इस समय नागपुर का मौसम

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि कितनी अलग थी जिंदगी जब तक तेरी जुल्फों की छांव ने मेरे चेहरे को आबाद न किया था. कि इस जिंदगी में पहले प्यार के बिना अकेलापन था, अब प्यार के साथ अकेलापन. अब डर है उसे खोने का. पहले कशिश थी उसे पाने की. मैंने सब कुछ पा लिया अब इस जिंदगी में. अब यह भी मलाल नहीं कि सफर कैसे कटेगा. अब तो कट जाएगी जिंदगी उसकी यादों के सहारे. उसकी वह शोख चंचल अदाएं. उसकी झिड़कियां और फिर दूर रहते रहते चैन से आंखें मूंद लेना मेरे कांधे पर सिर रखकर. उसके लरजते लब्जों की फिजां और उसमें डूबा मेरा सब कुछ. जिंदगी में जो भी अनुभव पहली बार होता है, कितना अनोखा होता है न. खुद को भुला चुके थे हम उस अनोखी मुलाकात के बाद. ट्रेन का सफर भी कुछ अजीब सा था. लोग बातें कर रहे थे, मैं भी कर रहा था, फिर आंखें बंद करते ही छलक जाया करती थीं. क्या मिलन दुख देता है. पता नहीं पर मुझसे रहा न गया. अब समझ में आया कि पागलपन की हद तक चाहता हूं उसे और वो कहती है.... जाने दो. उसकी चंचल आंखों में ठहराव दिखा. उसकी मस्ती थम गई. मैं एक बार फिर उसी दार्शनिक की भूमिका में. मानों ये प्यार ना हो, किसी का मार्गदर्शन कर रहा हूं या ये कहें कि किसी आपात स्थिति से जूझने की कोशिश करने लगा. क्या पागलपन है. और उधर से ये आवाज कि मैं पहली गर्लफ्रेंड हूं जो अपने बीएफ को बुला रही हूं.
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि इस रंजोगम की दुनिया में कौन किसका है, ये कौन तय करेगा. सामाजिक संबंधों की मर्यादा या ईश्वर की इच्छा. हमारी बुरी आकांक्षाएं या फिर ईश्वर की लिखी हकीकत. नहीं कह सकते हम तो किसी हालत में नहीं कह सकते. दुनिया में सब कुछ सिमटता जा रहा है. वासुधैव कुटुंबकम की अवधारणा सूचना तकनीक ने सार्थक कर दिया है. एक गम रह गया. बिछुड़ने के समय उसे जी भर के देख न सका. उसे ही जल्दी थी जुदाई की. उफ.

सोमवार, 5 सितंबर 2011

खुद को भूल जाना चाहता हूं.......

खुद को भूल जाना चाहता हूं,
अपने आगोश में समाना चाहता हूं
गर किसी को अपना न बना पाया तो क्या
मदहोशी का संसार पाना चाहता हूं.

खुद को भूल जाना चाहता हूं...........

मदहोशी भी ऐसी कि होश न आए कभी
होश भी ऐसा कि बेहोशी सी रहे
उसे कभी न कहूं, खुद को दोष ना दूं
हर बंधन से दूरी चाहता हूं.

खुद को भूल जाना चाहता हूं...........

रात की रानी रहे हमेशा बाहों में
सुबह का फलसफा न हो जिंदगी में
फिर शबे रोज नाउम्मीद सा
अपनी बेबसी का इम्तहां चाहता हूं.

खुद को भूल जाना चाहता हूं...........

चलता रहूं अपनी ही राह कुछ इस तरह
ना कोई मिले ना कोई पूछे हाल
कमजर्फों से भरे इस बेदर्द जमाने में
सुकून का ठहराव चाहता हूं.

खुद को भूल जाना चाहता हूं...........

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

रचनात्मक विश्व: अंततः मिला अच्छा विपक्ष

रचनात्मक विश्व: अंततः मिला अच्छा विपक्ष

अंततः मिला अच्छा विपक्ष

शाबास, नितिनजी
देर से ही सही परन्तु भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी ने वो कर दिखाया जिसे करने की हिम्मत लोकतंत्र के मंदिर का कोई भी पुजारी नहीं कर पा रहा था। अन्ना हजारे के आंदोलन को सीधा समर्थन देकर गड़करी ने न सिर्फ महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेताओं को समझौते के लिए आगे आने को मजबूर कर दिया बल्कि सत्ता की दलाली कर सिर्फ मीडिया तक अपनी पहचान बनाए रखने वाले भाजपा नेताओं को भी भविष्य के स्पष्ट संकेत दे दिए।
बतौर भाजपा अध्यक्ष नितिन गड़करी के कार्यकाल पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि उन्होंने जब भी बेबाक बयानी की, उन्हें अपने कदम वापस लेने पड़े। राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बाद भी राजधानी दिल्ली के मीडिया माफिया ने उन्हें कभी तरजीह नहीं दी। कम से कम अन्ना हजारे के आंदोलन से देश में लोकतंत्र की मजबूती के संकेत मिले। इसके दो कारण थे। पहला यह कि देश का जनमानस स्वस्फूर्त आंदोलित हुआ। संविधान की दुहाई देने वाले, संसद की व्याख्या करने वाले नेताओं को उनकी जगह बताई कि लोकतंत्र जनता के लिए, जनता के द्वारा लिए है। यहां जनता ही सर्वोपरि है। लगता है कानूनों की आड़ में सरकारी भाषा बोलते हुए यूपीए से कहीं न कहीं चूक हो गई। दूसरा कारण था नितिन गड़करी का खुल कर सामने आना। यह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि देश का वर्तमान परिदृश्य विकल्पहीनता की स्थिति में है। यूपीए नहीं तो एनडीए। जनता के बीच यही संकेत जा रहा था कि देश में विपक्ष नाम की चीज नहीं है। इसलिए जो हो रहा है, उसे सहते रहो। एक अरसे के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव हारने के बाद वाम नेता भी सामने दिखे। सामाजिक कार्यकर्ता भी दिखे। यानी वो सब दिखा जो लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है। संसद में अन्ना को मिले अभूतपूर्व समर्थन का श्रेय भी नितिन गड़करी के प्रयासों को दिया जाना चाहिए। नहीं तो दिल्ली में बैठी भाजपा की व्हाइट कालर तिकड़ी इस बार फिर सरकार के सामने घुटने टेक देती और अन्ना के आंदोलन का हश्र वही होता जो रामदेव बाबा के आंदोलन का हुआ था।
कांग्रेस के कुछ नेता तो अब भी बेशर्म जैसे मुखर होकर बोल रहे हैं। शशि थरूर कहते हैं जिसने कभी चुनाव नहीं लड़ा वो संविधान की बात कर रहा है। थरूर भूल जाते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी राज्यसभा के सदस्य हैं। खैर, बात गड़करी की हो रही है। दिल्ली की प्रेस कांफ्रेंस के बाद नागपुर में भी गड़करी ने प्रेस कांफ्रेंस कर साफ संकेत दिया कि दिल्ली में कही गई बात महज औपचारिकता नहीं थी। नागपुर संघ का मुख्यालय है और गड़करी संघ के पुराने कार्यकर्ता। ऐसे में नागपुर से यह संकेत जाना निःसंदेह कांग्रेस सहित भाजपा के आस्तीन के सांपों के लिए एक चुनौती है। गड़करी अगर सिर्फ सशक्त विपक्ष भी देश को दे पाएं तो यह देश के लिए राहत की बात होगी।

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

बेटी से ज्यादा प्यारी है वो ‘गुड़िया

बहुत प्यारी है वो, बिल्कुल मेरी छोटी सी गुड़िया जैसी... वो गुस्सा होती है तो प्यार आता है... वो उलाहना देती है तो प्यार आता है.... उसकी तबीयत खराब होती है तो प्यार आता है... लेकिन जब प्यार करती है तो.... पता नहीं क्या हो जाता है.... अरे, उसे नहीं मुझे। जब वो प्यार करती है तो मैं बेचैन हो जाता हूं... शायद इतने प्यार की आदत नहीं है न... शायद कभी जिंदगी में इतना प्यार नहीं मिला न... इसलिए जब वो प्यार करती है तो मैं पचा नहीं पाता हूं. अजीब सी गुड़िया है वो.... मेरी एक बेटी है, नाम है उसका रिका. वो भी मुझे बहुत प्यार करती है लेकिन रिका का प्यार मेरे और अपनी मां के बीच विभाजित है. लेकिन इस छोटी सी गुड़िया का प्यार तो एक दम परिष्कृत, अविभाजित है. वह अपना प्यार किसी के साथ नहीं बांटती. वो जब प्यार करती है तो सिर्फ मुझसे करती है. थोड़ी बेवकूफ भी है... लेकिन मजे की बात ये है कि उसकी बेवकूफी में भी मुझे प्यार आता है... अब देखो ना हर जगह प्यार... ही प्यार है... एक और समस्या, अगर ये बात बेटी यानी रिका को पता चल गई तो फिर एक और महाभारत... वैसे वो अभी छोटी है... मेरा ब्लाग पढ़ने में उसे अभी ५ साल और लगेंगे. इसलिए चिंता की बात नहीं है.
अब फिर उसकी बात. मुझे चिढ़ाने के लिए या फिर झांसी की रानी बनके उसने किसी दूसरे से पींगें लड़ाईं. मैंने पहले तो ध्यान नहीं दिया. लेकिन अब वो कहते हैं न... नहीं रहा गया मुझसे तो लिख दिया कि मुझे जो गिफ्ट दिया है उसकी कीमत बताओ... वापस करना है... बस हो गया... उसका प्यार फिर झलकने लगा... बिफर गई... मेरी क्या कीमत लगाओगे... बताओ मेरी क्या कीमत है बाजार में... मुझे तो मर्दों की आदत पड़ गई है... वगैरह-वगैरह. सच में जब वो ये सब लिख रही थी तो मैं मुस्कुरा रहा था. हम दोनों के बीच संबंध ही ऐसे बन गए हैं कि हमारा एक-दूसरे से मिलना जरूरी नहीं है. बदमाशी थोड़ी मैं ही करता हूं.... कभी कुछ पी ली तो कभी किसी को देख लिया. लेकिन उसने कभी ऐसा नहीं किया. उससे मुझे तभी तकलीफ हुई जब उसने मुझ पर अपना प्यार उड़ेला. बताया न मुझे शायद आदत नहीं है... इतना प्यार पचाने की.
हमारे बीच नजदीकी इतनी है कि एक समय वो क्या कर रही है, या मैं किस मूड में हूं... हम दोनों को मालूम रहता है. जब एक को नींद आती है तो दूसरे को भी आती है. जब एक जागता है तो दूसरा भी जागता है. अब ये भी झगड़े का कारण बनता है. जब हमारे यहां दिन होता है तो उसके यहां रात होती है. तो जब वो दिन में मुझे याद करती है तो मुझे रात में नींद नहीं आती. मैं दिन में काम में इतना व्यस्त हो जाता हूं कि याद करने का समय ही नहीं मिलता... (गुस्सा मत होना भाई ये पढ़ कर)... लेकिन रात में जब वो सोती है तो मुझे दिन में आफिस में नींद आती है.
चलो अब तो झगड़ा हो गया है. अब दूरी ही रहनी है. तो इस दूरी वाले प्यार को अब मैं सहेजूंगा. कम से कम अब प्यार पाने से तकलीफ तो नहीं होगी. चलो अच्छी है ये दूरी...
लेकिन न वो बुरी है और न मैं. इतना प्यार होने के बावजूद न उसने अपना परिवार छोड़ा न मैंने.... तो हैं न. हम स्वार्थी नहीं है. बस एक चकवा-चकवी हैं जो कभी मिल नहीं पाते....

मुझको मालूम है, इश्क मासूम है
दिल से हो जाती हैं गलतियां
सब्र से इश्क महरूम है....
(शेष अगले अंक में)

सोमवार, 27 सितंबर 2010

तेरे दिल की बात मैं जानूं

तेरे दिल की बात मैं जानूं

यकीन मानिए सच ही है ये

लंदन. कई साल पहले एक विज्ञापन आया था, जिसमें एक पत्नी अपने पति से कहती थी, तेरे दिल की बात मैं जानूं. पत्नी की पति से कही ये पंक्तियां अगर आपको झूठ लगती हों तो एक बार फिर सोच लीजिए.

अब तो वैज्ञानिकों ने भी साबित कर दिया है कि पति और पत्नी के दिल को दिल से राह होती है और दोनों एक-दूसरे के दिल की बात पहले से जान जाते हैं.

सिडनी यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोेलॉजी के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया है कि कुछ जोड़ों के मस्तिष्क एक-दूसरे के साथ तारतम्यता में काम करने लगते हैं और उनके तंत्रिका तंत्र के कई भाग एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बिठा लेते हैं.

वैज्ञानिकों ने इसके लिए 30 लोगों के मस्तिष्क और दिल की धडक़न का अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि जो जोड़े मानसिक तौर पर एक-दूसरे के बहुत करीब थे, bhale ही शारीरिक तौर पर उन्हें दूर रखा गया हो, उनके मस्तिष्क की गतिविधियों में एकरूपता थी."

डेली मेल की खबर में कहा गया है कि इसका मतलब ये है कि वे ऐसी स्थिति में पहुंच चुके थे, जिसमें दोनों के तंत्रिका तंत्र बिल्कुल एक-तरह से काम करते थे और दोनों बिना बोले ही एक दूसरी की भावनाएं और विचार जान जाते थे.

बुधवार, 1 सितंबर 2010

मौनी गुड़िया फिर मौन

तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही

तो मौनी गुड़िया फिर मौन हो गई है. उसका मौन यानी मेरी फजीहत... सच कहूं थोड़ी प्राइवेसी भी मिल जाती है. लेकिन अपनी हालत तो इस गाने की तरह ही हो जाती है. मौनी गुड़िया का पिछला एपीसोड काफी पसंद किया गया था. वैसे, अलगाव में दम तो है क्योंकि मुझे भी लिखने की इच्छा तभी होती है जब गुड़िया मौन हो जाती है यानी रूठ जाती है... तो गम के अंधेरे में डूबा ये आशिक ये गाना सुन रहा है.

सन १९९९ में रिलीज हुई फिल्म हम दिल दे चुके सनम- का ये गाना है. इस्माइल दरबार ने इसे बखूबी संगीतबद्ध किया है. महबूब के लिखे इस कलाम को केके ने अपनी आवाज दी है. इस गाने में के के की आवाज का जादू तो है कि इसके बोल भी कहीं न कहीं आज की भागमभाग वाली जिंदगी में आम इंसान की हकीकत को बयां करते हैं.

इश्क में लुटने की बात पर हो सकता है कुछ लोगों को हंसी आए. क्या बेवकूफी है.... है न... लेकिन इश्क, प्रेम, मोहब्बत जैसे अल्फाज मनुष्य की जिंदगी से जुदा नहीं हो सकते हैं. हिंदी पढ़ते हुए हम व्याकरण में ९ रसों का उल्लेख पाते हैं. प्रेम प्रकृति का अटूट अंग है. अध्यात्म में मोह से जुदा होने की बात कही गई है. लेकिन ईश्वर से, प्रकृति से, प्राणियों से प्रेम करने की भी ताकीद है.

अब जबकि प्रेम को अनिवार्य अंग मान लेते हैं, तो फिर इश्क ने हमें निकम्मा कर दिया, वर्ना हम आदमी थे काम के, जैसी पंक्तियां शायरों ने ठीक ही लिखी हैं. दरअसल, अति सर्वत्र वर्जयेत। यानी प्रकृति के संतुलन के बीच किसी भी चीज की अति नहीं होनी चाहिए. वो कोई भी रस हो, कोई भी भाव हो या फिर कोई भी कृत्य हो. अब इस गाने पर आते हैं। महबूब साहब लिखते हैं-

बेजान इश्क़ को तेरे इश्क़ ने ज़िन्दा किया
फिर तेरे इश्क़ ने ही इस दिल को तबाह किया


एकदम सही। जब उम्र की ढलान पे या फिर किसी के चोट पहुंचाने पर इश्क बेजान हो चला था, उसके इश्क ने इश्क के जज्बे को फिर जिंदा कर दिया. और फिर उसके ही इश्क ने दिल को तबाह कर दिया. आखिर ऐसा क्यों... हो सकता है इश्क का तूफान वास्तविकता के धरातल से दूर चला गया हो... हो सकता है इश्क के आवेश ने प्रेमी या प्रेमिका से अपेक्षाएँ बढ़ा दी हों... हो सकता है इश्क ने मिलन की आग भड़का दी हो, जो संभव न हो और जिससे दिलोदिमाग पर अधूरापन छा गया हो... इस अधूरेपन ने असंतोष को बढ़ाया हो... यानी बात घूमफिर असामान्य मानसिक स्थिति पर पहुंच जाती है....
गीत में आगे लिखते हैं-

तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सज़ा दी प्यार की ऐसा क्या गुनाह किया
तो लुट गए हां लुट गए
तो लुट गए हम तेरी मोहब्बत में


सच है ऐसे समय यदि असंतोष चरम पर पहुंच जाए तो सोचने की क्षमता भी समाप्त हो जाती है. फिर यही लगता है कि ऐसा क्या गुनाह किया कि हम तेरी मुहब्बत में लुट गए.

अजब है इश्क़ यारा पल दो पल की ख़ुशियाँ
गम के खज़ाने मिलते हैं फिर मिलती हैं तन्हाईयां
कभी आँसू कभी आहें कभी शिकवे कभी नाले
तेरा चेहरा नज़र आए मुझे दिन के उजालों में
तेरी यादें तड़पाएं रातों के अंधेरों में
तेरा चेहरा नज़र आए
मचल मचल के इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सज़ा दी ...

सच में अजब है इश्क यारा.... पल दो पल की खुशियां मिलती हैं और फिर गम का खजाना. अगर गौर किया जाए तो खुशियों का भी खजाना ही होता है. इसलिए खुशियों को पल दो पल की मानना गलत है. एकदम गलत. खुशियों का भी खजाना है. अब गुड़िया फिर मौन हो गई है तो इसे मैं क्या समझूं. गमों का खजाना..... गलत. फिर उसने जो मुझे खुशियों के पल दिए उनका क्या..... जहां तक चेहरा नजर आने की बात है तो सच है... वो तो नजर आता ही है. दिन का उजाला हो या फिर रात का अंधेरा... उसका चेहरा तो नजर आता ही है. वैसे कई दुष्टों का चेहरा भी नजर आता है लेकिन उनके बीच गुड़िया का चेहरा सुकून देता है.....

अगर मिले ख़ुदा तो पूछूंगा ख़ुदाया
जिस्म दे के मिट्टी का शीशे सा दिल क्यूं बनाया

एकदम सच। वाकई अगर खुदा मिला तो जरूर पूछुंगा कि मिट्टी का जिस्म बना के आपने दिल शीशे का क्यों बनाया है. लेकिन जब ठंडे दिमाग से सोचता हूं तो यह पाता हूं कि अगर दिल को सीसे का नहीं बनाता तो इश्क होता ही नहीं. दिल कमजोर है इसीलिए तो ये पंक्ति है- गम के खज़ाने मिलते हैं फिर मिलती हैं तन्हाईयां. दिल को मजबूत बनाने की कोशिश करना भी बेकार है. हां, कमजोरी दूर होनी चाहिए... नहीं तो फिर मानसिक बीमारी... लेकिन अगर दिल ज्यादा मजबूत यानी कठोर हो गया तो इंसान निष्ठुर हो जाएगा. क्या आप चाहें कि कोई आपको निष्ठुर या बेदर्द कहे. नहीं न.... वैसे कठोरता होनी भी नहीं चाहिए. क्योंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है. समाज के प्रति संवेदनशीलता जरूरी है. नहीं तो आप मनमौजी हो जाएंगे और अति हुई तो अपराधी भी बन सकते हैं.....

और उस पे दी ये फ़ितरत के वो करता है मोहब्बत
वाह रे वाह तेरी क़ुदरत उसपे दे दी ये क़िस्मत
कभी है मिलन कभी फ़ुरक़त
है यही क्या वो मुहब्बत
वाह रे वाह तेरी क़ुदरत
सिसक सिसक के इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सज़ा दी ...


सिसक-सिसक के दिल आह तो निकलती है लेकिन वो हाय नहीं होती. क्योंकि इश्क सच्चा है. शाश्वत है. यथार्थ है. तो देखते हैं मौनी गुड़िया के इस एपीसोड का अंत क्या होता है. वाकई कुदरत का खेल निराला है... इस पर मैं लिखता हूं...

न वो है बेवफा और न हम,
फिर भी टूट जाते हैं सनम....।