इस समय नागपुर का मौसम

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

अब तक का मानसून का हाल अच्छा

कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था के लिए यह अच्छी खबर है कि महाराष्ट्र में इस साल मानसून पूरे जोश के साथ सक्रिय हुआ. जून माह में पिछले साल की तुलना में दोगुनी बारिश हुई जो राज्य के सामान्य औसत के मात्र दो फीसदी कम अर्थात ९८.२ प्रतिशत रही. राज्य में सबसे कम बारिश मराठवा‹डा के नांदे‹ड और परभणी जिले में हुई. विदर्भ में माह के अंतिम दो सप्ताह में अच्छी बारिश हुई. मध्य व पश्चिम महाराष्ट्र में पूरे महीने मेघ जमकर बरसते रहे.
राज्य में अब तक औसतन २१८.१ मिमी बारिश हो चुकी है जो सामान्य (२२२.१) की ९८.२ फीसदी है. पिछले साल हालात खराब थे. जून २००९ में मात्र १०१.४ मिमी बारिश ही हुई थी जो सामान्य की ४५.६ फीसदी थी.
इस साल मानसून ने शुरुआती आंखमिचौली के बाद अपनी कृपा बनाए रखी. चक्रवाती तूफान लैला के कारण समय पूर्व आने की मानसून की भविष्यवाणी हालांकि गलत साबित हुई लेकिन कुछ देर से ही सही मगर मानसून पूरी शिद्दत के साथ राज्य में सक्रिय हुआ. औसत के आधार पर राज्य में मानसून का प्रवेश ५ से १० जून के बीच होता है. १० जून तक मुंबई और मराठवा‹डा के बाद १२ से १५ जून के बीच इसे सम्पूर्ण राज्य में सक्रिय हो जाना चाहिए. इस साल लैला के कारण मानसून शुरुआती दौर में शिथिल प‹ड गया था और इसने थो‹डा विलंब यानी १० जून को राज्य की सीमा में प्रवेश किया. मराठवा‹डा के बाद फिर एक बार फिर मानसून शिथिल प‹डा और विदर्भ में लगभग एक सप्ताह की देरी से माह के तीसरे सप्ताह पहुंचा. लेकिन इसके बाद बारिश ने विदर्भ में पूरे महीने की कसर निकाल ली.
ठाणे, रत्नागिरी, qसधुदुर्ग, पुणे, अहमदनगर जिले में तो कमोबेश रोज ही बारिश ने अपनी उपिस्थिति दर्ज कराई. ठाणे में ९१.१, रत्नागिरी में १०५.३, qसधुदुर्ग में ११०.२, नासिक ११९.२, अहमदनगर १६६.७, पुणे १५१.५, सोलापुर १४३.१ प्रश बारिश हुई जो सामान्य से अधिक रही. सिर्फ नांदे‹ड और परभणी जिलों में सामान्य से काफी कम क्रमशः ५०.५ व ५५.६ फीसदी बारिश दर्ज की गई. अपेक्षा के विपरीत ग‹डचिरोली जिले में भी मात्र ६७.७ फीसदी बारिश हुई. इन जिलों के अलावा विदर्भ व मराठवा‹डा में भी एक पखवा‹डे के बाद मेघों ने अपनी कृपा बनाई. मराठवा‹डा के औरंगाबाद और बी‹ड जिलों में क्रमशः १३४.२ और ११३.४ फीसदी वर्षा रिकार्ड की गई. विदर्भ में सबसे अधिक मेहरबानी बुलढाना और वाशिम जिलों में हुई जहां का औसत क्रमशः १२१.९ व ११९.१ प्रतिशत रहा. मराठवा‹डा के लिए यह सुकून की बात रही कि नासिक में वरुण देवता का आशीर्वाद अब तक बना हुआ है. यहां सामान्य से अधिक ११९.२ फीसदी बारिश हुई है. नासिक में औसतन १५४.२ मिमी बारिश होनी चाहिए लेकिन इस साल अब तक १८४.१ मिमी बारिश हो चुकी है. शेष महाराष्ट्र में जलगांव को ही बारिश के लिए तरसना प‹डा. यहां सामान्य की अपेक्षा सिर्फ ६९.४ और नंदुरबार में ७३.४ फीसदी बारिश हुई. सातारा में सामान्य से दोगुनी २०४ फीसदी बारिश हुई. राज्य के अन्य हिस्सों में सामान्य के आसपास ही बारिश दर्ज की गई.

सिर्फ छह जिलों में कम वर्षाराज्य के सिर्फ चार जिलों परभणी, नांदे‹ड, जलगांव, नंदुरबार, ग‹डचिरोली व चंद्रपुर में सामान्य से कम बारिश हुई. विदर्भ, मराठवा‹डा में मानसून सामान्य रहा जबकि शेष महाराष्ट्र में मेघ जम कर बरसे. नांदे‹ड में मात्र ५०.५, परभणी में ५५.६, जलगांव में ६९.४, नंदुरबार ७३.४, ग‹डचिरोली ६७.७ और चंद्रपुर में ७५.६ फीसदी बारिश दर्ज की गई.

बुधवार, 23 जून 2010

क्या फिर विकल्पहीन हो रहा है देश

क्या फिर विकल्पहीन हो रहा है देश
देश की वर्तमान राजनीतिक दशा व दिशा ने एक बार फिर विकल्प शून्यता की स्थिति उत्पन्न कर दी है. इसके साथ ही देश एक बार फिर उन्हीं इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के काल में पहुंच रहा है जहां उनकी सत्ता को कोई चुनौती नहीं थी. भारतीय राजनीति के लिए इसस बड़े शर्म की बात और क्या हो सकती है कि यहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामने कोई भी राजनीतिक दल सशक्त चुनौती बनकर खड़ा होने की स्थिति में नहीं है.
वाम दल तो, अपेक्षा के अनुरूप अपने सबसे बड़े विध्वंस की ओर अग्रसर हैं. अब अपेक्षा भारतीय जनता पार्टी से ही हो सकती है. लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के समय से ही जिस प्रकार भाजपा मुद्दाविहीन पार्टी बनते जा रही है, उससे फिर एक बार कांग्रेस की विकल्पहीन सत्ता की आशंका पैदा हो गई है. भारतीय जनता पार्टी इन दिनों विरोध तो करती है, मगर एक त्यौहार या अवसर के रूप में. एक ऐसा अवसर जो साल में एक-दो बार आता है, रात गई-बात गई की तर्ज पर गायब हो जाता है.
समस्याओं की नहीं है कमी
ऐसा नहीं है कि देश में सब कुछ ठीक चल रहा है. ऐसा भी नहीं है कि देश में कोई समस्या नहीं, मुद्दा नहीं. भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी से काफी अपेक्षाएं जनमानस को हैं. लगता है गडकरी भी अब दिल्ली के राजदरबार के खिलाड़ी बनते जा रहे हैं. जिस युवा और विकासोन्नमुख दृष्टिकोण के लिए गडकरी जाने जाते हैं, वह कमोबेश अब तक उनकी करनी में नहीं दिखा है. लगता है आम चुनाव के पहले अपने कार्यकाल का पहला चरण गडकरी दिल्ली दरबार में अपनी उपिस्थिति मजबूत करना चाहते हैं. लेकिन इस बीच मुद्दाविहीन और चेतनाविहीन एक राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं को, समर्थकों को निराश जरूर कर रहे हैं. हां, टीवी चैनलों पर अपने इंटरव्यू में जरूर गडकरी अपनी विकासपरक राजनीति की वकालत करते सुने जा सकते हैं. यानी गडकरी ने भी वही शुरू किया है जो अमूमन दिल्ली के नेता करते हैं... वो है मीडिया की राजनीति. महंगाई का मुद्दा हो या नक्सलवाद का हर जगह भाजपा बैकफुट पर ही खड़ी दिखाई देती है. आतंकवाद, परमाणु संशोधन, भोपाल गैस त्रासदी जैसे मामलों में भी विपक्ष कहीं दिखाई नहीं दिया.
राहुल का तो विकल्प ही नहीं दिखता....
यह सच है, एकदम अकाट्य सच कि आज भारतीय राजनीति में राहुल गांधी के युवा व्यक्तित्व का जवाब कहीं दिखाई नही देता है. गड़करी की तुलना राहुल गाधी के व्यक्तित्व से नहीं की जा सकती है. दोनों के जनाधार, दोनों की कार्यप्रणाली, दोनों के व्यक्तित्व, दोनों की पार्टियों की विचारधारा हर जगह जमीन-आसमान का अंतर है. ऐसे में यह देखना मजोदार होगा कि भाजपा किस प्रकार राहुल के युवा व्यक्तित्व का सामना करती है.
(जारी...)

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

नक्सलवाद यानी पैसा, हथियार और सेना यानी लूट, सौदा और दहशत

नक्सलवाद
यानी
पैसा, हथियार और सेना
यानी
लूट, सौदा और दहशत
पिछले चार दशकों में नक्सलियों और अब माओवादियों ने जनांदोलन से ऊपर उठते हुए सश क्रांति के नाम पर किसी देश की फौज की तर्ज पर अपना ढांचा खड़ा कर लिया है। मतलब साफ है कि बाकायदा सेना की संरचना तैयार करने के लिए उन्हें धन, मानवबल और हथियारों की आवश्यकता होती है। हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ में जब्त हथियारों से यह बात साफ हो गई है कि नक्सली न सिर्फ विदेशी हथियार इस्तेमाल करते हैं बल्कि उनके संपर्क सूत्र हमारे देशकी आयुध निर्माणियों तक भी फैले हुएहैं। गत वर्ष छत्तीसगढ़ के जशपुर में हथियारों से भरा ट्रक पकड़ाया था, उसमें हथियार आर्डिनेंस फैक्टरी, पुणे के भी थे। इससे अब यह धारणा पुरानी हो चली है कि नक्सली लुटे हुए हथियारों पर ही निर्भर रहते हैं। एक नया तथ्य सामने आया है कि इस वामपंथी उग्रवाद का प्रत्येक समूह अन्य चीजों के अलावा हथियार खरीदने के लिए लाखों रुपये खर्च करता है। केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा चलाए गए अभियानों के दौरान हाल ही में उग्रवादियों के जब्त रिकॉर्ड से खुलासा हुआ है कि नक्सली लेवी, फिरौती और धमकियों के जरिये सालाना करोड़ों रुपये जुटाते हैं। केंद्रीय सुरक्षा एजेंसी के अधिकारियों ने बताया कि नक्सलियों की अपनी कारपोरेट शैली में अकाउंटिंग पद्धति है। इनके दलम में आम तौर पर 20 से 40 सदस्य होते हैं और ये दल अपने क्षेत्रीय कमांडर को छमाही आधार पर अपनी आय और खर्च का ब्योरा देते हैं। ये ब्योरा इससे ऊपरी स्तर पर पहुंचाया जाता है। बताया जाता है कि हथियार खरीदने पर किए गए खर्च का लेखा-जोखा अलग से रखा जाता है। नक्सलियों का वर्चस्व देश के 40 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है जिसे रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है। जानकारों के मुताबिक इस रेड कारिडोर से प्रतिवर्ष नक्सलियों को 16 000 करोड़ रुपयों की आय होती है। नक्सलियों के पास धन इसकी उप समिति और क्षेत्रीय समिति से आता है। आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक नक्सली विदेश निर्मित विशेष रूप से चीन और अमेरिका द्वारा निर्मित हथियारों का ही ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। बिहार, झारखंड और आंध्रप्रदेश के माओवादी चीन सहित विदेशी छोटे हथियारों का इस्तेमाल करते हैं जबकि पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के नक्सली स्थानीय हथियारों से ही काम चलाते हैं। सूत्रों का कहना है कि रूस निर्मित एके सीरिज की बंदूकें माओवादियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के कब्जे से एके-47, एके-56, पाकिस्तान निर्मित पीका गन और इजराइली स्नाइपर गन बरामद किए हैं। सूत्र बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के जवानों पर किए गए हमले में नक्सलियों ने आंध्र प्रदेश और उड़ीसा के पुलिस बल से चुराए गए हथियारों का इस्तेमाल किया था। सूत्रों के मुताबिक घटनास्थल के सर्वे से लगता है कि हमले में इस्तेमाल किए गए दो एलएमजी आंध्र प्रदेश के पुलिस बल या फिर उड़ीसा के पुलिस बल से चुराए गए थे। सूत्रों के मुताबिक पापा राव की अध्यक्षता वाली माओवादियों की केन्द्रीय समिति की कंपनी 3 और कंपनी 8 ने इनका इस्तेमाल किया था। छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के अब तक के सबसे घातक हमले के बारे में ‘कुछ गलती’ होने की बात स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार ने इस घटना की जांच कराने की घोषणा तो कर दी है। लेकिन गृहमंत्री ने इन खबरों को गलत बताया कि हमले में प्रेशर बमों का इस्तेमाल किया गया था और स्थानीय पुलिस को सीआरपीएफ के ऑपरेशन की जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा हमले में शहीद 76 जवानों के सभी हथियार नक्सली अपने साथ ले गए। चिदंबरम का मानना है कि नक्सली सीमा पार से हथियार खरीदते हैं। सीमापार हथियारों के बाजार हैं। उन्होंने नेपाल, म्यांमार और बांग्लादेश के साथ भारत की खुली सीमा का जिक्र किया। नक्सलियों के वित्तीय स्रोतों के बारे में पूछे जाने पर गृह मंत्री ने कहा कि वे बैंक लूटते हैं और अपने इलाके की खनन कंपनियों से वसूली करते हैं।
सीआरपीएफ-पुलिस में तालमेल का अभाव
सीआरपीएफ के आला अधिकारी भले ही यह बयान दे रहे हों कि अब राज्य पुलिस के साथ बेहतर तालमेल किया जाएगा। लेकिन इस संबंध में पुराना अनुभव कुछअच्छा नहीं है। केंद्रीय सुरक्षा बल इन इलाकों में अपनी डफली अपना राग अलापते नजर आते हैं। हालयिा दिनों में सीआरपीएफ ने कुछ कोशिशें ग्रामीणों के बीच अपनी विश्वसनीयता बनाने के लिए की थीं लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। यही कारण है कि नक्सली सबसे अधिक राज्य के विशेष पुलिस अधिकारियों से खौफ खाते हैं। यही कारणहै कि सलवा जुडूम और एसपीओ का नक्सलियों के हमदर्द पुरजोर विरोध करते हैं। सीआरपीएफ के जवान तो इन नक्सलियों के लिए सबसे आसान टार्गेट माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन का कहना है कि ‘दंतेवाड़ा मामले में सीआरपीएफ को भारी क्षति इसलिए पहुंची क्योंकि जवान जमीनी स्थिति का आकलन नहीं कर पाए। वे मुठभेड़ स्थल का अनुमान नहीं लगा पाए और जाल में फंस गए। हम आपरेशन ग्रीन हंट को अब अधिक मुस्तैदी से चलाएंगे।
नक्सलियों को धन मुहैया कराते एनजीओ
एक ओर प्रदेश स्तर से लेकर केंद्रीय सरकार नक्सलियों पर नकेल कसने की बात करती है, लेकिन विभिन्न एनजीओ के माध्यम से विदेशों से मिलने वाले धन के बल पर नक्सली अपने मंसूबों को पालने में सक्षम हो रहे हैं। हालिया घटनाक्रम में इस प्रकार के संकेत मिल रहे हैं कि नक्सली संगठनों को विदेशों से पैसा मिल रहा है और उसका माध्यम कई गैर सरकारी स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) हैं। जानकारों का कहना है कि कुछ गैर सरकारी संगठनों द्वारा जनजातियों के कल्याण के नाम पर लिए जा रहे विदेशी धन का कुछ हिस्सा नक्सलियों के पास पहुंच रहा है। जाहिरतौर पर कोई भी संगठन बगैर आर्थिक मदद के नहीं चल सकता। सो, नक्सली संगठनों को भी विदेशों से धन मिलना कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता। केंद्र और राज्य सरकार की मदद से चलने वाली ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जैसी योजनाओं का धन भी सीधे-सीधे नक्सलियों के पास पहुंचता है। यही कारण है कि इंद्रावती नेशनल पार्क जैसे धूर नक्सली इलाके में टाइगर कंजर्वेशन के नाम पर आबंटित करोड़ों की राशि कहां जाती है, किसी को पता नहीं है। सरकारें देश के दुर्गम इलाकों तक अपनी योजनाओं के क्रियान्वयन की बात करती हैं लेकिन जब नक्सलियों के कब्जे वाले दुर्गम आदिवासी इलाकों में जाकर स्थिति का पता लगाया तो मामला वही ढाक के तीन पात ही नजर आता है। यानी विकास कार्यों पर खर्च की गईराशि कहां चली जाती है, इसका कोई पता नहीं। हां, कागजात जरूर तैयार रहते हैं। जानकार बताते हैं कि ग्राम पंचायत स्तर पर खर्च होने वाली राशि का 8 0 फीसदी सीधे नक्सलियों के पास पहुंच जाता है।
वाम दल यानी हाथी के दांत
नक्सली वारदातों से यह साफ हो गया है कि वामपंथियों के खाने के दांत अलग हैं और दिखाने के अलग। सीपीएम के कर्ताधर्ता नक्सलियों से किसी भी प्रकार के संबंधों से इंकार करते हैं। सीपीएम की राष्ट्रीय कांग्रेस में इस आशय का प्रस्ताव पास हो चुका है। लेकिन क्या जमीनी हकीकत में ऐसा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि तृणमूल कांग्रेस की तरफ नक्सलियों के रूझान के कारणवामदल ज्यादा परेशान हैं। क्योंकि पश्चिम बंगाल की सत्ता जाने का सदमा झेलना सीपीएम के बस का नहीं है। इसका एक ओर उदाहरण तब सामने आया जब सीआरपीएफ जवानों की शहादत पर जहां पूरा देश गम में डूबा हुआ था वहीं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कैम्पस में कुछ धूर वामपंथी विचारधारा वाले छात्र संगठनों ने इस नरसंहार पर जश्न मनाया। इस मसले पर विवि परिसर में छात्र संगठनों के बीच झड़प भी हो गई। दो छात्र संगठनों डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन (डीएसयू) और ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा) ने सुरक्षाबलों के नक्सलविरोधी अभियान ग्र्रीन हंट के खिलाफ विवि कैम्पस में ही एक सभा का आयोजन किया। यहां नक्सल समर्थक छात्र समूह जवानों के कत्लेआम पर जश्न मना रहा था।
बंगाल की सत्ता पर पिछले तीन दशक से वाम मोर्चा काबिज है और इसी दरम्यान नक्सली गतिविधि भी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती दिखीं। पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में जब नक्सलियों का हस्तक्षेप अपनी हदें पार करने लगा तो केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप कर ऑपरेशन लालगढ़ चलाया। इस आपरेशन में लगभग १००० जवानों को लगाया गया। काफी विवाद हुआ। लेफ्ट समर्थित बुद्धिजीवियों ने अपनी सारी बुद्धिमत्ता इस आपरेशन के खिलाफ झोंक दी। कुछ दिन बाद ही बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने अपने तथाकथित वोट बैंक को बिखरता देख पूरे ऑपरेशन पर सवालिया निशान लगा दिया। लालगढ़ को तो नक्सलियों के कब्जे से मुक्त कराया गया परन्तु सिर्फ शाबासी बटोरने तक। बाद में यह आपरेशन भी काल की भेंट चढ़ गया।

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

कांग्रेसी मायाजाल में दफ़न शास्त्री की मौत

साप्ताहिक विज्ञापन की दुनिया, नागपुर के १० अप्रैल के अंक में प्रकाशित

पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की मौत का रहस्य हमेशा से भारत की जनता के लिए रहस्य ही रहा है। अब यह रहस्य और गहरा गया है। भारत सरकार सुभाषचंद्र बोस और लालबहादुर शास्त्री जैसे महापुरुषों के जीवन को इतना रहस्यमय क्यों मानती है? क्या इसकी वजह यह है कि अगर रहस्य उजागर कर दिए गए तो देश का इतिहास फिर से लिखना प‹डेगा और शास्त्रीजी और नेताजी उसमें जवाहरलाल नेहरू से भी ब‹डे नायक बन कर उभरेंगे? कांग्रेस को गांधी-नेहरू वंश के बाहर का नायक पसंद नहीं है। वह तो फिरोज गांधी को भी भूल गई है जिनकी पत्नी प्रधानमंत्री बनीं, बेटा प्रधानमंत्री बना और बहू सोनिया गांधी आज की तारीख में देश की सबसे ब‹डी नेताओं में से एक हैें। कांग्रेस ने सदैव अपने आभामंडल के अनुसार ही इतिहास को तो‹डामरो‹डा है। अब लालबहादुर शास्त्री के परिवार के सदस्यों खासकर शास्त्री की बेटी सुमन qसह के बेटे सिद्धार्थ qसह ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत भारत सरकार से मांगी गई जानकारी को यह कहकर नहीं दिए जाने को गंभीरता से लिया है कि अगर दिवंगत शास्त्री की मौत से जु‹डी जानकारी को सार्वजनिक किया जाएगा, तो इसके कारण विदेशी रिश्तों को नुकसान और देश में ग‹डब‹डी हो सकती है।

१० जनवरी १९६६ ! अहम दिन और ऐतिहासिक तारीख ! पाकिस्तान के नापाक इरादों को हिमालय की बर्फ और थार के रेगिस्तान में दफनाने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने सोवियत संघ की पहल पर एक ऐतिहासिक कारनामे पर अपनी मुहर लगा दी। इसकी चर्चा पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। सच मानें तो दुनियाभर के देश अचम्भित नजरों से देख रहे थे। इस अजीम शख्सियत-भारत के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को! इस सामान्य कद-काठी और दुबली काया वाली शख्सियत में साहस का अटूट माद्दा किस कदर भरा था। इन्होंने देश की बागडोर संभालने में जिस समझदारी और दूरंदेशी वाली सूझ-बूझ का परिचय दिया, वह ऐतिहासिक है। शास्त्रीजी ने अपने जिन फौलादी इरादों से पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी वह पाकिस्तान के लिए कभी न भूलने वाला एक सबक है।शास्त्रीजी की मौत के संबंध में आधिकारिक तौर पर जो जानकारी जनता तक पहुंची है, उसके अनुसार ११ जनवरी, १९६६ को दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की मौत दिल का दौरा प‹डने से उस समय हुई थी, जब वह ताशकंद समझौते के लिए रूस गये थे। पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी ललिता शास्त्री ने आरोप लगाया था कि उनके पति को जहर देकर मारा गया है। ताशकंद में भारत-पाक समझौता करने के लिए लगभग बाध्य किए गए भारतीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की वहां के एक होटल में आधी रात को दिल का दौरा प‹डने से हुई मौत को भारत सरकार एक राजकीय रहस्य मान कर चल रही है।दिवंगत प्रधानमंत्री के पुत्र सुनील शास्त्री ने कहा कि दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री उनके पिता ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकप्रिय नेता थे। आज भी वह या उनके परिवार के सदस्य कहीं जाते हैं, तो हमसे उनकी मौत के बारे में सवाल पूछे जाते हैं। लोगों के दिमाग में उनकी रहस्यमय मौत के बारे में संदेह है, जिसे स्पष्ट कर दिया जाए तो अच्छा ही होगा।दिवंगत शास्त्री के पोते सिद्धार्थनाथ qसह ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने देश में ग‹डब‹डी की आशंका जताकर, जिस तरह से सूचना देने से इंकार किया है, उससे यह मामला और गंभीर हो गया है। उन्होंने कहा कि हम ही नहीं, बल्कि देश की जनता जानना चाहती है कि आखिर उनकी मौत का सच क्या है। उन्होंने कहा कि यह भी हैरानी की बात है कि जिस ताशकंद समझौते के लिए पूर्व प्रधानमंत्री गए थे, उसकी चर्चा तक क्यों नहीं होती है। उल्लेखनीय है कि सीआईएज आई ऑन साउथ एशिया के लेखक अनुज धर ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत सरकार से स्व. शास्त्री की मौत से जु‹डी जानकारी मांगी थी। इस पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह कहकर सूचना सार्वजनिक करने से छूट देने की दलील दी है कि अगर दिवंगत शास्त्री की मौत से जु‹डे दस्तावेज सार्वजनिक किए गए, तो इस कारण विदेशी रिश्तों को नुकसान, देश में ग‹डब‹डी और संसदीय विशेषाधिकार का हनन हो सकता है। सरकार ने यह स्वीकार किया है कि सोवियत संघ में दिवंगत नेता का कोई पोस्टमार्टम नहीं कराया गया था, लेकिन उसके पास पूर्व प्रधानमंत्री के निजी डॉक्टर आरएन चुग और रूस के कुछ डॉक्टरों द्वारा की गई चिकित्सकीय जांच की एक रिपोर्ट है।धर ने प्रधानमंत्री कार्यालय से आरटीआई के तहत यह सूचना भी मांगी है कि क्या दिवंगत शास्त्री की मौत के बारे में भारत को सोवियत संघ से कोई सूचना मिली थी। उनको गृह मंत्रालय से भी मांगी गई ये सूचनाएं अभी तक नहीं मिली हैं कि क्या भारत ने दिवंगत शास्त्री का पोस्टमार्टम कराया था और क्या सरकार ने ग‹डब‹डी के आरापों की जांच कराई थी। सूचना के अधिकार के तहत भी इस मौत के कारणों और स्थितियों की जानकारी नहीं दी जा रही। यह नहीं बताया जा रहा कि भारत के प्रधानमंत्री के होटल के कमरे में फोन या घंटी तक क्यों नहीं थी? उनके शरीर पर नीले दाग किस चीज के थे? इस अचानक हुई मौत के बाद शव का पोस्टमार्टम तक क्यों नहीं करवाया गया? क्या समझौते के बाद देश को जय जवान का नारा देने वाले शास्त्री जी ने अपने चश्मे के कवर में एक लाइन का नोट लिख कर रखा था जिसमें लिखा था कि आज का दिन मेरे देश के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है? १९६५ की ल‹डाई में भारत ने पाकिस्तान को निर्णायक रूप से पराजित किया था और बहुत सारी ऐसी जमीन भी छीन ली थी जिस देश पर १९४७ में पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि qसह के अनिर्णय का लाभ उठा कर कब्जा कर लिया था। इसमें करगिल भी था। शास्त्री जी को तत्कालीन सोवियत संघ के नेताओं ने लगभग बाध्य किया कि वे यह जमीन वापस कर दें। शास्त्रीजी करगिल कस्बे को जैसे तैसे बचा पाए थे। अपने दस्तखत से शहीद हुए सैनिकों का बलिदान निरस्त करने का दुख उनकी मृत्यु का कारण बना। पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी ललिता शास्त्री ने आरोप लगाया था कि उनके पति को जहर देकर मारा गया है।नेताजी सुभाष चंद बोस के मामले में भी भारत सरकार का रवैया लचर रहा है। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फरार मुजरिम घोषित किया था। कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हो चुके और महात्मा गांधी की जिद का आदर करते हुए इस्तीफा देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस का विश्वास इस बात से खत्म हो गया था कि अqहसा के जरिए अंग्रेजों को भगाया जा सकता है। उन्हें जबलपुर में जहां आज मध्य प्रदेश पर्यटन निगम का होटल कलचुरी है, के पास एक मकान में नजरबंद करके रखा गया था जहां से वे निकल भागे थे और रेलों, बसों और पैदल यात्रा करते हुए अफगानिस्तान के रास्ते रूस जा पहुंचे थे। और जर्मनी में अडोल्फ हिटलर से मुलाकात करने में सफल हुए थे। यह सच है कि हिटलर ने दुश्मन के दुश्मन को दोस्त मानते हुए सुभाष चंद्र बोस को आजाद वृहद् फौज बनाने में मदद की थी और इस फौज के प्रारंभिक सैनिक वे थे जो विश्व युद्ध में चीन के कब्जे में आ गए थे। चीन ने उन्हें रिहा कर आजाद qहद फौज का सिपाही बना दिया। इसके अलावा नेताजी की अपनी एक विश्वासपात्र कमान भी थी। नेताजी एक दिन जापान के ताईपेई हवाई अड्डे से उड़े और उसके बाद क्या हुआ इसके बारे में निर्णायक रूप से किसी को कुछ पता नहीं हैं? दस्तावेज मौजूद है लेकिन वे भारत सरकार के ताले में बंद हैं। सूचना के अधिकार के तहत भी उनकी जानकारी नहीं दी जा सकी। नेताजी के गायब होने के बारे में पहले शाहनवाज कमीशन और फिर हीरेन मुखर्जी कमीशन बिठाया गया मगर उन्हें भी यह दस्तावेज नहीं सौपे गए। सवाल पूछा जाना चाहिए कि अगर दस्तावेज नहीं देने थे तो फिर यह आयोग बिठाए ही क्यों गए थे? लालबहादुर शास्त्री के मामले में भी भारत सरकार का रवैया कुछ अलग सा है। चूंकि शास्त्रीजी के अस्तित्व को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता, भारत-पाक के निर्णायक युद्ध को खारिज नहीं किया जा सकता, इसलिए इतिहास में उनका जिक्र है। बच्चों को स्कूल में प‹ढाया जाता है कि जय जवान, जय किसान का नारा किसने दिया किन्तु स्वतंत्र भारत के निर्माण में उनकी भूमिका नेहरू के मुकाबले गौण ही मानी जाती है।
सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी
धर ने प्रधानमंत्री कार्यालय से आरटीआई के तहत यह सूचना भी मांगी है कि क्या उनकी मौत के बारे में भारत को तत्कालीन सोवियत संघ से कोई सूचना मिली थी? उनको गृह मंत्रालय से भी मांगी गई ये सूचनाएं अभी तक नहीं मिली हैं कि क्या भारत ने दिवंगत नेता का पोस्टमार्टम कराया था और क्या सरकार ने ग‹डब‹डी के आरापों की जांच कराई थी?

बुधवार, 31 मार्च 2010

दुर्लभ बीमारियां - इंतजार मौत का

दुर्लभ बीमारियां - इंतजार मौत का
भारत में कुछ दुर्लभ बीमारियों ने ज‹डें जमानी शुरू कर दी हैं। इन बीमारियों के हालात यह हैं कि कई मामलों में चिकित्सक भी जांच नहीं कर पाते हैं। जब जांच की ही यह हालत है तो फिर उपचार की बात करना भी बेमानी है। देरसवेर जब असली बीमारी का पता चलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। और पता चलने के बाद भी उपचार इतना महंगा है कि यह आम आदमी के बस का नहीं है। अब जो लोग इस प्रकार की अनुवांशिक बीमारियों से पी‹िडत हैं, मरीज के साथ ही उनका परिवार भी परेशानियां झेलता है। परिवार का हर सदस्य कहीं न कहीं इसके कारण प्रभावित होता है। इन परिवारों के लिए qजदगी के मायने बदल जाते हैं। इन दुर्लभ बीमारियों का उपचार अगर है तो वह भी सिर्फ अमेरिका में ही संभव है। बालीवुड में भी इन दिनों दुर्लभ बीमारियों पर फिल्में बन रही हैं। आमिर खान की फिल्म तारे जमीं पर में डायस्लेक्सिक्स, अमिताभ बच्चन की फिल्म पा में प्रोगेरिया, शाहरुख खान की फिल्म माई नेम इज खान में एस्पर्जर के बाद अब रितिक रोशन की फिल्म गुजारिश का इंतजार है। गुजारिश में रितिक रोशन पैराप्लेजिक के मरीज की भूमिका में है।
दुर्लभ प्रकार की बीमारियों से इक्के-दुक्के लोग ही पी‹िडत रहते हैं। विश्वभर में ऐसी दुर्लभ बीमारियों के कुछ ज्यादा नहीं ८००० लोग ही पी‹िडत हैं। भारत में अब इनकी दस्तक से कई गंभीर प्रश्न ख‹डे हो गए हैं। सिर्फ मरीज ही नहीं वरन पूरे परिवार का सामाजिक ताना-बाना इससे बिग‹ड जाता है। निधि का सीमित संसार१० वर्षीय निधि के पिता प्रसन्ना बताते हैं कि जब उन्हें यह पता चला कि उनकी पुत्री किसी दुर्लभ बीमारी से पी‹िडत है तो उन्हें पहले तो कुछ समझ में नहीं आया। सिर्फ यही समझ में आया कि बेटी को कोई ब‹डी बीमारी हो गई है। दरअसल, इस बीमारी में मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। बच्चों और किशोरों में लीवर ब‹डा हो जाता है और इसकी परिणति गंभीर हृदयाघात में हो जाती है और यह असामयिक मौत का कारण भी बन जाते हैं। बंगलूरु की निधि ने कभी घर के बाहर कदम नहीं रखा है। अपने उम्र के अन्य बच्चों की तरह वह अपने बचपन को व्यक्त नहीं कर सकती। कक्षा चौथी की छात्रा निधि को स्कूल तक छो‹डने उसकी मां जाती है। मां उसे पहले माले पर स्थित क्लास रूम तक छो‹ड कर आती है। निधि न तो चल पाती है और न ही ख‹डी हो पाती है। उससे मिलने सिर्फ फीजियोथेरेपिस्ट ही आता है। उसके दो दोस्त भी हैं लेकिन वे तभी निधि के साथ खेलने आते हैं जब उन्हें घर के बाहर नहीं खेलना होता है। हर रात को निधि वेंटिलेटर पर रहतीहै। वह आधा घंटे से अधिक टीवी नहीं देख पाती है। निधि दुखी स्वर में बताती है कि उसे चित्रकारी पसंद है। लेकिन एक्सरसाइज, होमवर्क, समय पर भोजन और समय पर सोने की पाबंदियों के कारण वह ड्राइंग के लिए समय नहीं निकाल पाती है। निधि यह सब कुछ एक ही सांस में कह जाती है। साफ पता चलता है कि उसे उच्चारण करने में भी परेशानी होती है। इन सबके बावजूद निधि एक डाक्टर बनना चाहती है और अपने जैसी बीमारी के बच्चों का इलाज करना चाहती है। निधि के स्कूल के शिक्षक भी उसके साथ सहयोग करते हैं। वे कभी भी उसे अलग होने या बीमार होने का एहसास नहीं होने देते हैं। निधि के पिता प्रसन्ना और मां शारदा काफी मजबूती से हालात का सामना कर रहे हैं। वे चेहरे पर मुस्कान लिए स्थिति पर काबू पाते हैं। इस दंपति की हालत यह है कि अब दूसरी संतान उत्पत्ति का खतरा मोल नहीं लेना चाहते हैं। उनका कहना है कि उन्हें डर है कि यदि दूसरी संतान भी इस प्रकार की बीमारी से ग्रस्त हुई तो दिक्कत ब‹ढ जाएगी और वे निधि पर भरपूर ध्यान नहीं दे पाएंगे। निधि एक साधारण कन्या की तरह ही पैदा हुई थी। दो साल तक जब वह चल नहीं पाई तो पिता प्रसन्ना ने एक बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क किया। रोग के दुर्लभ होने के कारण डाक्टर को भी नहीं पता था। सो उसने कह दिया कि कुछ बच्चे थो‹डी देर से चलना शुरू करते हैं इसलिए घबराने की कोई जरूरत नहीं है। ब‹डे अस्पताल में जांच कराने पर पता चला कि निञ्च्धि ग्लाइकोजेन स्टोरेज डिसार्डर टाइप २ से ग्रस्त है। यह बीमारी शरीर में शक्कर के एक रूप ग्लाइकोजेन के निर्माण के कारण होता है। चिकित्सकों के अनुसार यह बीमारी दिमाग को असर नहीं करती है इसलिए इसमें एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी कारगर साबित होती है। लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वह कब तक जीवित रहेगी। प्रतीक-प्रदीप की भी यही कहानीदिल्ली के मंजीत qसह के दो बच्चे १९ वर्षीय प्रतीक औ़र १७ वर्षीय प्रदीप भी एक गंभीर दुर्लभ बीमारी एमपीएस-१ से पी‹िडत हैं। यह भी एक दुर्लभ अनुवांशिक बीमारी है। काफी जांच के बाद पता चला कि ये दोनों ही एमपीएस २ नाम के अनुवांशिक बीमारी से पी‹िडत हैं। मंजीत qसह अपने पुत्रों का सही तरीके से इलाज नहीं करा पाए। क्योंकि इस बीमारी में दी जाने वाली थेरेपी २ लाख रुपए प्रति आवृत्ति थी। हर पंद्रह दिनों में इसकी आवृत्ति करानी प‹डती है। इस हिसाब से उसके दोनों पुत्रों के लिए प्रति माह ८ लाख रुपए की आवश्यकता थी। पुत्रों की उम्र अधिक हो जाने के कारण उसे धर्मादाय संस्थाओं से मदद भी नहीं मिली क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएं बच्चों के लिए मदद करती हैं। दोनों ही बच्चे श्रवण व्याधि, इनसोम्निया, त्वचा, बाल की बीमारियों से पी‹िडत हैं। सामान्य qजदगी जी रहे अभिभावकों से प्रतीक की पैदाइश भी सामान्य बच्चों की तरह ही थी। पांच साल की उम्र में प्रतीक पतला होने लगा तो अभिभावकों के लगा कि खानपान की विसंगतियों के कारण ऐसा हो रहा है। मंजीत को तब शक हुआ जब उसने देखा कि प्रतीक अपनी हथेली पूरी तरह नहीं खोल पाता है। वे अपने बच्चे को लेकर एक आर्थोपेडिक के पास गए। तो इस डाक्टर का भी जवाब था कि घबराने की जरूरत नहीं है। हड्डियों के क‹डे हो जाने के कारण ऐसा हो रहा है। आप्थेलमोलोजिस्ट ने भी कहा कि गंभीर होने जैसा कुछ नहीं है। इसके बाद वे जब कार्डियोलाजिस्ट के पास पहुंचे तो उसने पाया कि हृदय के एक वाल्व में छेद है। और हृदय सामान्य से ब‹डा है। इस चिकित्सक ने ही एमपीएस नामक बीमारी का शक जाहिर किया। १९९५ में वे सर गंगाराम अस्पताल पहुंचे। एम्स ने एमपीएस १ नामक बीमारी से ग्रस्त होना बताया। मंजीत बताते हैं कि उनका छोटा बेटा उस समय दो साल का था। चिकित्सकों ने उसकी जांच भी कराने को कहा तो उसका टेस्ट भी पाजिटिव आया।सन १९९९ तक एमपीएस- १ का कोई भी उपचार उपलब्ध नहीं था। २००६ तक दोनों ही भाई एमपीएस- २ से पी‹िडत हो गए थे। उस समय उनके हर्निया में समस्या थी। इस कारण एक तरफ का हर्निया का आपरेशन किया गया। एमपीएस- २ ने मरीजों को शारीरिक और मानसिक रूप से विकृत कर दिया। उनकी शारीरिक वृद्धि रुक गई। लेकिन उनके अंगों का विकास सामान्य रूप से होता गया। इस बीमारी में हड्डियां इतनी कमजोर हो जाती हैं कि वे बिना किसी दबाव के भी टूट जाती हैं। प्रदीप की कमर में इसी प्रकार का एक फ्रैक्चर हो गया था जिसके ठीक होने में वर्षों लग गए थे। इन दोनों भाइयों ने अब प‹ढाई भी छो‹ड दी है। ये दोनों ही कार्टून फिल्में देखते हैं। इंटरनेट और वीडियो गेम खेलते हैं।ऐसी गंभीर अनुवांशिक बीमारियों में मरीज के साथ उनका पूरा परिवार ही पी‹िडत हो जाता। समाज का इनकी ओर देखने के नजरिये में बदलाव की जरूरत है। सरकार को भी ऐसी दुर्लभ बीमारियों की ओर ध्यान देना चाहिए। कम से कम यह तो सुनिश्चित करना चाहिए कि इलाज के अभाव में किसी की मौत न हो।
०००००००००००००

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009

मेरी भांजी के जन्म दिन पर शुभकामना

नया सफर हो रचनात्मक

जीवन के वृहद सफर का
एक पूरा हुआ कालखंड
जिसमें था निहित
संपूर्णता का आधार स्तंभ
अभिभावकों के सक्षम
अनुभवों के संग
अब करनी है फतह
इस जिंदगी की जंग
जीवन के पुष्पित, पल्लवित
होते हैं कई रंग
उन्हें करना है आत्मसात
समृद्ध प्रकृति के मानिंद
एक कुम्हार की मृदा
अब आकार ले चुकी है
ॐ साईंनाथ की सुरभि
साकार हो चली है।
तुम्हें जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
पूरी हो हर कामना, यही हैं दुआएं।।
- अंजू मामा

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

मौनी गुड़िया का धमाल

मौनी गुड़िया का धमाल
एक प्यारी सी बच्ची है। उसका नाम तो गुड़िया है लेकिन कुछ दिनों से वो इतनी गुपचुप रहने लगी है कि लोग (खासकर मैं) उसे मौनी गुड़िया के नाम से पुकारने लगा हूं। अब मेरी तो उम्र हो गई है। यानी कि उम्र काफी हो गई है। वृद्धाश्रम की ओर कदम तो नहीं बढ़े हैं लेकिन इतना जरूर है कि उस आश्रम की आहट मिलने लगी है। इसलिए तो उस गुड़िया को मैं गुड़िया कहता हूं। तो बात उसके मौनी स्वभाव की हो रही थी। वैसे स्वभाव से वो मौनी नहीं है। खूब बोलती है। इतना बोलती है कि बस पूछो मत। हर बात पर क्यों, क्या, कैसे की रट। मानो गुड़िया न हो कोई पत्रकार हो जिसे समाचार लिखते समय इन बातों का ख्याल रखना पड़ता है कि कोई घटना कब हुई, क्यों हुई और कैसे हुई। एक महीने से वो बकबकी गुड़िया मौन हो गई है। इसका कारण यह है कि मैं उसे छोड़कर दूसरे शहर कुछ दिनों के लिए चला गया था। बस हो गई आफत.....। इतना नाराज हुई कि अब पूछो मत। लगता है उसे सदमा लगा। वो सदमा पिक्चर की तरह। इसलिए उसका बोलना बंद हो गया। फिर उसे मनाने के लिए अपनी एक आर्ट फोटो भेजी लेकिन देखिए तो उसके सदमे की गहराई उसने कुछ नहीं बोला। अब भी वो मौन है। हमने कहा डाक्टर को दिखा देते हैं लेकिन कोई फायदा नहीं। अब हम उस फोटो की तरह शून्य में निहारने के अलावा कर ही क्या सकते हैं। तो निहार रहे हैं। वो फोटो मैं आपके लिए भी लोड कर रहा हूं। देख लीजिए भरी दोपहरी। तापमान ४५ पर और एक अच्छा-खासा इन्सान आसमान को घूर रहा है किसी के इंतजार में कि कुछ तो बोलेगी मौनी गुड़िया। चलो बाकी बातें बाद में।