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मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

गडकरी है परिवर्तन की सुहानी बयार


बात भले ही गले के नीचे उतरने में समय लगे, परन्तु ये सच है कि गडकरी के रूप में देश ऐसे परिवर्तन की ओर कदम रख चुका है जिसका आक्रामक रूप हाल ही में दिल्ली में दिखा है। हमारे देश में गत दो वर्षों से तेजी से बदल रहे घटनाक्रम को कोई एक-दो वर्षों के उन्माद के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। अन्ना हजारे के आंदोलन से परिपर्तन के चाह की जो जीजीविषा दिखने लगी, उसकी शुरुआत तो काफी पहले से हो गयी थी। इस परिवर्तन की छाप हमारे जीवन के हर अंगों में दिखाई दे रहा है। फिर क्यों कर राजनीतिक परिदृश्य इससे अलग होने लगा। राजनीति भी हमारे जीवन का एक अंग है और यह हमें प्रभावित भी करती है।
दिल्ली में एक तूफान सभी ने देखा। इस तूफान ने कांग्रेस का बिस्तर ही गोल कर दिया। अनपेक्षित था ऐसा होना। मगर इसके पहले ही परिवर्तन की एक मंद बयार भी दिल्ली पहुंची थी जिसे किसी ने अधिक नोटिस नहीं किया क्योंकि यह बयार हमें सुकून देने वाली थी। यह सुकून देने वाली बयार थीNitin Gadkari नितिन गडकरी की भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी। जिन लोगों ने परिवर्तन की बयार को नोटिस किया, उन्होंने खामोश रहना ही उचित समझा और पीठ पीछे इसे बेअसर करने की राजनीति करते रहे।
दरअसल, हमारी जीवन शैली व सोच इतनी असहज और कृत्रिम हो चुकी है कि हमें सहज बातें दिखती ही नहीं हैं। इसी कारण हम हवा की पहचान तभी करते हैं, यह आंधी या तूफान बन जाए। यानी जब तक किसी से डर न लगे, वह बड़ा आदमी नहीं लगता है। खैर, बात उस खामोश क्रांति की हो रही थी जो भारत का भविष्य है। जिस समय गडकरी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया, उस समय हम लोगों के गले के नीचे यह बात नहीं उतरी थी। मगर इसके बाद हमने शुरू किया, गडकरी के व्यक्तित्व का सिलसिलेवार अध्ययन। गडकरी का व्यक्तित्व आडवाणी और मोदी के हिन्दुत्व से मेल नहीं खाता। यही कारण है कि कॉलेज के जमाने से ही गडकरी संघ की शाखा मे तो जाते ही थे लेकिन उनके कई घंटे समाजवादी आंदोलन से जुड़े लोगों के साथ भी गुजरता था। अपने उस आधार को गडकरी ने सदा ही बनाए रखा है।
आज सुबह ही गडकरी ने राम के संबंध में जो बयान दिया, उसने इस धारणा को पुख्ता किया है कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब हिन्दुत्व को नये और सही स्वरूप में परिभाषित करना चाहता है। गडकरी की ताजपोशी इसी क्रम में किया गया एक फैसला था। मजे की बात यह है कि इस चुनाव में संघ, मंदिर जैसे मुद्दे कहीं पिक्चर में ही नहीं हैं। गडकरी की टिप्पणी थी कि राम को गलत तरीके से न लिया जाए। उन्होंने राम राज्य की बात की जहां सुशासन था, विकास था। धर्मांधता फैलाने वाली बात नहीं की।
नागपुर में गडकरी के चुनाव प्रचार को देखते हुए अब बदलाव के बयार की अवधारणा स्थापित हो रही है। इस चुनाव में गडकरी भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी हैं। तो स्वाभाविक रूप से पार्टी के लोग उनका प्रचार का कार्य कर रहे हैं। मगर इसके साथ ही गैर भाजपायी लोगों का एक बहुत बड़ा तबका भी इसमें जुटा हुआ है। इसे मैंने अपने ब्लाग पोस्ट गडकरी जीतेंगे या भारी बहुमत से जीतेंगेhttp://anjeevpandey.blogspot.in/2014/03/blog-post.html में गडकरी ब्रिगेड के नाम से संबोधित किया है। तो इंतजार करते हैं और देखते हैं, बदलाव आक्रामक तरीके से होता है या सुकून से। मगर बदलाव तो अवश्यंभावी है। आक्रामक तरीका अभी जोरों पर है। सुकून से बदलाव की बात तब समझ में आएगी जब बदलाव दिखने लगेगा।
अंततः- हर प्रक्रिया के पूरा होने में निर्धारित समय लगना ही है। समझदारी इसी में है कि प्रक्रिया को उसके समय पर ही पूरा होने दें, अन्यथा प्रकृति के संतुलन की प्रक्रिया में इसका असर पड़ता है और फिर प्रकृति के अपने तय नियम काम करते हैं। जैसे बच्चा अगर 7 माह में पैदा हो जाए तो जानते हैं कितनी परेशानी होती है। इसी प्रकार अब बदलाव की यह प्रक्रिया भी अपने समय में पूरी होगी। हम तो भाई भजन करते हुए इस प्रक्रिया के पूरे होने के तरीके देख कर प्रकृति के तौरतरीके सीख रहे हैं। 

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