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बुधवार, 20 मार्च 2013

स्त्री अत्याचार के खिलाफ एक माँ का फैसला






मिलिए कविता ताई येलपुरे से. वैसे तो वह दादा धाम प्रणेता श्री नरेन्द्र दादा की अर्द्धांगिनी हैं. लेकिन इससे अधिक वह दादा धाम का मुस्कुराता हुआ चेहरा हैं. करुणा की प्रतिमूर्ति. शांत, विश्वास से भरी हुई, सुखदायक आश्वासन और अनुग्रह की एक तस्वीर हैं. यदि श्री नरेन्द्र दादा दादाधाम के प्रमुख हैं, मस्तिष्क हैं तो कविता ताई दिल हैं.
लगभग हमेशा, दादा धाम की हर नई गतिविधि प्रणेता से शुरू होती है (यानी श्री नरेन्द्र दादा से). लेकिन इस बार मातृरूपेण कविता ताई ने सभी भक्तों को महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार के खिलाफ एक अभियान शुरू करने को प्रेरित किया है. उन्होंने जब पहली बार स्कूल जाने वाली लड़कियों के अमानवीय यौन उत्पीड़न के बारे में पढ़ा, उनके दयालु हृदय में दर्द, क्रोध और चिंता का भूचाल आ गया. और उन्हें इस अभियान के लिए दृढ़ संकल्पित किया. आँसू और सहानुभूति के परे कुछ रचनात्मक करने का संकल्प.
उन्होंने सभी भक्तों की एक बैठक बुलायी और उन्हें अपनी योजना से अवगत कराया. उनके विचार और कार्य योजना दोनों ही प्रशंसनीय हैं. उनका विचार है कि अबोध कन्याओं सहित सामान्य जनता अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए सिर्फ पुलिस पर निर्भर नहीं रह सकती. लोगों को अपराध और हिंसा के खिलाफ एकजुट होना पड़ेगा. आवश्यकता सिर्फ जागरूकता की है. जब वे संभावित खतरे के प्रति जागरूक हो जाएंगे, वे सावधानी बरतने लगेंगे. वे अपराधों के खिलाफ लड़ने के लिए उपाय अपनाने लगेंगे.
कविता ताई की कार्य योजना का पहला भाग है- नागपुर शहर के प्रमुख चौराहों पर पथ नाट्य. पथ नाट्य उस स्थान से गुजरने वालों का ध्यान आकर्षित करेगा, साथ ही उन्होंने असामाजिक तत्वों के हमलों के खिलाफ तैयार होने का संदेश मिलेगा.
कुशल मार्गदर्शन के अंतर्गत पुरुष और महिला कलाकारों का दल पथ नाट्य के लिए गठित किया जा चुका है. यह दल शांति के संदेश वाहक रूप में कार्य करेगा. कविता ताई की आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि ने उन्हें अमानवीय कृत्यों के कारणों के विश्लेषण के लिए सक्षम बनाता है. उनके अनुसार, मानसिक विकृति और आपराधिक मानसिकता मानसिक प्रदूषण को जन्म देती है. महिलाओं के खिलाफ अपराध पुरुषों के ऐसे ही मानसिक प्रदूषण का परिणाम है.
हालांकि, जागरूकता इसका उपचारात्मक उपाय है. उपचारात्मक भाग में पुरुषों के मानसिक कचरे को साफ करना भी शामिल है. उन्हें गंदे साहित्य, अश्लील फिल्मों और सेक्स को बढ़ावा देने वाली दवाओं के उत्तेजक विज्ञापन से बचना चाहिये. आचार-विचार, नैतिकता और सकारात्मक मूल्य की ओर रूझान उन्हें इनसे बचाएगा. आध्यात्मिकता भी पुरुषों के चरित्र निर्माण में भूमिका निबा सकता है. कविता ताई के प्रयास इसी दिशा में हैं.
कविता ताई ने सभी शांति प्रिय संगठनों, शैक्षणिक संस्थाओं, नागरी निकायों और सामान्य जनता से दादा धाम का पथनाट्य देखने और कलाकारों के इस दल को अपने क्षेत्र में आमंत्रित करने का आह्वान किया है. पथनाट्य निःशुल्क प्रस्तुत किये जाएंगे. यह जागरूकता के पहिये को गतिशील करने में मदद करेगा.

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

कुछ गलत नहीं है मुलायम राग में



मुलायम सिंह यादव देश के एक मात्र नेता हैं जिन्हें डाक्टर राममनोहर लोहिया का राजनीतिक उत्तराधिकारी कहा जा सकता है। कालांतर में कुछ समाजवादी पार्टी की कुछ नीतियां भले ही लोगों को खटके लेकिन डाक्टर लोहिया की मृत्यु और समाजवादी आंदोलन के बिखरने के बाद की स्थिति में इसे समय की मांग भी कहा जा सकता है। जब डाक्टर राममनोहर लोहिया जैसे दूरदृष्टि रखने वाले नेतृत्व का जिक्र आता है तो मन अनायास ही कृतज्ञता से भर जाता है।
मुलायम के लिए मन में कृतज्ञता इसलिए है क्योंकि उन्होंने डाक्टर लोहिया के प्रति अपनी कृतज्ञता को नहीं भुलाया है। १९७० के दशक में समाजवादी आंदोलन के तहस-नहस हो जाने के बाद जितने भी नेता थे, उन्होंने अपना अलग ठौर खोज लिया। ज्यादातर ने अपनी पार्टियां बना लीं। कुछ ने राज्यों में शासन भी किया। लेकिन उनके शासन में डाक्टर लोहिया की छाप दिखनी तो दूर उनका नाम भी नहीं लिया गया। कुछ नेता कांग्रेस में शामिल हो गये तो कुछ ने अपनी पार्टी बना कर बड़े दलों का हाथ थाम लिया। वर्तमान में समाजवाद के नाम पर बने दलों में से समाजवादी पार्टी, जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (बीजू) ही प्रमुख हैं। बाकी सभी दल अपनी मांद में ही सिमटी हुई हैं।
बीजू जनता दल का उड़ीसा जबकि जदयू का बिहार में शासन है। दोनों को लंबी पारियां मिली हैं खेलने के लिए। राजद के लालू यादव बिहार में लंबे समय तक शासन कर चुके हैं। मुलायम सिंह यादव की पार्टी का इस बार का उत्तर प्रदेश में जीतना कुछ अलग मायने रखता है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने डाक्टर लोहिया सहित समाजवादी नेताओं के नाम पर योजनाएं शुरू कर समाजवाद की मूल धारा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त कर दी है। जबकि उड़ीसा या बिहार में ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता है। यहां तो सरकार डाक्टर लोहिया और समाजवाद का नाम लेने से इस कदर घबराती है जैसे कांग्रेस की सरकार घबराती है।
इन तीनों राज्यों में एक बात साफ है कि यहाँ जनता लगातार कांग्रेस के खिलाफ वोट देती आ रही है और इन राज्यों में कांग्रेस की हालत अब काफी कमजोर है। यही डाक्टर लोहिया चाहते थे। गैर कांग्रेसवाद का नारा उन्होंने स्वतंत्रता के समय ही बुलंद किया था जब उन्हें समझ में आ गया था कि पंडित जवाहरलाल नेहरू की अमेरिका परस्ती इस देश को फिर से गुलामी की ओर ले जाएगी। लेकिन इसके साथ ही डाक्टर लोहिया राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और कम्युनिस्टों की मंशा पर भी भरोसा नहीं कर पाये। इसी कारण उन्होंने सभी के साथ समान दूरी बना कर कई सफल आंदोलनों को अंजाम दिया। 
लोकसभा में राष्‍ट्रपति अभिभाषण की चर्चा के दौरान सपा नेता मुलायम ने अपने भाषण में कहा कि हम भाजपा के सीमा, भाषा और देशभक्ति के मुद्दे से पूरी तरह सहमत हैं और अगर वह कश्‍मीर और मुस्लिम मुद्दे पर अपने विचार बदले तो हम दोनों एक साथ आ सकते हैं और हमारे बीच में बनी खाई पट सकती है। वहीं मुलायम की बातो को सुनकर राजनाथ सिंह खुद को रोक नहीं पाए और बोल पड़े कि हमारे बीच दूरियां हैं ही कहां, लगे हाथ सिंह ने यह भी कह डाला कि वह और मुलायम एक साथ आ सकते हैं। यूपीए सरकार से असंतुष्ट मुलायम का कहना है कि गरीबों और किसानों के मुद्दे पर भाजपा और सपा की नीतियां एक सी हैं।
निःसंदेह मुलायम सिंह की यह बाद अक्षरशः सत्य है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के छिपे एजेंडे को भी देखना जरूरी है। १९७५ की संपूर्ण क्रांति के बाद समाजवादी आंदोलन तो बिखर गया लेकिन संघ को सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि कांग्रेस से असंतुष्ट जन समुदाय उससे जुड़े गया। भले ही राम जन्म भूमि से भाजपा का जनाधारा विशाल होने की बात कही जाती है लेकिन इसका सूत्रपात तो १९७५ में ही हो गया था। इस सचाई से सतर्क रहना मुलायम के लिए जरूरी है। वैसे भी मुलायम अपने मुस्लिम वोट बैंक को भूल नहीं सकता।
दरअसल, कांग्रेस के किनारा करना समय की मांग है। आज देश में अराजकता की वही स्थिति है जो १९७० के शुरुआती दशक में थी। डाक्टर राममनोहर लोहिया के वैचारिक उत्तराधिकारी स्व. अध्यात्म त्रिपाठी ने १९७२ में एक पत्र में लिखा था कि देश हिटलरशाही के दौर से गुजर रहा है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर अगले १-२ वर्षों में देश में इमरजेंसी लगा दी जाएगी। तीन वर्षों बाद उनका आकलन सही निकला था और देश में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी। आज भी अराजकता की कमोबेश वैसी ही स्थिति से देश गुजर रहा है। हालांकि इमरजेंसी लगने के फिलहाल कोई संकेत नहीं हैं लेकिन जिस तरह सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर विरोधियों को दबाया जा रहा है और जिस तरह जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा है, उससे कहीं न कहीं १९७५ की विस्फोटक स्थिति ही बन रही है। ऐसे में समाजवादियों के दूसरे धड़ों को भी चाहिये कि अहं ब्रह्मस्मि का भाव छोड़ कर अपने जड़ की ओर देखें और कोई निर्णय लें।
cartoon: JNI News, Utter Pradesh

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

१६ मार्च को पुस्तक 'समाजवादी अध्यात्म' का विमोचन


पं. अध्यात्म त्रिपाठी स्मृति वर्षः साल भर होंगे विविध आयोजन

नागपुर। स्वतंत्रता के बाद सम्पूर्ण स्वतंत्रता का उद्घोष करने वाले डाक्टर राममनोहर लोहिया के विश्वस्त सहयोगी पं. अध्यात्म त्रिपाठी की १५ मार्च को २५वीं पुण्यतिथि है। समाजवाद के इस मौन साधक को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए सन २०१३-२०१४ को अध्यात्म त्रिपाठी स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाएगा। सभी कार्यक्रम अध्यात्म त्रिपाठी स्मृति समारोह समिति और लोहिया अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में होंगे।
इन कार्यक्रमों की श्रृंखला में १५ मार्च को अमरावती में आटिज्म से पीड़ित बच्चों के लिए संचालित  अध्यात्म त्रिपाठी स्मृति समता ट्रस्ट (जीवाश्रय) स्कूल का भूमिपूजन, इसी दिन लोहिया अध्ययन केंद्र में श्री अध्यात्म के छायाचित्र का अनावरण होगा। १६ मार्च को शाम ४.३० बजे पं. अध्यात्म त्रिपाठी पर आधारित पुस्तक समाजवादी अध्यात्म का विमोचन धनवटे सभागृह, शंकर नगर में किया जाएगा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष रघु ठाकुर उपस्थित रहेंगे। अध्यक्षता पूर्व विधायक गिरीश गांधी करेंगे। प्रमुख रूप से प्रखर शिक्षाविद् वेदप्रकाश मिश्रा उपस्थित रहेंगे। पुस्तक का लोकार्पण दादाधाम के प्रणेता नरेंद्र दादा करेंगे। पुस्तक में देश भर के ३५ लोगों से संस्मरण व आलेख शामिल किया गया है। साथ ही १९४७ से १९८८ तक के समाजवादी आंदोलन पर शोध कर श्री अध्यात्म के जीवन पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। पुस्तक के मार्गदर्शक वरिष्ठ संपादक अच्युतानंद मिश्र, संपादक श्रीमती अर्चना तिवारी हैं। समाग्री संकलन व लेखन का कार्य पत्रकार अंजीव पांडेय ने किया है। पुस्तक का प्रकाशन नयी दिल्ली के अनामिका प्रकाशन और जेबीएस पब्लिकेशन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
 इसके अतिरिक्त वर्ष भर साहित्यिक-सांस्कृतिक संध्या, विभिन्न क्षेत्रों पत्रकारिता, समाजसेवा, राजनीति, साहित्य, कला, संस्कृति के क्षेत्र में  आजीवन सेवाएं देने वाले मान्यवरों का सत्कार, महाप्रसाद जैसे अन्य कार्यक्रम भी नागपुर, दिल्ली व लखनऊ में आयोजित किये जाएंगे। लोहिया अध्ययन केंद्र के सचिव हरीश अड्यालकर ने कार्यक्रम में उपस्थिति की अपील आम जनता से की है।

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स्व. अध्यात्म त्रिपाठी और पुस्तक के संबंध में
पंडित अध्यात्म त्रिपाठी 20 वर्षों तक डाक्टर राममनोहर लोहिया के विश्वस्त सहयोगी रहे। डाक्टर लोहिया के अंतरंग होने के कारण उस जमाने में के लोगों के लिये आदरणीय थे। अध्यात्म जी के लिए सम्मान इसलिए भी था, क्योंकि उनके व्यक्तित्व में वे सभी बातें मौजूद थीं, जो कमोबेश किसी गुरु से शिष्य को मिलती हैं। अर्थात गुरु तुल्य लोहिया जी का गहरा असर उनके व्यक्तित्व में था। अध्यात्म जी का सम्पूर्ण जीवन डाक्टर लोहिया के समाजवादी आन्दोलन को समर्पित रहा। यही कारण था- उनका व्यक्तित्व विपुल था, बहुआयामी था।

साहित्यकार हों, विचारक-चिंतक हों, या राजनीतिक और या फिर शोषित वर्ग का कोई व्यक्ति, अध्यात्म जी से उनके मधुर रिश्ते होना आश्चर्य की बात नहीं थी। सन् 1980 के बाद देश की वैचारिक पृष्ठभूमि में तेजी से बदलाव आया। सिद्धांतों की बात करने वालों से किनारा किया जाने लगा। राजनीति, पत्रकारिता में मिशनरी भावना का स्थान धनलोलुपता और स्वार्थ ने ले लिया। इसके बावजूद 15 मार्च 1988 को जीवन के अंतिम दिनों तक उन्होंने सार्वजनिक जीवन के उन सिद्धांतों को जीवित रखा जिनकी वकालत 1967 तक डाक्टर राममनोहर लोहिया करते रहे।

अध्यात्म जी का सम्पूर्ण जीवन चार प्रमुख वैचारिक खंडों में विभक्त रहा- डाक्टर लोहिया के जीवित रहते हुए उनके कार्यक्रमों, आन्दोलनों में सहभागिता, डाक्टर लोहिया की मृत्यु के उपरांत उनके कार्यक्रमों और आन्दोलनों का नेपथ्य में रहकर संचालन, डाक्टर राममनोहर लोहिया समता विद्यालय न्यास के कार्य (हैदराबाद के बदरीविशाल पित्ती जी के अभिभावकत्व में लोहिया साहित्य का संपादन, प्रकाशन व प्रचार-प्रसार) तथा कद्दावर नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा जी के साथ सच्चे समाजवाद की स्थापना का आशावाद। लोहिया जी की सप्तक्रान्ति को भी अध्यात्म जी ने अपने चरित्र में पूर्णतः आत्मसात कर लिया था। प्रस्तुत पुस्तक ‘समाजवादी अध्यात्म’ में अध्यात्म जी के जीवन के विभिन्न रंगों को सामने लाने का प्रयास किया गया है। एक प्रयास है इस पुण्यात्मा को श्रद्धांजलि प्रदान करने का, वह सम्मान प्रदान करने का जिसके वे हकदार थे।

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

सही है २१ दिसंबर की भविष्यवाणी


पुनर्जन्म, समग्र, सकारात्मक बदलाव

ज्योतिषी 2009 की शुरुआत में ही अभूतपूर्व आकाश कहानियों (ग्रहों और तारों के बीच संबंधों) के नए सकेतों से चमत्कृत रहे हैं. अधिकांश, नहीं तो ज्यादातर इससे सहमत हैं। यह नये संकेत द्योतक हैं नयी शुरुआत के। यह समझना जरूरी है कि यह संकेत विनाश का नहीं बल्कि नये जन्म का सूचक है। ग्रह, नक्षत्र बताते हैं कि 2009 और 2015 के बीच की अवधि एक अत्यधिक महत्वपूर्ण संक्रमण काल ​है। दुनिया में मानवता, मानव धर्म की स्थापना का यह प्रतीक माना जा रहा है।  मायन कैलेंडर के अनुसार २०२३ तक का नया चक्र नये रूप में शुरू हो रहा है। यह कालखण्ड प्रसव काल की तरह होगा जो तकलीफ भी देखा लेकिन उससे अधिक संतुलित जीवन, नये जन्म का रोमांच भी पैदा करेगा।
इस दौरान सरकारों का पतन तो होगा लेकिन इसके पूर्व होगा नये मानवतावादी जनता के लोकतंत्र का उदय। जलवायु परिवर्तन का असर हमारे मौसम पर पड़ेगा। देश की वित्तीय प्रणाली भी डगमगाने की सम्भावना है। यह परिर्तन वैसे गत दो-तीन वर्षों में दिखे हैं। हममें से कई लोगों ने यह परिवर्त महसूस किया होगा। मैंने तो व्यक्तिगत स्तर पर किया है। तकलीफ है लेकिन मीठा-मीठा दर्द सा है। इस दर्द मे आनंद है, भीतर का आनन्द यानी परमानन्द। ज्योतिष कहते हैं मकर, वृश्चिक, मेष और तुला राशि वाले इन ऊर्जा के केंद्र में हैं। हमें नये रिश्ते, कैरियर की नई सम्भावनाओं, जीवन शैली में सकारात्मक बदलाव को इंगित करती है। एक बात पक्की है कि इस परिवर्तन के बाद अंत एक अद्भुत नए जीवन के रूप मे होगा।
इतिहास गवाह है कि जब भी समग्र परिवर्तन का संक्रमण काल आता है, वह बहुत ज्यादा तकलीफ देता है। प्रसव के समय तो यह कष्ट चरम पर होता है। मगर यह मानसिक तौर पर, आंतरिक तौर पर आनन्द देने वाला भी होता है। स्वतंत्रता संग्राम हो या अन्य कोई क्रांति, अगर नीयत मे खोट नहीं है तो नियति भी अच्छी होती है। यही स्थिति इस समय है। तो आप भी तैयार हो जाइये नये बदलाव के लिये।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

लोकपाल संबंधी सिफारिश

राज्यसभा की प्रवर समिति की सिफारिशों पर सदन और सरकार का क्या रुख होगा तथा अंतत: लोकपाल विधेयक का क्या स्वरूप सामने आयेगा—यह तो समय ही बतायेगा, लेकिन ये सिफारिशें विभिन्न मतों के बीच सहमति के बिंदु अवश्य सुझाती हैं। प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखने-न रखने पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीव्र मतभेद रहे हैं। दिलचस्प यह भी है कि भूमिकाओं के मुताबिक राजनीतिक दल इस बाबत अपनी राय बदलते रहे हैं। इसलिए इस मुद्दे पर सहमति आसान नहीं है, पर राज्यसभा की प्रवर समिति ने एक मध्यमार्ग सुझाया है। मीडिया में आयी खबरों के मुताबिक समिति ने सिफारिश की है कि बाहरी एवं आंतरिक सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों सरीखे संवेदनशील मामलों को बाहर रखते हुए प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए। यह सिफारिश इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सत्तापक्ष ऐसे ही संवेदनशील मामलों का तर्क दे कर प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने पर जोर देता रहा है। अगर प्रवर समिति की सिफारिश के अनुरूप इस मुद्दे पर सभी पक्षों में सहमति बन जाती है तो सशक्त लोकपाल की दिशा में एक बड़ी सफलता होगी। इसमें दो राय नहीं कि जवाबदेही और पारदर्शिता का तकाजा है कि हर किसी को जिम्मेदारी अैार जवाबदेही के दायरे में होना चाहिए। यही कारण है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने पर आपत्ति सिर्फ विपक्ष को ही नहीं, अन्ना हजारे समेत सिविल सोसायटी को भी रही है। नहीं भूलना चाहिए कि चार दशकों से भी ज्यादा समय से राजनीतिक गलियारों में भटके लोकपाल को अगर अब राह मिलती नजर आ रही है तो उसका श्रेय अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन को ही जाता है।
पिछले साल जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक सरकार को हिला देने वाले अन्ना के इस आंदोलन का ही परिणाम था कि दिसंबर, 2011 में संसद के शीतकालीन सत्र के अंतिम दिनों में, सरकार की पसंद का ही सही, लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया गया। लोकसभा में सत्तारूढ़ संप्रग का बहुमत है, इसलिए विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद वहां लोकपाल विधेयक पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा लंबी चर्चा के बाद आधी रात को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गयी। बाद में लोकपाल विधेयक राज्यसभा की प्रवर समिति को भेज दिया गया। उसी प्रवर समिति ने अब अपनी सिफारिशों में कुछ ऐसे बिंदु सुझाये हैं, जिनसे लोकपाल पर अलग-अलग राय रखने वाले पक्षों में सहमति बन सकती है। विवाद का एक बड़ा मुद्दा लोकपाल विधेयक में ही राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति का प्रावधान किया जाना भी है। ध्यान रहे कि अन्ना हजारे की मांग रही है कि लोकपाल विधेयक में ही यह प्रावधान किया जाये कि उसी की तर्ज पर राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की जायेगी। यह एक ऐसा मुद्दा रहा है, जिस पर अन्ना के समर्थक समझे जाने वाले राजनीतिक दल भी उनके साथ सहमत नहीं हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ संप्रग के भी कुछ घटक दल इस प्रावधान के विरोध में मुखर रहे हैं। इस विरोध का मुख्य तर्क यही है कि लोकायुक्त की नियुक्ति राज्य के अधिकार क्षेत्र का मामला है, इसलिए ऐसा कोई भी प्रावधान देश के संघीय ढांचे और संविधान की भावना के प्रतिकूल होगा।
विवाद का एक और बड़ा मुद्दा सीबीआई की स्वायत्तता का रहा है। अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए देश की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई के दुरुपयोग के आरोपों से घिरी होने के बावजूद केंद्र सरकार उसे स्वायत्तता देने को तैयार नहीं है। बेशक सीबीआई के राजनीतिक दुरुपयोग के मुद्दे पर भी राजनीतिक दलों के तेवर अपनी भूमिकाओं के साथ बदलते रहे हैं। विपक्ष में आते ही हर दल को सीबीआई के राजनीतिक दुरुपयेाग की चिंता सताने लगती है। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने सीबीआई पर अपना नियंत्रण कायम रखने के लिए अनेक तर्क दिये, पर उनका खोखलापन इसी से उजागर हो जाता है कि तटस्थ प्रेक्षकों के गले भी वे तर्क नहीं उतरे। प्रवर समिति ने इस जटिल एवं संवेदनशील मुद्दे पर भी सहमति का मार्ग सुझाया है। मसलन, सीबीआई निदेशक की नियुक्ति को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए समिति ने सिफारिश की है कि यह काम प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और देश के मुख्य न्यायाधीश की तीन सदस्यीय समिति द्वारा किया जाना चाहिए। साथ ही सीबीआई निदेशक का कार्यकाल भी निश्चित होना चाहिए। इसके अलावा समिति की यह सिफारिश भी बेहद महत्वपूर्ण है कि सीबीआई की अभियोजन शाखा का प्रमुख सरकार के बजाय सीबीआई निदेशक के अधीन होगा। अन्ना हजारे की मांग थी कि सीबीआई को लोकपाल के अधीन किया जाये, पर समिति ने यह सिफारिश अवश्य की है कि लोकपाल जो मामले जांच के लिए सीबीआई को भेजेगा, उनकी निगरानी भी खुद कर सकेगा। जरूरत के मुताबिक सीबीआई निजी वकील भी नियुक्त कर सकेगी, पर उसके लिए उसे लोकपाल की मंजूरी लेनी होगी। प्रवर समिति की इन सिफारिशों के बावजूद कुछ बिंदुओं पर कुछ पक्ष असहमत हो सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र में आम सहमति से ही फैसले किये जाने चाहिए, जिसके लिए मध्यमार्ग सुझाने का काम इस समिति ने बखूबी कर दिया है।
- दैनिक ट्रिब्यून से साभार

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

समाजवादी अध्यात्म के रंग


पंडित अध्यात्म त्रिपाठी 20 वर्षों तक डाक्टर राममनोहर लोहिया के विश्वस्त सहयोगी रहे। डाक्टर लोहिया के अंतरंग होने के कारण उस जमाने में के लोगों के लिये आदरणीय थे। अध्यात्म जी के लिए सम्मान इसलिए भी था, क्योंकि उनके व्यक्तित्व में वे सभी बातें मौजूद थीं, जो कमोबेश किसी गुरु से शिष्य को मिलती हैं। अर्थात गुरु तुल्य लोहिया जी का गहरा असर उनके व्यक्तित्व में था। अध्यात्म जी का सम्पूर्ण जीवन डाक्टर लोहिया के समाजवादी आन्दोलन को समर्पित रहा। यही कारण था- उनका व्यक्तित्व विपुल था, बहुआयामी था।

साहित्यकार हों, विचारक-चिंतक हों, या राजनीतिक और या फिर शोषित वर्ग का कोई व्यक्ति, अध्यात्म जी से उनके मधुर रिश्ते होना आश्चर्य की बात नहीं थी। सन् 1980 के बाद देश की वैचारिक पृष्ठभूमि में तेजी से बदलाव आया। सिद्धांतों की बात करने वालों से किनारा किया जाने लगा। राजनीति, पत्रकारिता में मिशनरी भावना का स्थान धनलोलुपता और स्वार्थ ने ले लिया। इसके बावजूद 15 मार्च 1988 को जीवन के अंतिम दिनों तक उन्होंने सार्वजनिक जीवन के उन सिद्धांतों को जीवित रखा जिनकी वकालत 1967 तक डाक्टर राममनोहर लोहिया करते रहे।

अध्यात्म जी का सम्पूर्ण जीवन चार प्रमुख वैचारिक खंडों में विभक्त रहा- डाक्टर लोहिया के जीवित रहते हुए उनके कार्यक्रमों, आन्दोलनों में सहभागिता, डाक्टर लोहिया की मृत्यु के उपरांत उनके कार्यक्रमों और आन्दोलनों का नेपथ्य में रहकर संचालन, डाक्टर राममनोहर लोहिया समता विद्यालय न्यास के कार्य (हैदराबाद के बदरीविशाल पित्ती जी के अभिभावकत्व में लोहिया साहित्य का संपादन, प्रकाशन व प्रचार-प्रसार) तथा कद्दावर नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा जी के साथ सच्चे समाजवाद की स्थापना का आशावाद। लोहिया जी की सप्तक्रान्ति को भी अध्यात्म जी ने अपने चरित्र में पूर्णतः आत्मसात कर लिया था। प्रस्तुत पुस्तक ‘समाजवादी अध्यात्म’ में अध्यात्म जी के जीवन के विभिन्न रंगों को सामने लाने का प्रयास किया गया है। एक प्रयास है इस पुण्यात्मा को श्रद्धांजलि प्रदान करने का, वह सम्मान प्रदान करने का जिसके वे हकदार थे।

सोमवार, 12 नवंबर 2012

दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।


दीपावली में दीपों की श्रृंखला से रोशन गली-मोहल्ले, घर। चेतन के सर्वोच्च चेतन की सत्ता का सफर इन्हीं दीपों के मानिन्द हमारे मार्ग को रोशनी से प्रशस्त रखे। हमारे चेतन में, अंतः में, हमारी आत्मा में कहीं भी अंधकार ना रहे।
रोशनी भी कैसी हो... माटी के बने दीपों में तेल के दियों की जो हमें प्रकृति के समीप लाते हैं। हमें अपने वास्तविक घर (परम पिता का घर) की याद दिलाते हैं। ये सहज हैं, सरल हैं क्योंकि इन्हें कुम्हार सहजता और सरलता से बनाता है। हम इनमें तेल-बाती लगाकर सहजता और सरलता से प्रज्ज्वलित करते हैं। यह कीट-पतंगों को अपने पास बुला लेता है और हमें परेशानी से बचाता है। यही है प्रकृति और उसका चक्र।
पूरा मार्ग इन्हीं दीपों की श्रृंखला से दैदीप्यमान रहे। हमारे अंतः का अंधकार मिटाए। हमें प्रकृति पुत्र होने का अस्तित्वबोध कराते रहे। तमोगुणी विचारों से हमारी रक्षा करे। हमें सकारात्मक विचारों से ओत-प्रोत रखे। हमारा सफर उसी सरलता से पूर्णता की ओर ले जाए जिस सरलता के साथ दीप अपनी भूमिका का निर्वाह करता है। तम से उजाले का सफर चलता रहे। चरैवेति-चरैवेति...।
दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।