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शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

देश कौन चला रहा हैः सरकार या तेल कंपनियां


मई माह में यह रिपोर्ट साप्ताहिक चौथी दुनिया की कवर स्टोरी थी. आज फिर हुई पेट्रोल दर वृद्धि ने इसकी याद दिला दी.

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सरकार है, जो जनता के खर्च को बढ़ा रही है और जीवन स्तर को गिरा रही है. वैसे दावा तो यह ठीक विपरीत करती है. वित्त मंत्री कहते हैं कि सरकार अपनी नीतियों के ज़रिए नागरिकों की कॉस्ट ऑफ लिविंग को घटाना और जीवन स्तर को ऊंचा करना चाहती है. पर वह कौन सी मजबूरी है, जिसकी वजह से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ाए जाते हैं. पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी कहते हैं कि वह अर्थशास्त्र और लोकप्रियता के बीच फंस गए. वैसे यह अच्छा बहाना है. वह कहते हैं कि दाम इसलिए बढ़ाए गए हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल का दाम बढ़ गया है. यह एक झूठ है. वह इसलिए, क्योंकि स़िर्फ पेट्रोल को सरकार ने डी-रेगुलेट किया है. मतलब यह कि स़िर्फ पेट्रोल की क़ीमत का रिश्ता अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत से है. मिट्टी तेल, डीजल और रसोई गैस का जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से कुछ लेना-देना नहीं है तो फिर सरकार ने डीजल और रसोई गैस की क़ीमतों में क्यों इज़ा़फा किया? सरकार इस झूठ के साथ-साथ कई और झूठ फैला रही है. एक झूठ यह है कि तेल कंपनियां घाटे में चल रही हैं. मई के महीने में महंगाई की दर 9 फीसदी के आसपास थी. डीजल के दाम बढ़ते ही सारी चीज़ों के दामों में इज़ा़फा हो गया. महंगाई की दर 10 फीसदी से ज़्यादा हो जाए, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है. इस बीच प्रधानमंत्री खुद के चुने हुए पांच अ़खबारों के संपादकों से बातचीत करते हैं. वह उन्हें बताते हैं कि मार्च 2012 तक महंगाई पर नियंत्रण कर लिया जाएगा. प्रधानमंत्री ने साथ में एक शर्त भी रख दी कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत में बढ़ोत्तरी नहीं होती है.

ऐसा लगता है कि तेल कंपनियों को सरकार नहीं चलाती है, तेल कंपनियां ही सरकार को चला रही हैं. अगर ऐसा नहीं है तो क्या वजह है कि जब देश पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है तो ऐसे में तेल की क़ीमत बढ़ा दी जाती है. जबसे मनमोहन सिंह की सरकार बनी, तबसे वह पेट्रोलियम से सरकारी नियंत्रण हटाने की जुगत में लग गई. डीजल और किरोसिन के दाम बढ़ते ही देश में हाहाकार मचा गया, लेकिन एक देश की सरकार है, जो आंकड़े दिखाकर सफलता का ढिंढोरा पीट रही है, ग़रीबों का मज़ाक उड़ा रही है.

पांच राज्यों के चुनाव खत्म हुए और केंद्र की यूपीए सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा दिए. सरकार कहती है कि तेल कंपनियों को घाटा हो रहा है. इसके बाद प्रणव मुखर्जी ने राज्य सरकारों से टैक्स कम करने की अपील क्यों की? कांग्रेस शासित दो राज्यों में दाम कम भी किए गए. पता नहीं, राजनीतिक दलों को यह भ्रम कैसे हो गया है कि देश की जनता मूर्ख है. क्या सरकार ऐसे फरमान जारी करके यह साबित करना चाहती है कि वह जनता के दु:ख-दर्द के प्रति चिंतित है? असलियत तो यह है कि सरकार जनता की समस्याओं को लेकर संवेदनहीन हो चुकी है. उसकी प्राथमिकता केवल निजी कंपनियों और उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाना है.

जब पेट्रोल की क़ीमत बढ़ाई गई, तब सरकार ने देश से सबसे बड़ा झूठ बोला कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ गई है. एक बात समझ में नहीं आई कि जिस दिन पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए, उस दिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 112 डॉलर प्रति गैलन थी. आज इसकी क़ीमत लगभग 90 डॉलर प्रति गैलन है. सरकार अगर यह दलील देती है कि कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने से दाम बढ़ाए गए हैं तो अब जब इसकी क़ीमत में गिरावट आई है तो उसे देश में पेट्रोल की क़ीमत कम करनी चाहिए थी. सवाल यह उठता है कि क्या सरकार तेल उस तरह खरीदती है, जिस तरह घर में सब्ज़ियां खरीदी जाती हैं. क्या भारत हर दिन के हिसाब से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से कच्चा तेल खरीदता है. हम कच्चा तेल खरीदते हैं, उसे देश में लेकर आते हैं, जामनगर जैसी रिफाइनरी में प्रोसेसिंग के बाद उसे ट्रकों में भरा जाता है, चेकिंग वग़ैरह होती है, फिर कहीं उसे पेट्रोल पंपों में भेजा जाता है. कच्चा तेल खरीदने और उसे पेट्रोल पंपों तक पहुंचाने में कम से कम 75 दिनों का व़क्त लगता है. सवाल यह उठता है कि मान लीजिए, तीन दिन पहले कच्चे तेल का दाम बढ़ जाता है तो उसका असर 75 दिनों के बाद दिखना चाहिए. सरकार को इतनी हड़बड़ी क्यों मची है कि वह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में दाम बढ़ते ही देश में क़ीमत बढ़ा देती है, लेकिन जब दाम गिर जाते हैं तो फिर रोलबैक नहीं करती? पेट्रोल की क़ीमत बढ़ाने के साथ-साथ उसे तेल आपूर्ति करने वाली कंपनियों के साथ किए गए क़रार को भी सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि देश की जनता को यह पता चले कि सरकार ने किस रेट पर कच्चा तेल खरीदने का सौदा तय किया है.

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जब कच्चे तेल के दामों में वृद्धि होती है तो सरकार तुरंत पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ा देती है, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दामों में गिरावट आती है तो सरकार उसे देश में लागू क्यों नहीं करती.

समझने वाली बात यह है कि क्या भारत सरकार तेल को घर के सामान की तरह खरीदती है. दुकानदार कहता है कि आज दाम बढ़ गए हैं तो साबुन के दाम दो रुपये ज़्यादा हो गए हैं. जितने भी तेल के सौदे होते हैं, उन्हें फाइनेंस के टर्म में कमोडिटी डेरीवेटिव्स कहते हैं, उसे हम फ्यूचर्स कहते हैं. कहने का मतलब यह है कि जब सौदेबाज़ी होती है, वह किसी सट्टे की तरह होती है. बेचने वाला और खरीदने वाला अनुमान लगाता है. दोनों ही अनुमान लगाते हैं कि अगले सात महीनों में पेट्रोल का दाम क्या होने वाला है. खरीदने वाले की मजबूरी यह है कि उसे पता है कि पूरे मुल्क की ज़रूरत क्या है. भारत के अनुभव से यह साबित हो चुका है कि जब तक कच्चे तेल की क़ीमत 90 डॉलर प्रति गैलन रहे, तब तक भारत की इकोनॉमी पर कुछ भी फर्क़ नहीं पड़ता है. ऐसा इसलिए, क्योंकि जब अमेरिका में गिरावट आई, तब वे 40 डॉलर प्रति गैलन से कच्चे तेल की क़ीमत 90 डॉलर तक लेकर चले गए. यह वायदा कारोबार की वजह से हुआ. वायदा कारोबार करने वालों ने एक गिरोह खड़ा कर लिया. ये लोग असल में तेल नहीं खरीदते, बल्कि काग़ज़ खरीदते हैं और जब वास्तव में तेल लेने का समय आता है तो ये उसे बेच देते हैं. अक्सर होता यह है कि एक निर्धारित समय पर डिमांड अचानक से बढ़ जाती है और तेल के दाम बढ़ जाते हैं. हालत यह हो गई कि जो तेल 40 डॉलर प्रति गैलन बिक रहा था, इस वायदा कारोबार की वजह से उसकी क़ीमत 140 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई. तेल की क़ीमत तब बढ़ती है, जब इसकी खपत बढ़ती है. दो सौ साल तक कच्चे तेल की क़ीमत 40 डॉलर प्रति गैलन से कम रही. सवाल यह उठता है कि पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या हुआ कि इसकी क़ीमत आसमान छूने लगी. कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने का कारण खपत में वृद्धि नहीं है, बल्कि वायदा कारोबार है. जबसे अमेरिका के उद्योगपति वायदा कारोबार में शामिल हुए, पेट्रोलियम का बाज़ार उनके हाथों बंधक बन गया.

अगर सरकार भ्रष्टाचार से लड़ना चाहती है तो सबसे पहले उसे पेट्रोलियम मंत्रालय को दुरुस्त करना होगा. देश में पेट्रोल, केरोसिन और डीजल का कारोबार माफिया चलाते हैं. सरकार को जवाब देना चाहिए कि तेल की चोरी और कालाबाज़ारी के चलते हर साल 70,000 करोड़ रुपये का नुक़सान होता है, उसे खत्म करने के लिए उसने क्या किया है.

चलिए एक हिसाब लगाते हैं कि आ़खिर पेट्रोल की सही क़ीमत क्या हो. जिस समय पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए, उस समय अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 112 डॉलर प्रति बैरल थी यानी 5085 रुपये के क़रीब. एक बैरल में 158.76 लीटर होते हैं. तो इसका मतलब है कच्चे तेल की क़ीमत 32 रुपये प्रति लीटर बनती है. तेल कंपनियों के मुताबिक़, कच्चे तेल को रिफाइन करने में 52 पैसा प्रति लीटर खर्च होता है और अगर रिफाइनरी की कैपिटल कॉस्ट को इसमें जोड़ जाए तो तेल की क़ीमत में क़रीब 6 रुपये और जोड़ने पड़ेंगे. इसके अलावा ट्रांसपोर्ट का खर्च ज़्यादा से ज़्यादा 6 रुपये और डीलरों का कमीशन 1.05 रुपये प्रति लीटर. इन सबको अगर जोड़ दिया जाए तो एक लीटर पेट्रोल की कीमत 45.57 रुपये होती है. लेकिन दिल्ली में 63.4 रुपये, मुंबई में 68.3 रुपये और बंगलुरू में 71 रुपये प्रति लीटर की दर से पेट्रोल बिक रहा है. अब सवाल उठता है कि यह पैसा हम क्यों खर्च कर रहे हैं, यह पैसा कहां जा रहा है? इसका जवाब है कि हम टैक्स में दे रहे हैं. यह बहुत ही कम लोगों को पता है कि केंद्र और राज्य सरकार पेट्रोल से कितना टैक्स वसूलती है. कुछ राज्यों में तो 50 फीसदी से ज़्यादा टैक्स लिया जा रहा है. और तो और, यह टैक्स तेल के बेसिक दाम पर लगता है. इसका मतलब यह है कि तेल के दाम बढ़ाने से सरकार को फायदा होता है. फिर सरकार यह घड़ियाली आंसू क्यों बहा रही है कि तेल कंपनियों को नुक़सान हो रहा है. इस टैक्स को तर्कसंगत करने की ज़रूरत है. इससे सरकारी कंपनियों को फायदा होगा, वरना यही समझा जाएगा कि सरकार निजी कंपनियों को लूट मचाने की खुली छूट दे रही है. सवाल तो यह उठता है कि क्या आज तक मुकेश अंबानी या दूसरी अन्य तेल कंपनियों ने यह कहा कि उन्हें घाटा हो रहा है, तेल कंपनियों को घाटे की वजह से बंद करना पड़ सकता है. हक़ीक़त यह है कि निजी कंपनियां ज़्यादातर माल विदेशी बाज़ार में बेचकर मुना़फा कमा रही हैं. आज अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की जो क़ीमत है, उसके मुताबिक़ पेट्रोल का दाम 35 रुपये प्रति लीटर से एक भी पैसा ज़्यादा नहीं होना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत मई 2011 में 112 डॉलर प्रति गैलन थी, जो अब घटकर 90 डॉलर के आसपास हो गई है. आने वाले दिनों में इसकी क़ीमत में और भी गिरावट होने की संभावना है. फिर भी देश में पेट्रोल की क़ीमत गिरने वाली नहीं है. पेट्रोल की क़ीमत में गिरावट तो दूर, तेल कंपनियों के दबाव में सरकार डीजल, केरोसिन और रसोई गैस की क़ीमत भी बढ़ाने को मजबूर हो गई. इसके बाद अगर कोई यह आरोप लगाए कि भारत की सरकार तेल कंपनियों के हाथों की कठपुतली बन गई है तो इसका क्या जवाब होगा. इसके बावजूद बड़ी निर्लज्जता से यह दलील भी जाती है कि तेल कंपनियों को ऩुकसान हो रहा है, ताकि कोई सरकार के फैसले पर सवाल न खड़ा कर सके. तो क्या सरकार ने तेल कंपनियों को हुआ घाटा पूरा करने के लिए पेट्रोल का दाम बढ़ा दिया?

सवाल स़िर्फ क़ीमत बढ़ाने के फैसले का नहीं है. अगर केंद्र सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के बारे में सोचती है तो सबसे पहले उसे पेट्रोलियम मंत्रालय को दुरुस्त करना होगा. देश में पेट्रोल, केरोसिन और डीजल का कारोबार माफिया चलाते हैं. सरकार को इस बात का जवाब देना चाहिए कि तेल की चोरी और कालाबाज़ारी की वजह से हर साल 70,000 करोड़ रुपये का नुक़सान होता है, उसे खत्म करने के लिए उसने क्या किया है. यह सवाल इसलिए उठाना ज़रूरी है, क्योंकि कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र में तेल माफिया ने एक एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को ज़िंदा जला दिया था. तेल की सप्लाई से लेकर पेट्रोल पंप के आवंटन तक की जो पूरी प्रक्रिया है, उसमें पारदर्शिता लाने के लिए सरकार ने क्या किया है. क्या तेल माफिया इसलिए बेलगाम हैं, क्योंकि उन्हें नेताओं का संरक्षण हासिल है. या यूं कहें कि सरकार इसलिए खामोश है, क्योंकि तेल के कारोबार पर देश के राजनीतिक नेताओं का कंट्रोल है. तेल की क़ीमत बढ़ाने से पहले सरकार को इस सेक्टर में मौजूद कालाबाज़ारी को खत्म करने की पहल करनी चाहिए.

पेट्रोल और डीजल का महंगाई से गहरा रिश्ता है. इनके दाम बढ़ते ही ट्रांसपोर्टेशन कास्ट बढ़ जाती है, जिससे सारी चीज़ें महंगी हो जाती हैं. जब देश में पेट्रोलियम का उदारीकरण हुआ तो उस व़क्त देश पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा था. ऐसे समय में उदारीकरण करना सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाता है, अर्थशास्त्र के सारे तर्क भी झुठला देता है. जबसे कच्चा तेल वायदा कारोबारियों की गिरफ्त में आया, तबसे इसकी क़ीमत में भूचाल आ गया, इसकी क़ीमत में कभी स्थिरता नहीं आई. यह अपने आप में एक वजह है कि पेट्रोलियम के उदारीकरण को लागू न किया जाए. लेकिन सरकार पर तेल कंपनियों का, खासकर निजी कंपनियों का दबाव था. सरकार ने नया तरीक़ा निकाला, उसने रंगराजन कमेटी बना दी. इस कमेटी से सरकार को उम्मीद थी कि यह पेट्रोलियम की क़ीमतों और करों के उदारीकरण का सुझाव देगी, लेकिन रंगराजन कमेटी ने उदारीकरण की सलाह नहीं दी. सरकार ने दूसरी कमेटी बना दी. इस बार योजना आयोग के पूर्व सदस्य किरीट पारिख को एक्सपर्ट ग्रुप का प्रमुख बनाया गया. इस बार उदारीकरण का सुझाव दिया गया. सरकार ने तुरंत इस सुझाव को मान लिया. सरकार की तऱफ से दलील दी गई कि तेल कंपनियों को नुक़सान हो रहा है, इसलिए पेट्रोल के दाम को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से जोड़ना ज़रूरी हो गया है. अब सवाल यह है कि सरकार ने ऐसा क्यों किया. सबसे सीधा जवाब तो यही है कि सरकार ने जनता को राहत देने के बजाय निजी तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाना उचित समझा. खासकर उन निजी तेल कंपनियों को, जिन्हें पेट्रोलियम सेक्टर में घुसने और विस्तार करने का हर मौक़ा दिया गया. सरकार की क्या मजबूरी है कि तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाना उसने अपना परम कर्तव्य मान लिया है?

देश की सरकार वर्ल्ड बैंक के इशारे पर काम करने में कोई गुरेज़ नहीं करती, लेकिन उसकी ग़रीबी रेखा की परिभाषा को नहीं मानती. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक़, जिस आदमी की रोजाना आमदनी एक डॉलर से कम है, उसे ग़रीबी रेखा के नीचे माना जाए. एक डॉलर का मतलब 42 रुपये के लगभग की आमदनी. इस परिभाषा के मुताबिक़ भारत के 75 फीसदी लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं, जिनका ज़्यादातर पैसा ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी भोजन पर खर्च होता है. भारत सरकार तो अर्थशास्त्रियों की सरकार है. ग़रीब जनता पर जब महंगाई की मार पड़ती है तो वह क्या करे, कैसे ज़िंदा रहे? दाम बढ़ाने से पहले सरकार को भारत के इन 75 फीसदी लोगों की परेशानी नज़र नहीं आई. भारत में महंगाई दर 9.06 फीसदी है, जो अमेरिका की तुलना में दोगुनी है और जर्मनी से चार गुनी. इसी महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़कर रख दी है, वह केवल किसी तरह अपनी ज़िंदगी जीने को मजबूर है. डीजल और केरोसिन के दाम बढ़ते ही देश की ग़रीब जनता में हाहाकार मच जाता है. क्या सरकार को यह पता नहीं है कि देश के 75 फीसदी लोगों का 80 फीसदी खर्च स़िर्फ खाने-पीने पर होता है. सरकार ने तेल की क़ीमत बढ़ाकर जनता को महंगाई की मार झेलने के लिए बेसहारा छोड़ दिया है. सरकार अगर महंगाई से लड़ना चाहती है तो हर सरकारी विभाग को एक समग्र योजना पर काम करना होगा. सबसे पहले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना होगा. तेल के उत्पादन और वितरण में पारदर्शिता लाने की ज़रूरत है. समस्या यह है कि सरकार भ्रष्टाचार, राजनीति और उद्योग के भंवर में फंस गई है. अपनी ग़लतियों की वजह से वह इस तरह फंसी है, जैसे कोई मकड़ी अपने ही जाल में फंस जाती है. वह जितना हाथ-पैर चलाती है, मुश्किल उतनी ही बढ़ जाती है.

सरकार पर रिलायंस को फायदा पहुंचाने का आरोप

आजकल सरकार बेचैन है. रिलायंस इंडस्ट्रीज को फायदा पहुंचाने का आरोप लग रहा है. आरोप बेबुनियाद नहीं है. आरोप का आधार सीएजी रिपोर्ट है. वैसे यह आधिकारिक रूप से संसद के सामने पेश नहीं हुई है, इसकी खबर मीडिया में लीक हो गई है. सरकार पर आरोप यह है कि उसने जान-बूझकर रिलायंस कंपनी को फायदा पहुंचाया और इससे देश को बहुत बड़ा आर्थिक नुक़सान हुआ. यह नुकसान 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से भी बड़ा है. रिलायंस कंपनी पर सरकार ने दरियादिली का इज़हार कुछ ऐसे किया कि कृष्णा-गोदावरी बेसिन के गैस की क़ीमत तय करने के लिए सचिवों का एक समूह बना. पिछले कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर इसके अध्यक्ष बनाए गए. आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की तीन चिट्ठियों को आधार बनाया गया था. रेड्डी का सुझाव था कि सरकारी कंपनी एनटीपीसी से रिलायंस को 2.97 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू गैस मिलती थी. यह दर वैश्विक प्रतिस्पर्धा के ज़रिए तय की गई थी, सो इसे ही बाज़ार दर माना जाए. इस समूह ने यह भी कहा कि गैस की क़ीमत अगर एक डॉलर भी बढ़ती है तो रासायनिक खाद सेक्टर का खर्च बढ़ेगा, जिससे सरकार पर कई हज़ार करोड़ रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी का बोझ आएगा. पर मंत्री समूह ने इन सारी दलीलों को खारिज कर गैस की क़ीमत 4.2 डॉलर तय की. इस तरह रिलायंस को फायदा पहुंचाया गया. सरकार को कितना नुक़सान हुआ, इसका आकलन करने में सीएजी ने हाथ खड़े कर दिए हैं. सीएजी का कहना है कि नुक़सान का आंकड़ा इतना बड़ा होगा कि उसका हिसाब लगाना मुश्किल है. ज़ाहिर है, संसद के अगले सत्र में संचार के साथ-साथ पेट्रोलियम घोटाला भी एक बड़ा मुद्दा बनेगा. अगर यह मुद्दा नहीं बना तो आप स्वयं ही समझ लीजिए कि सरकार के साथ-साथ देश के दूसरे राजनीतिक दलों को कौन चला रहा है.

राष्ट्रीय साप्ताहिक चौथी दुनिया से साभार. आलेखः श्री मनीष कुमार, संपादक (कोआर्डिनेशन)

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

भावनाएं और वास्तविकता

पिछले पोस्ट से आगे बढ़ते हुए, अब वास्तविक धरातल की ओर. किस प्रकार व्यक्तिगत अहं परिवार की खुशी के नाश का कारण बनता है.


कई लोग कहते हैं कि आत्मघात कोई विकल्प नहीं होता. जब दो लोग साथ में नहीं रह पाते तो उन्हें अलग हो जाना चाहिए. कहना आसान है, करने में थोड़ी परेशानी है. पारिवारिक संबंधों की व्याख्या करते हुए कई पहलुओं पर गौर करना आवश्यक होता है. बच्चे होने के बाद तो अलग होना काफी मुश्किल सा हो जाता है. देखने में आता है कि पारिवारिक कलह से जूझते कई बच्चे या तो मानसिक विकृति की स्थिति में पहुंच जाते हैं या फिर समय से पहले परिवक्व हो जाते हैं. दोनों ही स्थितियां नई पीढ़ी के लिए उचित नहीं होती है. जहां तक मानवाधिकार का प्रश्न है, इन बच्चों की वाकई कोई गलती नहीं होती है. यदि धर्म और अध्यात्म की व्याख्या छोड़ दें तो सीधी सी सांसारिक प्रक्रिया है जिसके तहत ये बच्चे इस दुनिया में आते हैं. मेरा मानना है कि इसमें इनकी कोई गलती नहीं रहती. अब वो टेकेन फार ग्रांटेड की भावना हो या पति-पत्नी का अहं. ये बच्चे बिना किसी गलती के प्रताड़ना के शिकार हो जाते हैं.
आखिर इन बच्चों के प्रति अपने दायित्वों का वहन कौन करेगा. फिर यहां यह बात आती है कि पति और पत्नी दोनों अपने आपमें स्वतंत्र इकाई होते हैं. आखिर इनके भी अपने मानवाधिकार हैं. इन्हें भी अपनी जिंदगी जीने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. अक्सर सोचता हूं कि इन परिस्थितियों का हल क्या है. क्या हमारी पुरानी पारिवारिक अवधारणा ही सही थी. फिर लगता है स्त्री ही क्यों त्याग करे पुरुष क्यों नहीं. फिर लगता है कि पुरुष ही क्यों त्याग करे. इसका सबसे सही उत्तर है सामन्जस्य. लेकिन पहले लेख के उद्धरण को एक बार भी लें. जब टेकेन फार ग्रांटेड ऐसी परिस्थिति में हो जहां एक भावुक, संवेदनशील और दूसरा अवसरवादी तो ऐसे में किस तरह ऐसा सामन्जस्य हो सकता है जिससे किसी आगामी पीढ़ी के बच्चे का भविष्य उज्ज्वल हो सके. कौन झुके और कौन न झुके.
रहा सवाल पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंधों का तो उसके लिए ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता है. जब दोनों इकाइयां स्वतंत्र हो जाती हैं तो सामाजिक, धार्मिक मान्यताओं की दीवार भी टूट जाती है. और यह गलत भी नहीं है. किसी जात के पंडित के अनुसार यह गलत आचरण की श्रेणी में आ सकता है परन्तु रोटी, कपड़ा और मकान की तरह यह भी मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं का अंग है. सामान्य सांसारिक मनुष्य किसी योगी की तरह प्रकृति के नियमों के खिलाफ नहीं जा सकता. अगर उसे जाने को मजबूर किया जाए तो वह कुंठित होकर कई प्रकार की मानसिक व शारीरिक बीमारियों से ग्रस्त हो जाएगा. अब फिर वही सवाल उठता है कि ऐसी परिस्थिति में पारिवारिक संबंधों के सही-गलत की समीक्षा कौन करेगा.
बदलते परिवेश में अब समय आ गया है कि ऐसे मामलों में अनावश्यक तर्क-वितर्क को बढ़ावा न देते हुए कुछ ऐसा करना होगा जिससे हर ओर सामन्जस्य स्थापित हो सके. बालगोपालों का जीवन भी संवरे, पति-पत्नी के मानवाधिकारों का भी संरक्षण हो सके. इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, कानून बनाने वालों को भी और महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों के स्वयंभू नेताओं को भी.

भावनाओं का ज्वार


कभी-कभी सोचता हूं कि ये भावनाओं का ज्वार इतना विकट क्यों होता है. इतना विकट की पूरे शरीर को ही कमबख्त निकम्मा बना देता है. सच भी है कि ये भावनाओं का ज्वार आखिर इतनी तीव्रता से क्यों उठता है. वो भी ऐसी परिस्थितियों का जिनसे चल रही जिंदगी का ज्यादा कोई लेना-देना न हो. कई ऐसे भी लोग मिलते हैं जिनके मनमाफिक अगर आप करते जाएं तो आपसे अच्छा इस दुनिया में कोई नहीं होता. और अगर उनके खिलाफ थोड़ा भी किया तो समझ जाइये आपकी आफत है. इसे ही कहते हैं टेकेन फार ग्रान्टेड. यानी आप पर पूरा अधिकार.
देखा जाए तो सामान्यतः दूर के या व्यावसायिक रिश्तों में ऐसा कुछ नहीं होता है. वहां सबकी सीमाएं परिभाषित रहती हैं. जब रिश्ते नजदीक के बन जाते हैं तो यह होने लगता है. इसका सबसे अधिक घातक पहलू यह होता है कि अगर सामने वाला ज्यादा ही सेल्फसेंटर्ड या आत्मकेंद्रित हो तो समझो कि सब गड़बड़ झाला हो गया. आप भावुक या संवेदनशील रहें और सामने वाला आत्मकेंद्रित तो फिर भावनात्मक ब्लैकमेलिंग की स्थिति भी आ जाती है. हम चाहते हुए भी ऐसे लोगों से अलग नहीं हो पाते क्योंकि ये आत्मकेंद्रित लोग बहुत ही चालाक किस्म के होते हैं. दूसरों पर दोष मढ़ते हुए अपना काम निकालना इन्हें बखूबी आता है. ये झूठ पर झूठ बोलते जाएं और आप उन्हें अपना समझ के नजरअंदाज करते जाएं, तब तक ठीक है. क्योंकि तब तक इनका अहं संतुष्ट होता रहता है. लेकिन अगर आपने एक भी बार इनको आइना दिखाया तो समझ लीजिए आपकी शामत है. ऐसे लोग ताउम्र तकलीफ झेलते हुए अपने मिशन में यानी आपको अपने सांचे में ढालने या फिर ये कहें कि आपको अपना गुलाम बनाने का पूरा प्रयास करते रहते हैं.
सवाल इस बात का नहीं है कि कुछ लोग ऐसा करते हैं. सवाल इस बात का है कि जो भावुक होते हैं, परिस्थिति के साथ संवेदनशील होते हैं, ईश्वर को मानने वाले होते हैं, उन्हें क्यों खामख्वाह दुख झेलना पड़ता है. वो तो सिर्फ सामने वाले की भावनाओँ की कद्र कर रहे होते हैं. किसी महिला को यदि आप किसी सही कारण से हाथ नहीं लगाते हैं तो वो आपको नपुंसक की उपाधि से भी सम्मानित कर सकती है. क्योंकि उस पर आपका अधिकार है तो जैसा वो चाहे, वैसा आपको करना होगा. आप अपनी मर्जी उस पर थोप नहीं सकते क्योंकि आप उसके लिए टेकेन फार ग्रांटेड हैं.
ईश्वर से यही प्रश्न रहता है हमेशा कि जिस व्यक्ति को टेकेन फार ग्रांटेड समझा जाता है, जब उसकी गलती नहीं होती है तो उसे दुख क्यों झेलना पड़ता है. बड़े-बड़े संत-महात्माओं को तकलीफें क्यों झेलनी पड़ीं. चलो उन्होंने तो समाज की कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया लेकिन ये बेचारे सांसारिक प्राणियों को क्यों कर इतना दुख झेलना पड़ता है. सीधा सा गणित समझ में आता है कि जिसकी गलती, उसे सजा मिलनी चाहिए. लेकिन यहां तो जिसकी गलती नहीं होती, उसे ही सजा मिल जाती है. फिर कहते हैं सब कुछ ईश्वर का विधान है. इसे ईश्वर की मर्जी मान कर संतोष कर लो. चलो वो कर लिया अब क्या.
वैवाहिक संबंधों में भी यह लागू होता है. ज्यादातर तो पति ही पत्नी को टेकेन फार ग्रांटेड मान लेता है. लेकिन बदलते परिवेश में पुरुषों पर भी यह बात लागू होती है. यानी महिलाएं और वो कामकाजी महिलाएं कई बार पतियों को टेकेन फार ग्रांटेड मान लेती हैं. इसके कई आयाम होते हैं. जैसे बच्चों के कारण, हिन्दू विवाह अधिनियम के कारण, समाज की मान्यताओं के कारण, परिवार के रीतिरिवाजों के कारण एक संवेदनशील या भावुक प्रकृति का पति अपनी पत्नी के साथ वो सलूक नहीं कर पाता जो वह किसी बाहरी व्यक्ति के साथ कर सकता है. साफ जिंदगी भर उत्पीड़न के बोझ तले दबे रहना. अपना सब कुछ गंवा कर भी जब उस व्यक्ति को चैन नहीं मिलता है तो इसकी परिणति कई बार अपराध के स्वरूप में तो कई बार आत्मघात के रूप में सामने आती है.
कई लोग कहते हैं कि आत्मघात कोई विकल्प नहीं होता. जब दो लोग साथ में नहीं रह पाते तो उन्हें अलग हो जाना चाहिए.

(जारी..........)

शनिवार, 10 सितंबर 2011

जरा संभल के आडवाणीजी

अब भ्रष्टाचार के खिलाफ आडवाणीजी यानी भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी एक और रथ यात्रा निकालने वाले हैं. वैसे तो आडवाणी को भारतीय राजनीति में शतरंज की चाल चलने वाला एक मंजा हुआ खिलाड़ी माना जाता है, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा की पराकाष्ठा नहीं है. सवाल यह उठता है कि जब पिछले चुनाव में उनको प्रधानमंत्री का प्रत्याशी बनाकर पार्टी को कमजोर कांग्रेस ने पटखनी दे दी तो फिर अचानक क्या हुआ कि उन्हें यह यात्रा निकालने की घोषणा करनी पड़ी. वो भी पार्टी के कद्दावर नेताओं की अनुपस्थिति में.
आडवाणी ने अपनी छवि ही कुछ ऐसी बनाई है कि जब भी वे कुछ करने के लिए या फिर यह कहें कि मास मूवमेंट के लिए आगे आते हैं तो उसमें किसी और खिचड़ी पकने का अंदेशा हो जाता है. सवाल उठाए जा रहे हैं. कोई कहता है कि भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष नितिन गड़करी को हाशिए पर डालने के लिए यह है. कोई कहता है कि पार्टी में अपनी चौधराहट बिखेरने के लिए वे ऐसा कर रहे हैं. अटकलें तो यह भी हैं कि अन्ना हजारे को भ्रष्टाचार के खिलाफ मिले जनसमर्थन को वे भुनाना चाहते हैं. बहरहाल अब तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है. संघ की खामोशी का राज भी जानना जरूरी है.
खैर, परिवार के अंदरूनी मामलों में दखलंदाजी ठीक नहीं है. लेकिन अन्ना हजारे को मिले जनसमर्थन की आड़ में यदि यह यात्रा निकाली जा रही है तो भी इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. और ऐसे में संघ को देर सबेर यह तय करना ही होगा कि भ्रष्टाचार का मुद्दा जीवित रखना है या आडवाणी का. ऐसे वक्त में जब समूचे देश का एक बड़ा वर्ग भ्रष्टाचार के खिलाफ लामबंद हुआ है, ऐसे किसी प्रयास को स्वीकृत नहीं किया जा सकता जिससे एक बार भी जनता स्वयं को छला हुआ महसूस करे. आडवाणी हों या मनमोहन, या फिर कोई अन्य राजनेता. यह बात सभी को समझनी ही होगी या यूं कहें कि स्वीकार करनी ही होगी कि जनता का विधायिका से यानी राजनेताओं से विश्वास डगमगा गया है. पक्ष, विपक्ष, तीसरी ताकत, हर ओर से जनता को धोखा ही मिला है. ऐसे में यदि अन्ना हजारे के आंदोलन को व्यापक और स्वस्फूर्त समर्थन मिला है तो अब समझ लेना चाहिए कि सुधार की प्रक्रिया शुरू करने का समय आ गया है. अन्यथा अगर जनविस्फोट हो गया तो सभी सड़क पर आ जाएंगे.
अन्ना हजारे के पूरे आंदोलन के दौरान आडवाणी को कभी उनकी फिक्र नहीं हुई. आडवाणी को लौहपुरुष (जिसे उनके मीडिया प्रबंधन ने बहुप्रचारित किया) तब माना जाता जब वे बाबा रामदेव के समर्थकों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई और अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान लौह शक्ति से खड़े हो जाते. ऐसा कुछ नहीं हुआ. भारतीय जनता पार्टी से सिर्फ नितिन गड़करी ही पूरी शिद्दत से बयान देते रहे. उनके बयान के बाद ही संसद में भाजपा ने अन्ना हजारे का स्पष्ट समर्थन किया.
वैसे आडवाणी की नाराजगी भी जायज है. संसद सत्र के आखिरी दिन उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया गया. जब उन्होंने जबरदस्ती बोला तो माइक बंद कर दिया गया और उनके बयान को रिकार्ड से हटा दिया गया. यानी जो काम संघ और भाजपा के लोग नहीं कर पाए, उसे सरकार ने कर दिखाया. अपने कद के आगे सभी भाजपा अध्यक्षों को नीचा दिखाने वाले आडवाणी का लक्ष्य अब गडकरी हैं. यह बात अब एकदम साफ है. मगर भाजपा का कोई भी नेता आडवाणी के खिलाफ अब भी नहीं बोल सकता है. अन्ना आंदोलन के दौरान गड़करी की सक्रियता ने आडवाणी को उनकी चौधराहट के खिलाफ गंभीर संकेत दे दिया था. रही-सही कसर सरकार ने लोकसभा में निकाल दी. आडवाणी ने भी आनन-फानन में अपने सिपहसालार सुषमा स्वराज और अरुण जेटली के साथ बैठक कर घोषणाएं कर डाली. अब इसे अब तक किसी ने गंभीरता से नहीं लिया है, यह बात अलग है.
लेकिन अगर आडवाणी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यात्रा निकालते हैं तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं. अन्ना हजारे पर संघ व भाजपा का चेहरा होने का आरोप कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे शातिर राजनेता पहले ही लगा चुके हैं. इस कदम से उनके कथन को बल मिलेगा. और हो सकता है अपने परंपरागत अंदाज में कांग्रेस इस मुद्दे को उछाले. यानी मुद्दाविहीन कांग्रेस को बोलने का एक मौका देना. दूसरा यह कि यदि उनकी यात्रा पिछली यात्राओं की तरह असफल हो जाती है तो यह साबित हो जाएगा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जो समर्थन हजारे को है वो भाजपा को नहीं है. यानी फिर वही विकल्पहीनता की स्थिति. इसलिए आडवाणीजी जरा बचके. व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की आग में जनता की अपेक्षाओं और लोकतंत्र के संतुलन को खराब मत कीजिए.

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि कितनी अलग थी जिंदगी जब तक तेरी जुल्फों की छांव ने मेरे चेहरे को आबाद न किया था. कि इस जिंदगी में पहले प्यार के बिना अकेलापन था, अब प्यार के साथ अकेलापन. अब डर है उसे खोने का. पहले कशिश थी उसे पाने की. मैंने सब कुछ पा लिया अब इस जिंदगी में. अब यह भी मलाल नहीं कि सफर कैसे कटेगा. अब तो कट जाएगी जिंदगी उसकी यादों के सहारे. उसकी वह शोख चंचल अदाएं. उसकी झिड़कियां और फिर दूर रहते रहते चैन से आंखें मूंद लेना मेरे कांधे पर सिर रखकर. उसके लरजते लब्जों की फिजां और उसमें डूबा मेरा सब कुछ. जिंदगी में जो भी अनुभव पहली बार होता है, कितना अनोखा होता है न. खुद को भुला चुके थे हम उस अनोखी मुलाकात के बाद. ट्रेन का सफर भी कुछ अजीब सा था. लोग बातें कर रहे थे, मैं भी कर रहा था, फिर आंखें बंद करते ही छलक जाया करती थीं. क्या मिलन दुख देता है. पता नहीं पर मुझसे रहा न गया. अब समझ में आया कि पागलपन की हद तक चाहता हूं उसे और वो कहती है.... जाने दो. उसकी चंचल आंखों में ठहराव दिखा. उसकी मस्ती थम गई. मैं एक बार फिर उसी दार्शनिक की भूमिका में. मानों ये प्यार ना हो, किसी का मार्गदर्शन कर रहा हूं या ये कहें कि किसी आपात स्थिति से जूझने की कोशिश करने लगा. क्या पागलपन है. और उधर से ये आवाज कि मैं पहली गर्लफ्रेंड हूं जो अपने बीएफ को बुला रही हूं.
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि इस रंजोगम की दुनिया में कौन किसका है, ये कौन तय करेगा. सामाजिक संबंधों की मर्यादा या ईश्वर की इच्छा. हमारी बुरी आकांक्षाएं या फिर ईश्वर की लिखी हकीकत. नहीं कह सकते हम तो किसी हालत में नहीं कह सकते. दुनिया में सब कुछ सिमटता जा रहा है. वासुधैव कुटुंबकम की अवधारणा सूचना तकनीक ने सार्थक कर दिया है. एक गम रह गया. बिछुड़ने के समय उसे जी भर के देख न सका. उसे ही जल्दी थी जुदाई की. उफ.

सोमवार, 5 सितंबर 2011

खुद को भूल जाना चाहता हूं.......

खुद को भूल जाना चाहता हूं,
अपने आगोश में समाना चाहता हूं
गर किसी को अपना न बना पाया तो क्या
मदहोशी का संसार पाना चाहता हूं.

खुद को भूल जाना चाहता हूं...........

मदहोशी भी ऐसी कि होश न आए कभी
होश भी ऐसा कि बेहोशी सी रहे
उसे कभी न कहूं, खुद को दोष ना दूं
हर बंधन से दूरी चाहता हूं.

खुद को भूल जाना चाहता हूं...........

रात की रानी रहे हमेशा बाहों में
सुबह का फलसफा न हो जिंदगी में
फिर शबे रोज नाउम्मीद सा
अपनी बेबसी का इम्तहां चाहता हूं.

खुद को भूल जाना चाहता हूं...........

चलता रहूं अपनी ही राह कुछ इस तरह
ना कोई मिले ना कोई पूछे हाल
कमजर्फों से भरे इस बेदर्द जमाने में
सुकून का ठहराव चाहता हूं.

खुद को भूल जाना चाहता हूं...........