्देश्य है इसीलिए परिवर्तन को प्रकृति की नियति माना गया है। मेरे अराध्य दादाजी, गुरु तत्व में स्थिर मेरे दादा सदा इसी प्रकार मेरा मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे, इसका मुझे पूरा विश्वास है।

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

ये लोकतंत्र की लहर है भाई


वाह! जिन मूल्यों की स्थापना के लिए दुनिया के तमाम संतों, समाज सुधारकों ने अपना जीवन लगा दिया, उसे संतुलन के नियम ने हमारे देश में एक झटके में कर दिया। ठीक उसी तरह जैसे प्रकृति ने २४ घंटे में ही केदारनाथ धाम को साफ कर दिया था। जहां नाथ बच गए और धाम गायब हो गया। आइये उक्त दो पंक्तियों की सिलसिलेवार व्याख्या करते हैं।

भारत ने राजशाही शासन प्रणाली में ही अपना विकास किया है। देशी-विदेशी कई राजाओं का शासन हमने देखा है। कई राजा जनाभिमुख भी रहे हैं। रामराज्य की संकल्पना या फिर अस्तित्व, जो भी हो मगर यह शासन प्रणाली पूरी तरह जनाभिमुख थी जिसमें जनता सर्वोपरि है। परन्तु ऐसी कोई शासन प्रणाली जो जनता द्वारा जनता के लिए शासित हो, वो लोकतंत्र है। हमें अमेरिका का शुक्रगुजार होना चाहिए जिसने लोकतंत्र की अवधारणा के प्रति समूची दुनिया में विश्वास पैदा किया। आज का मुद्दा भारतीय लोकतंत्र का है।

हमारे देश के लोकतंत्र को तीन आधार स्तंभों पर खड़ा किया गया है- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। चौथा स्तंभ माना जाता है मीडिया। दरअसल, माना जाता है कहना गलत है। कहना चाहिए कि मानना पड़ा है। यानी तीन घोषित स्तंभों के बीच यह स्वनिर्मित चौथा स्तंभ अपने आप विकसित हो गया। यह तब-तब अधिक मजबूत हुआ है, जब-जब अन्य तीन स्तंभों में असंतुलन हुआ है। या किसी भी स्तंभ ने असंतुलित, अमर्यादित व्यवहार किया है। वो भारत की आजादी हो, विभाजन हो, लोहिया की असंतुलित समाजवादी अवधारणा हो, इंदिरा गांधी की इमरजेंसी हो, जयप्रकाश नारायण की अगुवाई वाला आंदोलन हो, गैर कांग्रेसी सरकारों की शुरुआत हो, मुक्त अर्थव्यवस्था व पूंजीवाद की ओर प्रस्थान हो, अटलजी-मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री बनना हो और अब आम आदमी पार्टी का अनायास ही उभर जाना हो..., हर समय संतुलन के नियम ने अपना रंग दिखाया है।

संतुलन का नियम

समूचा ब्रह्मांड संतुलन के नियम पर कार्य करता है। यह नियम इस ब्रह्मांड के हर जीव-निर्जीव अस्तित्व पर लागू होता है। इसके नियम तय हैं जिनमें थोड़ा भी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। यह नियम शाश्वत है, अकाट्य है, ब्रह्मांड की रचना का आधार है और यही सत्य है। हमारे शरीर की संरचना से लेकर उसके विकास तक, हर जगह संतुलन का नियम ही कार्य करता है। फिर समाज तंत्र, राष्ट्रतंत्र और विश्वतंत्र इससे अछूता कैसे रह सकता है? संतुलन एक प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया को समझाने के लिए न्यूटन ने क्रिया के बराबर विपरीत प्रतिक्रिया का नियम सामने रखा। चूंकि यह नियम जड़ नहीं है इसलिए जड़ बुद्धि की समझ से परे है। जब-जब असंतुलन बढ़ता है, यह दिखने लगता है। जैसे प्राकृतिक आपदा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि असंतुलन हुआ है, उसी प्रकार वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य हमें बता रहा है कि असंतुलन ने अपनी हदें पार कर दी हैं। भ्रष्टाचार तो उसका एक छोटा सा अंग है, दरअसल यह मामला एक राजनीतिक तंत्र लोकतंत्र की स्थापना का है।

खेल जारी है

दिल्ली चुनाव नतीजों पर सतही प्रतिक्रिया व्यक्त करने वालों को शायद केदारनाथ धाम के जलमग्न होने जैसी किसी प्राकृतिक आपदा का भान नहीं है। आम आदमी पार्टी सहित देश के समस्त राजनीतिक दलों को संतुलन का यह खेल समझना होगा। नहीं समझेंगे तो भी संतुलन का नियम काम करेगा। समझना इसलिए जरूरी है ताकि संतुलन का नियम अपनी स्वाभाविक स्थिति येन-केन-प्रकारेण पर उतारू न हो जाए। दिल्ली में कांग्रेस का सफाया और आम आदमी पार्टी की धमाकेदार इंट्री इसी येन-केन-प्रकारेण का एक उदाहरण है। एक बात ध्यान रखने की है कि संतुलन की प्रक्रिया स्वाभाविक व सहज होती है। इसमें असहजता की कोई गुंजाइश नहीं है। मजे की बात यह है कि इस संतुलन की प्रक्रिया में जो असहज होता है, वह भी सहजता से किनारे हो जाता है।
यह पार्टी नहीं आंदोलन हैइसी कारण आम आदमी पार्टी के अभ्युदय को मैं सिर्फ चुनाव लड़ने या शासक बनने का हथियार नहीं मानता, क्योंकि यह एक आंदोलन है। आंदोलन है लोकतंत्र की स्थापना का। अन्ना हजारे के दिल्ली के पहले आंदोलन के समय भी मैंने कहा था कि अब यह आंदोलन नहीं थमेगा, इसमें कोई रहे या न रहे।..... अब चूंकि यह एक प्रक्रिया है एक बदलाव की तो माना जाना चाहिए कि आप की संपूर्ण टीम इसका एक हिस्सा है। प्रक्रिया है संतुलन की।

प्रचारतंत्र की मुखरता

आजादी के बाद काफी साल तक विधायिका लोकतंत्र पर हावी रही। जब वो भ्रष्ट यानी असंतुलित हुई यानी जब जन-नेता यह भूल गए कि वे लोकतंत्र के पहरी मात्र हैं तो कार्यपालिका हावी हो गई। असंतुलन फिर हुआ, अफसर भ्रष्ट हो गए। आईएएस लौबी खुद को देश का भगवान समझने लगी तो संतुलन के नियम ने फिर खेल दिखाया और न्यायपालिका ने मोर्चा संभाल लिया। कई ऐतिहासिक निर्णयों ने कथित जन-प्रतिनिधियों और अफसरों को जेल का रास्ता दिखा दिया। न्यायपालिका ने संसद को भी यह बताया कि उसे कानून बनाते समय किन मापदंडों का ध्यान रखना चाहिए। तमाम विवादों के बावजूद न्याय पालिका अब तक असंतुलित नहीं हुई है। संतुलन की इन सभी प्रक्रियाओं के बीच प्रचारतंत्र यानी मीडिया ने अपना खेल बखूबी खेला है। जिधर दम, उधर हम की उसकी नीति एक तरह से हमारे देश के लिए फायदेमंद ही रही है। आज प्रचारतंत्र हावी दिख रहा है।

समूची व्यवस्था को यह समझना होगा कि प्रचारतंत्र हमारे देश की समग्र लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक हिस्सा है। यह आधारभूत साधनों में से एक है। यह साध्य नहीं है। साध्य है लोकतंत्र। एक ऐसा शासन जो जनता द्वारा जनता के लिए संचालित हो। एक ऐसी व्यवस्था जिसकी मूल आत्मा ही जनाभिमुख है।

आश्चर्यजनक किन्तु सत्य

समसामायिक परिस्थिति के तटस्थ विश्लेषक के रूप में जब मैंने आम आदमी पार्टी के तौरतरीकों पर गहराई से विचार किया तो अवाक् रह गया। हमारे देश में एक ऐसी पार्टी सहजता से पैदा हो गयी है जहां न धर्म की बाद है, न जाति की..., जहां न पंथ की बात है, न दर्शन की..., जहां न भाषा की बात है, न क्षेत्र की..., इतना ही नहीं यहां पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद जैसे किसी राजनीतिक वाद की भी चर्चा नहीं है। यानी निर्विवाद...। यहां सिर्फ एक ही वाद है और वो है जनता-वाद। जन-वाद ही मानवता-वाद की शुरुआत है जहां समता, समानता के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता, वह स्वमेव अस्तित्व में आ जाता है। संतुलन की यह प्रक्रिया स्वमेव है, स्वनिर्मित है। इसका अपना विधान है। इसका अपना तंत्र है। इसकी चरम स्थित वसुधैव कुटुंबकम् की है। चरैवेति, चरैवेति यानी चलते रहो... चलते रहो... उस राह जहां ले जा रहा है ये संतुलन का नियम, कुछ मीठे, कुछ कड़वे प्रसंगों को हमारे लिए छोड़े। मगर इसकी परिणति अच्छी है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चत् दुःख भाग्भवेत।।



मंगलवार, 26 नवंबर 2013

27 से अपूर्व विज्ञान मेला- 2013, तैयारियां पूर्ण


विज्ञान मेला के पूर्व स्कूली विद्यार्थियों को इन प्रयोगों का प्रशिक्षण दिया गया।




नागपुर, 26 नवंबर, 2013

असोसिएशन फॉर रिसर्च एंड ट्रेनिंग इन बेसिक साइंस एजुकेशन व नागपुर महानगर पालिका के संयुक्त तत्वावधान में 27 नवंबर से 1 दिसंबर तक अपूर्व विज्ञान मेला 2013 का आयोजन किया जा रहा है। उद्घाटन 27 नवंबर को दोपहर 12 बजे राष्ट्रभाषा भवन परिसर में होगा। उद्घाटन के लिए एनसीएसटीसी व विज्ञान प्रसार, भारत सरकार के पूर्व प्रमुख अनुज सिन्हा विशेष रूप से नई दिल्ली से आ रहे हैं। इस अवसर पर महापौर अनिल सोले, मनपा आयुक्त श्याम वर्धने, स्थायी समिति सभापति अविनाश ठाकरे उपस्थित रहेंगे। मेले का यह 16वां वर्ष है।

राष्ट्रभाषा भवन परिसर के निसर्गरम्य वातावरण में विज्ञान मेला की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। मेले में एसोसिएशन के विशेषज्ञों द्वारा विकसित 100 प्रयोगों का प्रदर्शन किया जाएगा। मेले का उद्देश्य छात्रों के मन से विज्ञान का डर दूर कर, खेल-खेल में विज्ञान सीखना है। इन प्रयोगों में इस बात का ध्यान रखा गया कि इन्हें समझते हुए बच्चों को आनन्द आए और उनकी सोच को बहुआयामी क्षितिज मिल सके। बेसिक साइंस का सिद्धांत ही यही है कि बच्चों में सोच की आदत विकसित हो। ये सभी प्रयोग कक्षा 6 से 10 तक के पाठ्यक्रमों पर आधारित हैं व विज्ञान के नियमों को समझने में मदद करते हैं। घरों में आसानी से उपलब्ध वस्तुओं से निर्मित, विज्ञान के सरल, रोचक और कम खर्चीले वस्तुओं से इन प्रयोगों को निर्मित किया गया है, जिसे प्रेक्षकों को समझाने के लिए मनपा शालाओं के 200 विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया गया है।

सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

नवरात्रि पर नारी शक्ति के सम्मान का संकल्प लें








श्री भय्यूजी महाराज




 हमारी संस्कृति नारी के अन्दर की संस्कृति है। पुरूषों के बराबर उसे आदर सम्मान दिया जाता है परंतु मध्यकाल में परिस्थितियों के कारण नारी के प्रति आदरभाव को लोग भूल गए और उस पर अत्याचार करने लगे। यह अत्याचार आज भी हमें दिखायी देते है। नारी के प्रति सम्मान रखने के लिए हमे अपने घर परिवार से शुरूवात करनी पड़ेगी।
मातृशक्ति की आराधना के लिए हमे वर्ष नौ दिन विशेष दिए हैं। यह नारी शक्ति के आदर और सम्मान का उत्सव है। यह उत्सव नारी को अपने स्वाभिमान अपनी शक्ति की स्मरण दिलाता है। साथ ही समाज के अन्य पुरोधाओं का भी नारी शक्ति का सम्मान करने क लिए प्रेरित करता हैं आज हम देखे तो पाते हैं कि नारी जितनी अधिक आगे बढ़ रही स्थान-स्थान पर उसे गुलाम बनाकर रखने का आकर्षण भी बढ़ रहा है। उसे बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। नारी के प्रति संवेदनाओं में विस्तार होना चाहिए। जिस तरह हम नवरात्रि में मातृशक्ति के अनेक स्वरूपों का पूजन करते है, उनका स्मरण करते है। उसी प्रकार नारी के गुणों का हम सम्मान करें। हमारे घर में रहने वाली माता, पत्नी, बेटी, बहन इन सब में हम गुण ढूंढे। एक नारी में जितनी इच्छाशक्ति दृढ़ता के साथ होती है, वह पुरूष में शायद ही होती है।
आज नारी जाति अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण ही घर और बाहर ऑफिस हो या सामाजिक कार्य क्षेत्र में स्वयं को स्थापित कर रही है। दोहरी भूमिका लिये वह दोनों ही स्थितियों का बेहतर निर्वाह करती है। कन्या का विवाह के पश्चात् अहंकार भाव खत्म हो जाता है। पति के नाम से वह जानी जाती है। पति के कार्यों को पति के परिवार का ध्यान। पति के परिवार में यथोचित सम्मान देना। अपनी भावनाओं को एक तरफ रखकर त्याग, समर्पण से कार्य करना है। उसका उद्देश्य होता है स्त्री का जीवन परिवार के लिए एक तपस्या एक तप जो निष्काम भाव से किया जाता है।
प्रत्येक घर में संघर्षों अग्नि में तपने वाले को शीतलता प्रदान करने वाली नारी होती है। वह अपने ज्ञान संघर्ष और कर्म से परिवार के सदस्यों को कार्यों के लिए प्रेरित करती रहती है। विवाह का अवसर हो या घर में कोई कष्ट में हो। स्त्री जितनी भावुकता से उस समय को पहचानती है उतना पुरूष नहीं समझ पाता।
नारी का सबसे बड़ा जो गुण उसे भगवान ने प्रदान किया है वह मातृत्व। एक माँ अपने बच्चे के लालन-पालन और उसके अस्तित्व निर्माण में अपने पूरे जीवन की आहुति देती है। मातृत्व से ही वह अपनी संतानों में संस्कारों का बीजारोपण करती है। यह मातृत्व भाव ही व्यक्ति के अन्दर पहंुॅचाकर दया, करूणा, प्रेम आदि गुणों को जन्म देती है।
नारी के आभामण्डल से घर पवित्र होता है। आप जब बाहर से थककर आते है तो बेटी, पत्नी या माँ एक ग्लास पानी लेकर आपके सामने खड़ी होती है और आप से पूछती है आज ज्यादा थक गये हो क्या? इस एक प्रेम भरी दृष्टि से सारी थकान उतर जाती है। नारी की ऊर्जा से ही संपूर्ण परिवार ऊर्जावान होता हैं भाई, बहन के प्यार में ऊर्जा पति पत्नी के प्रेम में ऊर्जा एक पुत्र अपनी मांॅ के व्यवहार में ऊर्जा प्राप्त कर जीवन जीने का संकल्प करता है। घर के चाहर दीवारी में प्रकाश की तरंगे उसके कारण व्याप्त होती है जिस घर में नारी नहीं होती वह घर निस्तेज प्रतीत होता है।
घर की प्रत्येक वस्तु को यथावत रखने का कार्य नारी ही करती है। चाहे वह भोजन सामग्री से सम्बन्धित हो, चाहे वह घर आंगन में सजी रंगोली से लेकर घर की दीवारों की कलात्मक वस्तुओं का रखरखाव। साथ ही घर आंगन से लेकर स्वच्छता पवित्रता। वाणी में मधुरता सब नारी के गुण है जिससे संपूर्ण घर का वातावरण मधुर बनता है। खासकर बेटियों से लेकर घर की मर्यादा, मधुरता, प्रेम और बढ़ता है। घर में बेटियाँ जितना अधिक माता-पिता के मनोभावों को समझती है, जितना अधिक वह पिता के कार्यों में सहयोग करती है,  उतना पुत्र नहीं करता। बेटियां विवाह के बाद अपने पति के यहाँ जाती है तब भी उन्हें अधिक चिंता अपने  माता-पिता की लगी रहती है।
पुत्री के रूप में स्नेह प्रेम प्रदान करके। माता-पिता के हृदय में वह करूणा भाव को ही जागृत करती है।
भारतीय नारी पुरातन काल में ऋषियां हुआ करती थी। ऐसी अनेक नारियां है जिनके ज्ञान तपस्या से तीनों लोक प्रभावित होते थे। ऋषि पत्नियांॅ भी ऋषियों के साथ-साथ तप में लीन रहती थी। वह सतयुग था उसके पश्चात कलयुग में भी नारी शक्तियों ने संस्कृति की रक्षा के लिए अपनी वीरता दिखाई। अनेक वीरांगनाएं इस देश की माटी पर जन्मी है। उनकी प्रेरणा और संकल्पों से परिवार और समाज को समय-समय पर ऊर्जा प्राप्त हुई है। अध्यात्मिक, सामाजिक राजनैतिक सभी स्तर पर नारी शक्ति द्वारा आज भी शंखनाद किया जा रहा हैं। बड़े-बड़े पदों पर नारियाँ अपनी विद्वता से देश को दिशा दे रही है। यह नवरात्रि पर्व उनके सम्मान का पर्व है। शक्ति ही हमें मुक्ति, भक्ति दोनों प्रदान करती है। हम उपासना के साथ नारियों के सम्मान का संकल्प लें।

शनिवार, 14 सितंबर 2013

माँ तुझे सलाम


हिन्दी दिवस पर मैं समस्त मातृशक्ति का वंदन करता हूं। क्योंकि हिन्दी हमारी भाषा है, हमारी माँ है। देश की सर्वस्वीकार्य भाषा है। एक विनती है कि हिन्दी के लिए राजभाषा शब्द का इस्तेमाल न करें. यह राष्ट्रभाषा थी, है और रहेगी। विदेशी मानसिकता के गुलामों ने इसे राजभाषा बनाकर हमारी मातृशक्ति के साथ खिलवाड़ किया है। राजभाषा शब्द में षड़यंत्र का जहर है। भारत विश्व का अकेला ऐसा राष्ट्र है जिसकी अपनी राष्ट्रभाषा नहीं है। उन्नत देशों की कतार में खड़ा भारत विश्व का अकेला ऐसा राष्ट्र है जिसे अंग्रेजी में ही समृद्धि दिखाई देती है। यह दुखद है कि हमें अपनी मां से अच्छी दूसरों की माताएं लगती हैं। अपने देश से बेहतर दूसरे देश लगते हैं। अपनी भाषा से अच्छी दूसरे देशों की भाषा लगती है। देश की अन्य भाषाएं मराठी, तेलुगू, तमिल, कन्नड़, मलयाली, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, भोजपुरी, मारवाड़ी आदि-आदि हमें दोय्यम दर्जे की लगती हैं। हमें अपने देश की भाषाएं सीखने की अपेक्षा विदेशी भाषाएं सीखना ज्यादा जरूरी लगता है।
अंग्रेजी भाषा से नफरत नहीं है। क्योंकि वह भी कहीं की भाषा है और माता कभी कुमाता नहीं होती। हंसी आती है उन बुद्धिजीवियों पर जो अंग्रेजी या विदेशी मानसिकता से ग्रस्त हैं। ये न तो खुद स्वाभिमानी जीवन जी सकते हैं और न ही किसी को जीने देंगे। भारत को आर्थिक और मानसिक गुलामी के अंधेरे कुएं में ढकेलने का अमेरिकी षड़यंत्र अब तेज हो गया है। यूएन, आईएमएफ, डब्ल्यूएचओ के नाम पर भारत सहित समूचे एशिया महाद्वीप को अंग्रेजी का लती, गुलाम (नशा की तरह) बनाने का कुचक्र है। इसलिए अब हमें स्वाभिमान जगाना जरूरी है।
दोस्तो, छोटा सा दान
सभी को करना है
हिन्दी या अपनी मातृभाषा
को अपनाना है
हमें अपने देश का
स्वाभिमान जगाना है
गुलामों की गुलामी से
आजादी पाना है।
।जय हिन्द, जय भारत। वन्देमातरम्।

सोमवार, 22 जुलाई 2013

ईश्वरीय “करिश्मा” का अद्भुत संसार- एक शाम मूक प्राणियों के नाम



 
karishma Galani with dogs


अध्यात्म की ओर बढ़ चुके रूझान ने कहीं न कहीं प्रकृति से नजदीकी बढ़ा दी है। यही कारण है प्रकृति की हर लीला, हर रचना को समझने की स्वाभाविक सी प्रक्रिया शुरू हो गई है। ब्रह्मांड के आकर्षण का नियम ही यह है कि जब जो विचार बलवती होते हैं, ब्रह्मांड या ईश्वर की तमाम नियामतें उससे संबंधित वाकयातों को आपकी ओर आकर्षित होने लगते हैं। कारण जो भी हो परन्तु गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या प्रकृति के बेहद करीब पहुंच गया। लगभग पाँच घंटे कैसे गुजर गए पता ही नहीं चला। हरियाली से ओत-प्रोत इस स्थान पर नागपुर शहर में घायल, बीमार, मरणासन्न अवस्था के पशु-पक्षियों की चिकित्सा, उनका पुनर्वसन होता है।
संयोग भी अजीब था। कुछ हफ्ते पहले पशुप्रेमी देश की जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती मेनका गांधी नागपुर आई थीं। मुझे भी इसकी जानकारी थी। उस समय मुझे पता चला कि नागपुर में भी प्राणियों के कल्याण के लिए काम हो रहा है। और नागपुर में इस काम का बीड़ा उठाया हुआ है करिश्मा गलानी जी ने। खैर, मेनका जी तो आकर चली गईं परन्तु मन में बात रह गई कि ये लोग क्या करते हैं, कैसे करते हैं, इसे देखने का मौका तो मिले। अदृश्य में ही परन्तु प्रकृति का काम तो जारी था। परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि करिश्मा जी से सम्पर्क हुआ। लगा नहीं कि पहले कभी नहीं मिले। विचारों का आदान-प्रदान हुआ। उनके काफी फोटोग्राफ्स देखे। उनके अनुभव सुने तो ईश्वर, ब्रह्मांड, प्रकृति के प्रति शरणागति और बढ़ गई। एक बात और समझ में आ गई कि करिश्मा जी काफी व्यस्त हैं। इनसे वैचारिक आदान-प्रदान करने के लिए समय निकालना कठिन है। खैर, ईश्वर ने यह परेशानी भी हल कर दी जब मुझे पता चला कि करिश्मा जी हर शनिवार, रविवार को पशु-पक्षियों के लिए भांडेवाड़ी में बने शेल्टर में जाती हैं और कई घंटे वहीं बिताती हैं।
तय हुआ कि मैं उनके साथ ही शेल्टर पर जाउंगा। मैं उनके घर पहुंचा। वो आईं और गाड़ी में हमारा सफर शुरू हुआ। करिश्मा जी के लिए तो यह समर्पित सेवा का अंग था, मगर उस समय मेरे लिए किसी रोमांचकारी यात्रा का आगाज़ मात्र था। गाड़ी में बैठते ही उन्होंने पहले तो कहा कि सामने बेकरी है, वहाँ गाड़ी रोकियेगा। मैंने बेकरी के सामने गाड़ी रोकी। वो बेकरी में गईं तब तक मैंने चाय-पान का कार्यक्रम निपटा दिया। जब वो आईं तो मैंने देखा उनके हाथ में टोस्ट से भरी एक बड़ी सी थैली है। उन्होंने बताया कि वो जब भी शेल्टर में जाती हैं, टोस्ट लेकर जाती हैं। खैर, जैसे ही वहाँ से गाड़ी शुरू किया, उन्होंने कहा कि एक कोयल घायल है, बैद्यनाथ चौक चलिए। मैंने आज्ञाकारी चालक की तरह गाड़ी बैद्यनाथ चौक पर निर्धारित गंतव्य की ओर ले चला। वहाँ पहुंचे तो पता चला कोयल गायब है। अब मैडम का पारा चढ़ने लगा। जैसे वो कोयल उनकी अपनी हो। चाय दुकान में खड़े दो-तीन लोगों को उन्होने कोयल को खोजने के काम पर लगा दिया। उनकी बेचैनी देखकर मुझसे भी नहीं रहा गया और मैं भी वहाँ कोयल को खोजने लगा। कोयल तो नहीं मिली मगर उन पाँच मिनटों में मैंने गौर से उनके चेहरे पर कोयल के लिए बेचैनी के जो भाव देखे तो समझ में आ गया कि मूक पशु-पक्षियों के लिए उनका ममत्व किस तरह छलकता है। वहाँ से भांडेवाड़ी की यात्रा शुरू हुई। किसी का फोन आता रहा, शेल्टर का पता पूछने के लिए और वो बताती रहीं। मैंने सोच लिया था कि थोड़ा भी ज्ञान नहीं बाँटना है। बस, खामोशी से देखना, सुनना है। उस समय यह सब लिखने की भी कोई योजना नहीं थी। मैं तो सिर्फ प्रकृति की नियामतें देखना और उसके निरालेपन को हृदय की गहराइयों से महसूस करना चाहता था।
रास्ते में उन्होंने मुझे प्राणियों से संबंधित कानूनों की जानकारी दी। बाम्बे हाईकोर्ट के सराहनीय प्रयासों के संबंध में बताया। कुछ ही देर में हम भांडेवाड़ी स्थित शेल्टर में पहुंच गये। करिश्मा जी गाड़ी से उतर कर जैसे ही गेट से अंदर गईं, ८-१० श्वानों ने उन्हें घेर लिया और पूरे मटकते हुए, नाज-नखरों के साथ उनकी अगवानी की। वहाँ एक युवक-युवति पहले से मौजूद थे। केयर टेकर लता उनके पति राजेश भी उपस्थित थे। मैंने ध्यान दिया कि करिश्मा जी टोस्ट की थैली अपने हाथ में पकड़ी थीं, मगर किसी भी श्वान ने उस पर अपनी नीयत खराब नहीं की। ये श्वान ऐसे भी नहीं थे जिन्हें बचपन से ट्रेनिंग दी गई हो। ये तो गलियों में रहने वाले श्वान थे, जिन्हें घायल या बीमारी की अवस्था में यहाँ लाया गया था। मैंने करिश्मा जी के साथ पूरा शेल्टर घूमा। आईसीयू (गहन चिकित्सा कक्ष) भी देखा। मैं सिर्फ देखता रहा। और करिश्मा जी मुझे बताती भी रहीं और वहाँ सेवा कार्य भी करती रहीं। एक कोने में घोड़ा और खच्चर खड़े थे। मुर्गियाँ थीं। कुत्ते थे। करिश्मा जी हर प्राणी के पास जातीं, खासकर कुत्तों की तो जैसे पूरी कुंडली ही उनके पास थी। हर किसी को व्यक्तिगत नाम से पुकार कर उनसे बात करती थीं। इनमें चार ऐसे श्वान थे जो लगातार करिश्मा जी के साथ रहते थे। जैसे पेट्रोलिंग कर रहे हों। बीमार कुत्ते को लाये युवक-युवति भी साथ थे। बातें होती रहीं। करिश्मा जी उन्हें प्राणियों के लिए कुछ करने के लिए प्रोत्साहित करती रहीं।
इनके जाने के बाद एक ११वीं की छात्रा मुस्कान जैन अपनी माँ के साथ आ पहुंची। पता चला कि उसने एक बीमार पपी (शिशु श्वान) को रास्ते से उटाकर घर लाया था। डाक्टर से इलाज कराने के बाद इस शिशु को इस शेल्टर में छोड़ गए थे। वैसे डाक्टर ने बता दिया था कि यह शिशु नहीं बचेगा। बात सही साबित हुई, उस शिशु की मृत्यु हो गई थी। मुस्कान के चेहरे की मुस्कान गायब थी। आंखों से अविरल अश्रु धाराएं प्रवाहित थीं। मैंने भी इधर-उधर की बातें कर मुस्कान का ध्यान बंटाया। मैं तो आश्चर्यचकित था कि एक सड़क पर मिले पपी के लिए इतनी संवेदना? इतना प्यार? इतनी संवेदना तो हमें अपने बुजुर्ग माँ-बाप के लिए नहीं होती।
अब तक सूरज ढल चुका था। मुस्कान अपनी माँ के साथ चली गई। करिश्मा जी फिर से घायल श्वानों की मरहमपट्टी में व्यस्त हो गईं। कौन दुवला है, कौन कैसा दिख रहा है, कौन किस एरिया से लाया गया है.... सबका नाम लेकर करिश्मा जी केयरटेकर लता को आवश्यक निर्देश देती रहीं।
सूरज ढलते ही अवतरण हुआ केसरवानी जी का। एक बड़ा सा थैला लेकर आए थे। पता चला ये हर रविवार को जानवरों के लिए दूध लेकर आते हैं। मुझे लगा कि कमाई अच्छी होगी तो ले आते हैं। कौतुहलवश मैंने करिश्मा जी से पूछ ही लिया। उन्होंने बताया कि केशरवानी जी सुबह पोहे का ठेला लगाते हैं। अब मेरी उत्सुकता बढ़ी, तो मैंने केशरवानी जी से पूछा कि आप ये पैसे बचा लिया करिए, यहाँ क्यों खर्च करते हैं। केशरवानी जी का जवाब था, कि काफी दर्द होता है, इन श्वानों की हालत गलियों में देख कर। मुझे जो कमाई होती है, उसका आधा यहाँ खर्च करता हूं। आनंद मिलता है।
चौकस निगाहें- सूरज ढलने के समय हमलोग मेन गेट पर खड़े बातें कर रहे थे। करिश्मा जी भी थीं। कुछ समझा रही थीं। कुछ श्वान बाहर थे, कुछ अंदर थे। अचानक करिश्मा जी सड़क पर दौड़ कर गईं जहाँ तीन-चार श्वान थे। और जोर से आवाज देने लगीं- लता..., लता....। लता भागे-भागे आई। तब हमें समझ में आया कि ये श्वान बिल्ली के एक छोटे से शिशु को घेरे हुए थे। लता और उसके पति राजेश ने उस बिल्ली के बच्चे को बाहर निकाला और कार्यालय के एक प्यारे से पिंजड़े में डाल दिया। उस बच्चे को कोई नुकसान नहीं हुआ था। बाद में मैंने करिश्मा जी से पूछा कि क्या आपको मालूम है कि आप हमसे बात करते हुए अचानक बिल्ली के बच्चे के पास कैसे पहुंच गईं। उनका जवाब था नहीं मालूम। मैंने उन्हें बताया कि यही प्रकृति की नियामत है, यही छठी इंद्री है। इसे ही जागृत करने के लिए तपस्वी वर्षों साधना करते हैं। प्रकृति को बिल्ली के बच्चे को आश्रय देना था। चूकि आप प्रकृति के नजदीक हैं, इसलिए आप अनजाने में ही वहाँ पहुंच गईं।
रात ९ बजे हम शेल्टर से अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। हां, मैं वहाँ सबको सेवा करते देखता रहा, परन्तु मैंने मदद के लिए एक तिनका भी नहीं उठाया। शायद मेरी आंखें हर लम्हे को स्मृति में कैद कर लेना चाहती थीं। एक विश्वास जरूर दृढ़ हो चला कि ईश्वर, प्रकृति की हर रचना, हर जीव का पोषण करता है। जिसका जैसा नजरिया, उसके वैसे विचार और उसका वैसा ही संसार।