इस समय नागपुर का मौसम

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

रचनात्मक विश्व: अंततः मिला अच्छा विपक्ष

रचनात्मक विश्व: अंततः मिला अच्छा विपक्ष

अंततः मिला अच्छा विपक्ष

शाबास, नितिनजी
देर से ही सही परन्तु भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी ने वो कर दिखाया जिसे करने की हिम्मत लोकतंत्र के मंदिर का कोई भी पुजारी नहीं कर पा रहा था। अन्ना हजारे के आंदोलन को सीधा समर्थन देकर गड़करी ने न सिर्फ महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेताओं को समझौते के लिए आगे आने को मजबूर कर दिया बल्कि सत्ता की दलाली कर सिर्फ मीडिया तक अपनी पहचान बनाए रखने वाले भाजपा नेताओं को भी भविष्य के स्पष्ट संकेत दे दिए।
बतौर भाजपा अध्यक्ष नितिन गड़करी के कार्यकाल पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि उन्होंने जब भी बेबाक बयानी की, उन्हें अपने कदम वापस लेने पड़े। राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बाद भी राजधानी दिल्ली के मीडिया माफिया ने उन्हें कभी तरजीह नहीं दी। कम से कम अन्ना हजारे के आंदोलन से देश में लोकतंत्र की मजबूती के संकेत मिले। इसके दो कारण थे। पहला यह कि देश का जनमानस स्वस्फूर्त आंदोलित हुआ। संविधान की दुहाई देने वाले, संसद की व्याख्या करने वाले नेताओं को उनकी जगह बताई कि लोकतंत्र जनता के लिए, जनता के द्वारा लिए है। यहां जनता ही सर्वोपरि है। लगता है कानूनों की आड़ में सरकारी भाषा बोलते हुए यूपीए से कहीं न कहीं चूक हो गई। दूसरा कारण था नितिन गड़करी का खुल कर सामने आना। यह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि देश का वर्तमान परिदृश्य विकल्पहीनता की स्थिति में है। यूपीए नहीं तो एनडीए। जनता के बीच यही संकेत जा रहा था कि देश में विपक्ष नाम की चीज नहीं है। इसलिए जो हो रहा है, उसे सहते रहो। एक अरसे के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव हारने के बाद वाम नेता भी सामने दिखे। सामाजिक कार्यकर्ता भी दिखे। यानी वो सब दिखा जो लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है। संसद में अन्ना को मिले अभूतपूर्व समर्थन का श्रेय भी नितिन गड़करी के प्रयासों को दिया जाना चाहिए। नहीं तो दिल्ली में बैठी भाजपा की व्हाइट कालर तिकड़ी इस बार फिर सरकार के सामने घुटने टेक देती और अन्ना के आंदोलन का हश्र वही होता जो रामदेव बाबा के आंदोलन का हुआ था।
कांग्रेस के कुछ नेता तो अब भी बेशर्म जैसे मुखर होकर बोल रहे हैं। शशि थरूर कहते हैं जिसने कभी चुनाव नहीं लड़ा वो संविधान की बात कर रहा है। थरूर भूल जाते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी राज्यसभा के सदस्य हैं। खैर, बात गड़करी की हो रही है। दिल्ली की प्रेस कांफ्रेंस के बाद नागपुर में भी गड़करी ने प्रेस कांफ्रेंस कर साफ संकेत दिया कि दिल्ली में कही गई बात महज औपचारिकता नहीं थी। नागपुर संघ का मुख्यालय है और गड़करी संघ के पुराने कार्यकर्ता। ऐसे में नागपुर से यह संकेत जाना निःसंदेह कांग्रेस सहित भाजपा के आस्तीन के सांपों के लिए एक चुनौती है। गड़करी अगर सिर्फ सशक्त विपक्ष भी देश को दे पाएं तो यह देश के लिए राहत की बात होगी।

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

बेटी से ज्यादा प्यारी है वो ‘गुड़िया

बहुत प्यारी है वो, बिल्कुल मेरी छोटी सी गुड़िया जैसी... वो गुस्सा होती है तो प्यार आता है... वो उलाहना देती है तो प्यार आता है.... उसकी तबीयत खराब होती है तो प्यार आता है... लेकिन जब प्यार करती है तो.... पता नहीं क्या हो जाता है.... अरे, उसे नहीं मुझे। जब वो प्यार करती है तो मैं बेचैन हो जाता हूं... शायद इतने प्यार की आदत नहीं है न... शायद कभी जिंदगी में इतना प्यार नहीं मिला न... इसलिए जब वो प्यार करती है तो मैं पचा नहीं पाता हूं. अजीब सी गुड़िया है वो.... मेरी एक बेटी है, नाम है उसका रिका. वो भी मुझे बहुत प्यार करती है लेकिन रिका का प्यार मेरे और अपनी मां के बीच विभाजित है. लेकिन इस छोटी सी गुड़िया का प्यार तो एक दम परिष्कृत, अविभाजित है. वह अपना प्यार किसी के साथ नहीं बांटती. वो जब प्यार करती है तो सिर्फ मुझसे करती है. थोड़ी बेवकूफ भी है... लेकिन मजे की बात ये है कि उसकी बेवकूफी में भी मुझे प्यार आता है... अब देखो ना हर जगह प्यार... ही प्यार है... एक और समस्या, अगर ये बात बेटी यानी रिका को पता चल गई तो फिर एक और महाभारत... वैसे वो अभी छोटी है... मेरा ब्लाग पढ़ने में उसे अभी ५ साल और लगेंगे. इसलिए चिंता की बात नहीं है.
अब फिर उसकी बात. मुझे चिढ़ाने के लिए या फिर झांसी की रानी बनके उसने किसी दूसरे से पींगें लड़ाईं. मैंने पहले तो ध्यान नहीं दिया. लेकिन अब वो कहते हैं न... नहीं रहा गया मुझसे तो लिख दिया कि मुझे जो गिफ्ट दिया है उसकी कीमत बताओ... वापस करना है... बस हो गया... उसका प्यार फिर झलकने लगा... बिफर गई... मेरी क्या कीमत लगाओगे... बताओ मेरी क्या कीमत है बाजार में... मुझे तो मर्दों की आदत पड़ गई है... वगैरह-वगैरह. सच में जब वो ये सब लिख रही थी तो मैं मुस्कुरा रहा था. हम दोनों के बीच संबंध ही ऐसे बन गए हैं कि हमारा एक-दूसरे से मिलना जरूरी नहीं है. बदमाशी थोड़ी मैं ही करता हूं.... कभी कुछ पी ली तो कभी किसी को देख लिया. लेकिन उसने कभी ऐसा नहीं किया. उससे मुझे तभी तकलीफ हुई जब उसने मुझ पर अपना प्यार उड़ेला. बताया न मुझे शायद आदत नहीं है... इतना प्यार पचाने की.
हमारे बीच नजदीकी इतनी है कि एक समय वो क्या कर रही है, या मैं किस मूड में हूं... हम दोनों को मालूम रहता है. जब एक को नींद आती है तो दूसरे को भी आती है. जब एक जागता है तो दूसरा भी जागता है. अब ये भी झगड़े का कारण बनता है. जब हमारे यहां दिन होता है तो उसके यहां रात होती है. तो जब वो दिन में मुझे याद करती है तो मुझे रात में नींद नहीं आती. मैं दिन में काम में इतना व्यस्त हो जाता हूं कि याद करने का समय ही नहीं मिलता... (गुस्सा मत होना भाई ये पढ़ कर)... लेकिन रात में जब वो सोती है तो मुझे दिन में आफिस में नींद आती है.
चलो अब तो झगड़ा हो गया है. अब दूरी ही रहनी है. तो इस दूरी वाले प्यार को अब मैं सहेजूंगा. कम से कम अब प्यार पाने से तकलीफ तो नहीं होगी. चलो अच्छी है ये दूरी...
लेकिन न वो बुरी है और न मैं. इतना प्यार होने के बावजूद न उसने अपना परिवार छोड़ा न मैंने.... तो हैं न. हम स्वार्थी नहीं है. बस एक चकवा-चकवी हैं जो कभी मिल नहीं पाते....

मुझको मालूम है, इश्क मासूम है
दिल से हो जाती हैं गलतियां
सब्र से इश्क महरूम है....
(शेष अगले अंक में)

सोमवार, 27 सितंबर 2010

तेरे दिल की बात मैं जानूं

तेरे दिल की बात मैं जानूं

यकीन मानिए सच ही है ये

लंदन. कई साल पहले एक विज्ञापन आया था, जिसमें एक पत्नी अपने पति से कहती थी, तेरे दिल की बात मैं जानूं. पत्नी की पति से कही ये पंक्तियां अगर आपको झूठ लगती हों तो एक बार फिर सोच लीजिए.

अब तो वैज्ञानिकों ने भी साबित कर दिया है कि पति और पत्नी के दिल को दिल से राह होती है और दोनों एक-दूसरे के दिल की बात पहले से जान जाते हैं.

सिडनी यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोेलॉजी के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया है कि कुछ जोड़ों के मस्तिष्क एक-दूसरे के साथ तारतम्यता में काम करने लगते हैं और उनके तंत्रिका तंत्र के कई भाग एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बिठा लेते हैं.

वैज्ञानिकों ने इसके लिए 30 लोगों के मस्तिष्क और दिल की धडक़न का अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि जो जोड़े मानसिक तौर पर एक-दूसरे के बहुत करीब थे, bhale ही शारीरिक तौर पर उन्हें दूर रखा गया हो, उनके मस्तिष्क की गतिविधियों में एकरूपता थी."

डेली मेल की खबर में कहा गया है कि इसका मतलब ये है कि वे ऐसी स्थिति में पहुंच चुके थे, जिसमें दोनों के तंत्रिका तंत्र बिल्कुल एक-तरह से काम करते थे और दोनों बिना बोले ही एक दूसरी की भावनाएं और विचार जान जाते थे.

बुधवार, 1 सितंबर 2010

मौनी गुड़िया फिर मौन

तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही

तो मौनी गुड़िया फिर मौन हो गई है. उसका मौन यानी मेरी फजीहत... सच कहूं थोड़ी प्राइवेसी भी मिल जाती है. लेकिन अपनी हालत तो इस गाने की तरह ही हो जाती है. मौनी गुड़िया का पिछला एपीसोड काफी पसंद किया गया था. वैसे, अलगाव में दम तो है क्योंकि मुझे भी लिखने की इच्छा तभी होती है जब गुड़िया मौन हो जाती है यानी रूठ जाती है... तो गम के अंधेरे में डूबा ये आशिक ये गाना सुन रहा है.

सन १९९९ में रिलीज हुई फिल्म हम दिल दे चुके सनम- का ये गाना है. इस्माइल दरबार ने इसे बखूबी संगीतबद्ध किया है. महबूब के लिखे इस कलाम को केके ने अपनी आवाज दी है. इस गाने में के के की आवाज का जादू तो है कि इसके बोल भी कहीं न कहीं आज की भागमभाग वाली जिंदगी में आम इंसान की हकीकत को बयां करते हैं.

इश्क में लुटने की बात पर हो सकता है कुछ लोगों को हंसी आए. क्या बेवकूफी है.... है न... लेकिन इश्क, प्रेम, मोहब्बत जैसे अल्फाज मनुष्य की जिंदगी से जुदा नहीं हो सकते हैं. हिंदी पढ़ते हुए हम व्याकरण में ९ रसों का उल्लेख पाते हैं. प्रेम प्रकृति का अटूट अंग है. अध्यात्म में मोह से जुदा होने की बात कही गई है. लेकिन ईश्वर से, प्रकृति से, प्राणियों से प्रेम करने की भी ताकीद है.

अब जबकि प्रेम को अनिवार्य अंग मान लेते हैं, तो फिर इश्क ने हमें निकम्मा कर दिया, वर्ना हम आदमी थे काम के, जैसी पंक्तियां शायरों ने ठीक ही लिखी हैं. दरअसल, अति सर्वत्र वर्जयेत। यानी प्रकृति के संतुलन के बीच किसी भी चीज की अति नहीं होनी चाहिए. वो कोई भी रस हो, कोई भी भाव हो या फिर कोई भी कृत्य हो. अब इस गाने पर आते हैं। महबूब साहब लिखते हैं-

बेजान इश्क़ को तेरे इश्क़ ने ज़िन्दा किया
फिर तेरे इश्क़ ने ही इस दिल को तबाह किया


एकदम सही। जब उम्र की ढलान पे या फिर किसी के चोट पहुंचाने पर इश्क बेजान हो चला था, उसके इश्क ने इश्क के जज्बे को फिर जिंदा कर दिया. और फिर उसके ही इश्क ने दिल को तबाह कर दिया. आखिर ऐसा क्यों... हो सकता है इश्क का तूफान वास्तविकता के धरातल से दूर चला गया हो... हो सकता है इश्क के आवेश ने प्रेमी या प्रेमिका से अपेक्षाएँ बढ़ा दी हों... हो सकता है इश्क ने मिलन की आग भड़का दी हो, जो संभव न हो और जिससे दिलोदिमाग पर अधूरापन छा गया हो... इस अधूरेपन ने असंतोष को बढ़ाया हो... यानी बात घूमफिर असामान्य मानसिक स्थिति पर पहुंच जाती है....
गीत में आगे लिखते हैं-

तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सज़ा दी प्यार की ऐसा क्या गुनाह किया
तो लुट गए हां लुट गए
तो लुट गए हम तेरी मोहब्बत में


सच है ऐसे समय यदि असंतोष चरम पर पहुंच जाए तो सोचने की क्षमता भी समाप्त हो जाती है. फिर यही लगता है कि ऐसा क्या गुनाह किया कि हम तेरी मुहब्बत में लुट गए.

अजब है इश्क़ यारा पल दो पल की ख़ुशियाँ
गम के खज़ाने मिलते हैं फिर मिलती हैं तन्हाईयां
कभी आँसू कभी आहें कभी शिकवे कभी नाले
तेरा चेहरा नज़र आए मुझे दिन के उजालों में
तेरी यादें तड़पाएं रातों के अंधेरों में
तेरा चेहरा नज़र आए
मचल मचल के इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सज़ा दी ...

सच में अजब है इश्क यारा.... पल दो पल की खुशियां मिलती हैं और फिर गम का खजाना. अगर गौर किया जाए तो खुशियों का भी खजाना ही होता है. इसलिए खुशियों को पल दो पल की मानना गलत है. एकदम गलत. खुशियों का भी खजाना है. अब गुड़िया फिर मौन हो गई है तो इसे मैं क्या समझूं. गमों का खजाना..... गलत. फिर उसने जो मुझे खुशियों के पल दिए उनका क्या..... जहां तक चेहरा नजर आने की बात है तो सच है... वो तो नजर आता ही है. दिन का उजाला हो या फिर रात का अंधेरा... उसका चेहरा तो नजर आता ही है. वैसे कई दुष्टों का चेहरा भी नजर आता है लेकिन उनके बीच गुड़िया का चेहरा सुकून देता है.....

अगर मिले ख़ुदा तो पूछूंगा ख़ुदाया
जिस्म दे के मिट्टी का शीशे सा दिल क्यूं बनाया

एकदम सच। वाकई अगर खुदा मिला तो जरूर पूछुंगा कि मिट्टी का जिस्म बना के आपने दिल शीशे का क्यों बनाया है. लेकिन जब ठंडे दिमाग से सोचता हूं तो यह पाता हूं कि अगर दिल को सीसे का नहीं बनाता तो इश्क होता ही नहीं. दिल कमजोर है इसीलिए तो ये पंक्ति है- गम के खज़ाने मिलते हैं फिर मिलती हैं तन्हाईयां. दिल को मजबूत बनाने की कोशिश करना भी बेकार है. हां, कमजोरी दूर होनी चाहिए... नहीं तो फिर मानसिक बीमारी... लेकिन अगर दिल ज्यादा मजबूत यानी कठोर हो गया तो इंसान निष्ठुर हो जाएगा. क्या आप चाहें कि कोई आपको निष्ठुर या बेदर्द कहे. नहीं न.... वैसे कठोरता होनी भी नहीं चाहिए. क्योंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है. समाज के प्रति संवेदनशीलता जरूरी है. नहीं तो आप मनमौजी हो जाएंगे और अति हुई तो अपराधी भी बन सकते हैं.....

और उस पे दी ये फ़ितरत के वो करता है मोहब्बत
वाह रे वाह तेरी क़ुदरत उसपे दे दी ये क़िस्मत
कभी है मिलन कभी फ़ुरक़त
है यही क्या वो मुहब्बत
वाह रे वाह तेरी क़ुदरत
सिसक सिसक के इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सज़ा दी ...


सिसक-सिसक के दिल आह तो निकलती है लेकिन वो हाय नहीं होती. क्योंकि इश्क सच्चा है. शाश्वत है. यथार्थ है. तो देखते हैं मौनी गुड़िया के इस एपीसोड का अंत क्या होता है. वाकई कुदरत का खेल निराला है... इस पर मैं लिखता हूं...

न वो है बेवफा और न हम,
फिर भी टूट जाते हैं सनम....।

सोमवार, 16 अगस्त 2010

लम्हा-लम्हा... चलते-चलते...


लम्हा-लम्हा चलते-चलते पता नहीं ऐसा क्यों होता है इस जिंदगी में. क्यों खबर बेखबर सा मुझे सब कुछ खतम करने पर मजबूर होना पड़ता है. क्या मेरी सोच ही गलत है. या फिर यही जिंदगी है. हरेक की जिंदगी की दशा और दिशा अगल-अगल है. क्यों कभी-कभी ऐसा लगता है कि इस दुनिया में सब कुछ झूठा है. सब कुछ एक ढोंग है. इसमें इन्सानियत, सचाई, गुमराह न करना, अपने कार्य के प्रति समर्पण, सिंपल लीविंग एंड बिग थिंकिंग जैसे अल्फाजों की कोई अहमियत नहीं है.
हो जाता कुछ ऐसा घटित जब अपनी सतर्कता न रहने या किसी भी दो कौड़ी के लोगों पर भरोसा कर लेने के कारण बेइज्जत होना पड़ता है. अपने काम में कुशलता का खामियाजा हमेशा ही कुछ इस तरह से भुगतना पड़ता है कि कुछ सहयोगी अपने अहं की तुष्टि के लिए कुछ लोगों को मोहरा बनाते हैं और लांछित करने का प्रयास करते हैं. वो तो मैं सोचता हूं कभी-कभी कि गनीमत है कोई दुराचरण की श्रेणी की गलती नहीं की. नहीं तो ऐसे मौकों पर अहं की तुष्टि करने वाले तुच्छ लोग तो जिंदा ही दफना दें. फिर ऐसे समय लगता है कि विफलताओं के लिए ईश्वर को कोसने से कोई फायदा नहीं. क्योंकि उसने मुझे दुराचरण की श्रेणी वाली गलतियों से बचा कर रखा.
वैसे, हर एपीसोड में एक बात तो साफ रहती है कि जसा दिसते, तसा नसते- अर्थात जैसा दिखता है, वैसा नहीं रहता. मुझे तो इंट्यूशन भी भेजता है भगवान. मुझे कुछ अनहोनी की आशंका उसी समय हो जाती है जब मैं कोई गलती करने के करीब होता हूं. या बिना गलती के कुछ होना होता है. बिना गलती के तब होता है जब किसी का अहं टकराता है या फिर कोई उच्चाधिकारी चमचों की फौज से गुमराह हो जाता है. अब सोचता हूं कि चमचागिरी शुरू कर दूं.
सबकी हां में हां मिलाना. किसी के अहं को चोट न पहुंचाना. किसी को सलाह न देना. क्योंकि मेरा व्यक्तिगत अनुभव यही कहता है कि अनहोनी की आशंका के बावजूद होनी होकर रहती है. इसी प्रकार किसी का सही मार्गदर्शन भी गलत है. क्योंकि जो होना है, वह तो होकर ही रहेगा. फिर क्यों किसी को सम्भावित खतरे के प्रति आगाह करना.
सब पागलपन है. फिर कई बार कबीर दास जी की ये पंक्तियां याद आ जाती हैं-
कबीरा खड़ा बाजार में
मांगे सब की खैर
ना काहू से दोस्ती
ना काहू से बैर!
लेकिन सच कहूं. दोस्ती अपनी जगह बरकरार रहती है. हालांकि मेरे मामले में बैर ज्यादा दिन टिकता नहीं लेकिन बैर है कि होता ही है. अब जो कोई किसी का दिल दुखाएगा, उसे तकलीफ तो होगी ही ना. एक को अभी होती है और दूसरे को बाद में. मगर, विघ्न संतोषियों का चमत्कार ज्यादा दिन नहीं चल पाता है. उन्हें एक न एक दिन रसातल में जाना ही पड़ता है.
अब ये बात अलग है कि नेता मंत्री बन के भी वहीं रहते हैं. क्योंकि उन्हें ईश्वर ने राजनीति करने को ही भेजा है. और राजनीति में साम, दाम, दंड, भेद तो चलता ही रहता है. लेकिन जो राजनीति में नहीं है, वो भी वही सब करता है तो लगता है कुछ गलत हो रहा है.
लेकिन क्या सच में ये कलयुग है..... तो क्या हमने शैतान बन के जीना चाहिए.... प्रश्न अनुत्तरित है. खोज जारी है.....

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

6 Signs of Sixth Sense

We all have psychic sensitivity, but is yours above the norm? Even if you don’t pick winning lottery numbers every week, you may be one of those not-so-rare people who have, and can enhance, their innate psychic skill.
Let’s consider six signs that might mean you should polish your sensitivities and talents:
1. You’re more than casually tuned in to energies. You feel a pressing need to call a friend. You find out the friend needs help or was thinking about you. When your phone rings, you know who’s calling. If you seem totally tuned in, you might want to start a journal to track your “coincidences.”
2. You score well on the Zener test. In the 1930s, psychologist Karl Zener created a set of cards to test ESP. Though some experts criticize the test, it can measure strong clairvoyant skill. Read more about it or experiment with the online Zener test. Very high scores are noteworthy.
3. You see beyond visual cues. If you lose your keys, can you mentally envision where they are? Are you right most of the time? Do you know what someone is doing even when you’re away from them? Can you enter a building and perceive specific images of events that happened in the past, or feel events of the future with clarity?
4. You’re more tuned in to your body, mind, and soul than most people are. You knew, without a doubt, that you were pregnant before you took a test. Perhaps you know exactly what your body needs when things don’t feel right. You sometimes think you see hints of color around various parts of your body, and you know when there’s something you must do about them.
5. You sometimes feel unexplainably unwell, maybe nauseated. Later, you’ll learn something major happened to a loved one. I’ve tracked this for years, and it’s unfailing. I knew when my uncle passed. When my son was in a hurricane, I felt his peril. Notice your physical reactions. Note how often they connect to incidents you weren’t aware of. Are you like me?
6. You body/mind/soul energy is extraordinarily positive. When trouble looms, or you feel blue, or it’s a terrible day, you see beyond that. You understand completely that we must experience negatives in order to appreciate positives. You feel sad or down sometimes, like everyone else, but it just never leaves you permanently marked. You feel uplifted most of the time.