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शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

मुक्ति..




क्यूं है ये मंजर कि एक इंसान
जिंदा लाश बन गया
उसे तो ये भी ना पता कि
किसकी सजा पा गया


उसने जब अपने अंतः को
टटोला, उसे खंगाला
विचित्र सी आवाजें आने लगीं
तब भी न समझ पाया वो
कि कैसी खता हो गई
ऐसी कोई गलती न की थी
जिससे मिले इतना दर्द
सुकूने जिंदगी का वो मर्म
किस गर्भ में खो गया


कब तक खोजता रहे वो
अपने सपने की मंजिल
कब तक चलता रहे सुदूर
और दूर, बहुत दूर
कब तक मिलता रहे उसे
धोखा, अपमान, दिखावा
क्यों कोई अमर्यादित होकर
सीने पर सवार, करे अट्टहास
झेलते गया वो हर वार
हर होनी पर तर्क देता
अब टूट गया उसका स्व
जमीर उसका बिखर गया

है वो हौसले का पक्का इंसान
अब भी थामे है दामन
सच का, इंसानियत का
मगर कब तक, कब तक
सोचता है वो हर वक्त
एक न एक दिन उसकी
आत्मा ही मार दी जाएगी

अच्छा है, वह जन्म-मरण के
खेल से ही मुक्त हो जाएगी....

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