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मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

कांग्रेस का आखिरी हथियार, छोड़ा गया धर्म, जाति का जहरीला रासायनिक बम

 अंततः वही हुआ जो नहीं होना था। नागपुर मे तो कदापि नहीं होना था। विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बुरी तरह विफल कांग्रेस ने आखिर अपना 60 साल पुराना जाना-पहचाना-आजमाया हथियार धर्म और जाति का विषैला बम चला ही दिया। इस चुनाव में कांग्रेस ने चुनाव प्रचार में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली। कांग्रेस के नेताओं की खामोशी से ऐसा लगने लगा था कि उन्होंने हथियार डाल दिये हैं लेकिन कल यानी 8 अप्रैल को जब सभी लोग राम नवमी बनाने में व्यस्त थे, कांग्रेस के नेता मुस्लिम, दलित, कुणबी और तेली समाज के वोटर्स को जाति-धर्म की घुट्टी पिला रहे थे। कांग्रेस को पूरी उम्मीद है कि धर्म के नाम पर और जाति के नाम का जहर घोल कर एक बार फिर नागपुर में कांग्रेस काबिज हो जाएगी। 
वैसे आजादी के बाद से आज तक लगातार कांग्रेस की यही स्थिति रही है। इस बार कांग्रेस ने मुस्लिम धर्मावलंबियों के साथ ही सिंधी समाज को भी नितिन गडकरी के खिलाफ खासी घुट्टी पिलाई है। ये सब प्रक्रियाएं चार-पांच दिन पहले से ही जारी थीं। इस चुनाव में खामोश संघ को एक बार फिर मुद्दा बनाने की कोशिश की गई है। लेकिन आम आदमी पार्टी और अजलि दमानिया के कार्यकर्ता इसका तोड़ भी निकालते जा रहे हैं। 
इन तमाम प्रयासों के बीच विभिन्न समाज के लोगों से मेरी व्यक्तिगत चर्चा का यही निष्कर्ष है कि ये 2004 का नहीं, 2014 का चुनाव है। इसमें युवाओ का एक बड़ा तबका तैयार हो चुका है। बुजुर्ग हो चुके लोगों की दकियानूसी सोच से यह तबका प्रभावित नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेस की प्रचार रैलियों में युवाओ की उपस्थिति नगण्य रही है। बावजूद तमाम प्रयासों के पिछले चुनाव की अपेक्षा इस बार कांग्रेस को कम वोट मिलने की बात कायम है। क्योकि परिवर्तन की लहर आती ही इसलिए है कि उसे पुरानी मान्यता, परंपरा को समाप्त करना होता है। इस नैचरल नियम को झुठलाना यानी अपने अस्तित्व को ही चुनौती देना है।

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