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बुधवार, 30 नवंबर 2011

एफडीआईः किसानों के हितों की रक्षा हो



रिटेल के क्षेत्र में एफडीआई यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर इन दिनों माहौल खासा गर्म है. कारण भी साफ है. विपक्ष अब ऐसा कोई भी मुद्दा हाथ से जाने नहीं देना चाहता है जिससे कांग्रेस को कटघरे में खड़ा किया जा सके. हालांकि केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस प्रणित सरकार के सहयोगी दल भी खुदरा कारोबार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का विरोध कर रहे हैं. सबकी अपनी-अपनी मजबूरियां हैं.
उत्तर प्रदेश सहित चार राज्यों के विधानसभा चुनाव सर पर हैं. अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और बाबा रामदेव के काला धन विरोधी आंदोलन के मुद्दे पर सरकार पहले से ही परेशान है. जनलोकपाल के नए तैयार मसौदे पर अन्ना हजारे ने आंदोलन की चेतावनी दे दी है. इसके बावजूद कांग्रेस सांसदों की सभा में सोनिया गांधी की उपस्थिति में रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी गई. आखिर कांग्रेस केंद्र में इतनी मजबूत कैसे हो गई कि पूरी दबंगई से बिना किसी की परवाह किए वह इस बिल को पारित करने पर आमादा है? यह ऐसा सवाल है जिस पर आश्चर्य होना लाजमी है. बसपा और समाजवादी पार्टी ने भी इसका विरोध करने का निर्णय लिया है. भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने जब यह कहा कि इस मुद्दे पर सदन में सरकार के पास बहुमत नहीं है तो पूरी दबंगई से कांग्रेस का जवाब मिला कि जिस गणित की बात सुषमा कर रही हैं, वह गणित हमें भी आता है. यानी यहां दाल में काला वाली बात ही नहीं है. यहां तो पूरी दाल ही काली नजर आ रही है. औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग (डीआईपीपी) ने एफडीआई से जुड़े व्यापक मुद्दों पर चर्चा पत्र पेश किया है. इसके जरिये विभाग ने सभी अंशधारकों का पक्ष जानने की कोशिश की है. एक बात तो पक्की है कि एफडीआई से जहां उपभोक्ताओं को तो फायदा होता ही ह, वहीं बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलता है. देश में दूरसंचार, वाहन और बीमा क्षेत्र में एफडीआई की वजह से आई कामयाबी को हम देख ही चुके हैं. इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हुए निवेश की वजह से ग्राहकों को बेहतर सेवाएं और उत्पाद नसीब हुए हैं. बढ़ी प्रतिस्पर्धा ने भी कंपनियों को खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित किया है.
भारतीय खुदरा कारोबार के अलग ही रंग-ढंग हैं. पुराने जमाने में या आज भी गांव में एक परचून की दुकान हुआ करती थी. छोटे शहरों में कुछेक राशन की दुकानें, सब्जी की दुकानें, जूते, कपड़े की दुकानें होती हैं. 1990 के दशक के आखिर में खुदरा कारोबार तेजी से फैलने लगा. आज हालात यह हैं कि हर गली मोहल्ले में कई दुकानें खुल गई हैं. बड़े शहरों में सुपर बाजारों ने भी अपनी जड़ें जमा ली हैं. सब्जी-भाजी से लेकर पेस्ट-ब्रश तक और किराने का हर सामान यहां मौजूद रहता है. देश भर में लगभग 1.5 करोड़ खुदरा कारोबारी हैं और यह तकरीबन 350 अरब डॉलर से भी बड़ा बाजार है. भारतीय खुदरा बाजार में असंगठित क्षेत्र का दबदबा है और कुल बिक्री का 94 फीसदी इनके जरिये ही होता है. बिचौलियों के माध्यम से बाजार का कामकाज चलता है. 
 वर्तमान में अर्थव्यवस्था की मंदी असर भले ही सीमेंट, स्टील जैसे उद्योगों पर पड़ा हो लेकिन खुदरा कारोबार पर इसका असर ज्यादा नहीं पड़ा है. जैसे जैसे अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ेगी खुदरा कारोबार का आकार भी बढ़ेगा. सामान्य सा गणित है कि बेहतर अर्थव्यस्था से लोगों की क्रय शक्ति भी बढ़ती है. विदर्भ जैसे क्षेत्र में यह चौंकाने वाला तथ्य गत दिनों सामने आया कि यहां दो पहिया वाहनों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है. शराब का सेवन कई गुना बढ़ा है. वो भी ऐसे समय में जब धनाभाव में किसान आत्महत्या कर रहे हों. जाहिर है जैसे-जैसे अर्थ व्यवस्था में सुधार होगा लोगों की क्रय शक्ति भी बढ़ेगी. क्रय शक्ति बढ़ने पर मांग बढ़ेगी और एक अच्छे खासे निवेश की आवश्यकता होगी. इसके लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश एक अच्छा माध्यम साबित होगा. एक समय था विक्को टरमरिक आयुर्वेदिक क्रीम लगाए बिना श्रृंगार नहीं होता था. आज कई अन्य क्रीम मल्टी नेशनल कंपनियों के बाजार में उपलब्ध हैं.
अब सवाल फिर एक बार सरकार की मंशा का है. हर मामलों की तरह इस मामले में भी सरकार की मंशा संदिग्ध है. अगर नहीं है तो उसे लोगों को विश्वास में लेना होगा. बिचौलियों को जरूर नुकसान होगा लेकिन कृषि क्षेत्र में असली उत्पादन करने वाला किसान जरूर लाभान्वित होगा. पूरे विश्व के लिए भारत एक बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में विकसित भी होगा. लेकिन सरकार की मंशा गलत रही तो लेने का देना भी पड़ सकता है. कृषि क्षेत्र में अभी माइक्रो फाइनेंस कंपनियों ने प्रवेश कर लिया है. जो किसान बैंकों का कर्ज अदा नहीं कर पा रहे हैं वो इन माइक्रो फाइनेंस कंपनियों का कर्ज कहां चुका पाएंगे. इनकी ब्याज दर भी तो भारीभरकम है. अगर विदेशी निवेशक छलकपट के जरिये किसान की जमीन या कृषि उत्पादन पर ही कब्जा कर लेता है तो बेचारा किसान तो बेमौत मारा जाएगा और अपनी ही जमीन पर मजदूर बन जाएगा. खैर, ये तो भविष्य की अटकलें हैं. इसीलिये सरकार की मंशा की बात हो रही है. जिस तरह से केंद्र सरकार अफलातून निर्णय ले रही है, उसे तो यही लगता है कि वह अब किसानों को पूरी तरह बर्बाद करने पर तुली हुई है. आशंका जताई जा रही है कि इससे



छोटे कारोबारियों को नुकसान होगा और उनकी आजीविका संकट में पड़ जाएगी. लेकिन रिलायंस के खुदरा कारोबार के क्षेत्र में आने के बाद क्या ऐसा हुआ. नहीं. कोई छोटा कारोबारी बर्बाद नहीं हुआ. 
खुली अर्थव्यवस्था का दौर शुरू हुए करीब 30 साल हो गए. इस बीच भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी लेकिन किसी ने वैश्वीकरण के दौर को रोकने का प्रयास नहीं किया. देश धीरे-धीरे ही सही लेकिन पूरी तरह पूंजीवाद की ओर बढ़ता जा रहा है. अब इसमें तेजी आ गई है. समाजवाद नहीं चला. साम्यवाद नहीं चला. पूंजीवाद का हश्र अमेरिका में दिख रहा है. भारत में लोकतंत्र की आड़ में पूंजीवाद को स्थापित कर दिया गया है. अब एफडीआई से आम जनता को फायदा ही होगा. लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यस्था पर विदेशी कंपनियों का शिकंजा कसता जाएगा. भ्रष्ट राजनेता बिकेंगे और जनता को बेच डालेंगे. बस यही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में सबसे बड़ा रोड़ा है. वैसे अगर मंशा साफ हो तो मीडिया के क्षेत्र में भी शतप्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी जानी चाहिए. 
वैसे कृषि उत्पादों के मामले में तो बिचौलियों ने अति कर दी है. हर जगह बिचौलिये शिकंजा कसे हुए हैं. किसान को तो कीमत ही नहीं है. वो फटेहाल है. इसलिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को स्वीकृति देते समय किसानों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए. वैश्वीकरण, खुली अर्थव्यस्था के साथ ही गांवों को आत्मनिर्भर बनाने जैसे कम उठाने जरूरी हैं. तभी देश खुशहाल हो पाएगा. अन्यथा अब जो असंतोष भड़केगा वो अन्ना हजारे या बाबा रामदेव को मिल रहे जन समर्थन से कई गुना अधिक होगा.

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

एक खत 'युवराज' के नाम



राहुल जी,. ये आपने क्या कह दिया. सब ठीकठाक तो है न. कहीं आप भी उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में अभी से हताशा तो नहीं देख रहे हैं. राहुलजी, आप तो देश की सबसे शक्तिशाली महिला आदरणीय सोनिया जी के पुत्र हैं. आप तो देश की सबसे शक्तिशाली पार्टी कांग्रेस के युवराज हैं. समझ में ये नहीं आया कि आपको किसने ये बता दिया कि महाराष्ट्र में काम करने वाले यूपी के लोग भिखमंगे हैं. 
ओह, क्षमा कीजिएगा, आपके एन एंग्री यंग मैन से भरपूर तेवर वाले पोस्टरदेखकर हम तो भूल ही गए थे कि आप खुद का लिखा भाषण नहीं पढ़ते. आप तो सिर्फ भाषण पढ़ते हैं. उसे लिखने वाला दिमाग अलग होता है. अब जो कोई भी लिखे, किसी को इससे क्या? जनता तो यही समझती है कि आपके मुखारबिंद से निकले शब्द आपके ही हैं. जनता आपको अत्यंत विद्वान, युवा और सर्वशक्तिमान समझती है. इसी कारण तो वह आपके बोलने के मतलब भी यही निकालती है कि जो आपने कहा वो आपके विचार हैं.
किसी ब्रांड मैनेजर टाइप के व्यक्ति का लिखा भाषण अक्षरशः पढ़ने के पहले आपको एक बार उस पर विचार भी कर लेना चाहिए था. क्या आपको लगता है कि महाराष्ट्र में आकर बसे हुए यूपी-बिहार के लोग भिखारी हैं. तब तो आपकी कांग्रेस पार्टी को दुनिया की सबसे लोकतांत्रिक पार्टी मानने में कोई दिक्कत नहीं होगी. क्योंकि आपकी पार्टी ने कृपाशंकर सिंह के रूप में एक भिखमंगे को मुंबई प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना रखा है. आपने संजय निरूपम के रूप में एक भिखमंगे को पार्टी का प्रवक्ता बना रखा है. ये दो नाम आपकी पार्टी के इसलिए आपके सामने रखा क्योंकि अन्य उद्योगपतियों, फिल्मी कलाकारों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समाजसेवियों, अधिकारियों की चर्चा मैं इस समय नहीं कर इन समस्य कर्मयोगियों की भावनाएं आहत नहीं करना चाहता.  अगर ऐसा है तो कांग्रेस और आप सभी साधुवाद के पात्र हैं. भिखारियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाना आज के समय में कम हिम्मत की बात नहीं है. लेकिन राहुल जी, आपसे एक शिकायत करनी है. आपके इन भिखमंगे नेताओं ने कभी भी उत्तर भारतीयों की वकालत सार्वजनिक रूप से नहीं की है. जिस समय शिवसेना की सहयोगी पार्टी भारतीय जनता पार्टी भी उत्तर भारतीयों के पक्ष में आ गई थी, उस समय भी महाराष्ट्र में आपकी पार्टी के भिखारियों ने मुंह बंद रखा था. हां, अभी हाल में संजय निरूपम ने नागपुर में जरूर यह कह कर थोड़ी हलचल पैदा की थी कि अगर उत्तर भारतीय बैठ गए तो मुंबई ठप होजाएगी. इस पर शिवसेना ने मुखर होकर उन्हें उनकी जगह भी दिखा दी थी.रहा सवाल भिखारियों की आपके पार्टी में ताजपोशी की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का, तो आपकी पार्टी कितनी लोकतांत्रिक है, इसका प्रत्यक्ष मिसाल दिल्ली के रामलीला मैदान पर आधी रात शांति से सोये बच्चों, महिलाओं, पुरुषों पर कराये गए सशस्त्र हमले से मिल जाता है. राहुल जी, वह हमला किसी कानून-व्यवस्था का हिस्सा नहीं था, वह हमला किसी रामदेव बाबा तक सीमित नहीं था.वह हमला था, अपने आपको लोकतंत्र से अधिक शक्तिशाली समझने का दंभ. वह हमला था हमारे उन स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग को मटियामेट करने के लिए जिन्होंने लोकतंत्र की परिकल्पना की थी.
खैर राहुल जी, आपकी पार्टी कांग्रेस क्या वाकई वैचारिक रूप से दिवालिया हो गई है? क्या अपनी लाचारी, अपनी कमजोरी छिपाने के लिए देश के एक बड़े तबके को भिखारी जैसे अलंकरण से सम्मानित किया जा सकता है? माना कि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम देश का राजनीति पर दूरगामी परिणाम डालेंगे. माना कि अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह उत्तर प्रदेश का राजा बना कर आपकी ताजपोशी की योजना हो. लेकिन राहुलजी, क्या है न कि आपके इस प्रकार के बयान पूरे किए कराए पर पानी फेर देते हैं.  
अब यूपी के युवाओं को महाराष्ट्र जाकर भीख मांगने का बयान आपने क्यों दिया, ये हम आपको बताते हैं. आपकी पार्टी के लोग अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर जी आदि के प्रभाव से खासे आतंकित हैं. आपकी पार्टी के नेताओं को यह समझ में आ गया है कि गांधी-नेहरू परिवार के समान ही चमत्कारिक आकर्षण रखने वाले अन्य लोग भी हो सकते हैं. खास कर अन्ना हजारे के आंदोलन से तो आपकी पार्टी को मुंह छिपाने के लिए भी जगह नहीं मिल रही है. इसीलिए आपके नेता मीडिया के माध्यम से लगातार यह प्रयास कर रहे हैं कि किसी तरह भाषाई या क्षेत्रीय आधार पर फूट डाल कर अन्ना को उत्तर प्रदेश में बौना साबित कर दिया जाए. 
राहुलजी, आपकी पार्टी के लोग फिर गलती कर रहे हैं. आप लोग ये क्यों नहीं समझ रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को मिला समर्थन व्यक्तिगत रूप से अन्ना हजारे को नहीं बल्कि यह सरकार के खिलाफ उमड़ा था. आप जानते हैं न कि जब चार लोगों का दुश्मन एक हो जाता है तो चारों आपस में दोस्त हो जाते हैं. इसका ये मतलब नहीं होता कि चारों के बीच अच्छा तालमेल है. आपके भाषण लिखने वाले ने उत्तर प्रदेश की जनता में महाराष्ट्र के खिलाफ जहर घोलने की कोशिश की, उसे उकसाने की कोशिश की ताकि जब अन्ना यहां चुनाव प्रचार के लिए आएं तो उन्हें यहां की जनता नकार दे. अन्ना मराठी हैं न. वाह क्या दिमाग लगाया आपके लोगों ने. उन लोगों ने ये नहीं सोचा कि उत्तर प्रदेश का एक बड़ा तबका देश के अन्य राज्यों में रहता है. उस तबके से जुड़े लाखों लोग उत्तर प्रदेश में रहते हैं. किसी को भिखमंगा होने का उलाहना देने से तो बेहतर रहता कि आप संविधान के मजबूत धागे से बंधे भारत में क्षेत्रवाद का मामला उठाने वालों की खिलाफत करते. 
इन्हीं उत्तर भारतीय भिखारियों को वो दिन भी याद है जब आपने शिवसेना को चुनौती देते हुए मुंबई की यात्रा की थी. सभी ने आपको हाथोंहाथ लिया था. किसी मराठीभाषी ने भी आपका विरोध नहीं किया था. ऐसा में आपको क्यों कर इस बात की जरूरत आ पड़ी कि आप विखंडन के खतरनाक बीज बोएं. अपसोस, मगर यह हकीकत है राहुल जी कि आपके इस बयान से न सिर्फ उत्तर भारतीयों का सिर नीचा हुआ है बल्कि उन ताकतों का हौसला भी बुलंद हुआ है जो क्षेत्रीयता की समर्थक हैं और इसी के बल पर अपनी राजनीति चला रही हैं.

शनिवार, 12 नवंबर 2011

शनि का राशि परिवर्तन- महासंयोग और परिवर्तन

दत्त गुरु ओम-दादा गुरु ओम।। ......  ओम् शं शनिश्चराय नमः ।।....

शनि साठ वर्षों में तीसरी बार अपनी उच्च राशि तुला में प्रवेश कर रहा है और इस सदी में तो पहली बार। 15 नवंबर 2011 से करीब तीन वर्ष तक शनि अपनी उच्च राशि तुला में रहेंगे। यह राशि परिर्वतन ज्योतिष जगत और उस आधार पर अपने भविष्य और कार्यक्रमों की योजना बनाने वालों के लिए हमेशा विचारणीय रहा है। इनका परिर्वतन चराचर जगत के सभी प्राणियों को प्रभावित करता है।

9 सितंबर 2009 को शनि ने कन्या राशि में प्रवेश किया था। उससे पहले 6 अक्टूबर 1982 को शनि ने तुला राशि में प्रवेश किया था। अब आने वाले सालों में 2041 में शनि देव फिर से तुला राशि में आएंगे।  सौ सालों बाद शनि देव का दुर्लभ महासंयोग बन रहा है। अब सबकुछ बदलने वाला है क्योंकि शनि देव का स्वभाव बदलाव करना होता है। इसी महीने 15 नवंबर को सुबह 10 बजकर 10 मिनट पर शनि देव राशि बदलेंगे और कन्या से तुला राशि में प्रवेश करेंगे और 2 नवंबर 2014 तक इसी राशि में रहेंगे। 

दुर्लभ महासंयोगः इस साल की शुरुआत शनिवार से हुई थी और इस साल का आखिरी दिन भी शनिवार ही है। हिन्दु पंचांगो के अनुसार अभी क्रोधी नाम का संवत्सर चल रहा है इसके  स्वामी शनि देव है। कई विद्वानों के अनुसार डेढ़ सौ साल पहले ऐसा हुआ था कि शनि अपने ही संवत्सर में अपनी उच्च राशि में आया था । तुला राशि शनि की उच्च राशि है ये शनिदेव का प्रिय स्थान होता है। इस राशि में होने से शनि देव शुभ फल देने वाला रहेगा। शनि देव के बदलने से लोगों की सोच में सकारात्मक बदलाव आएंगे। " क्रोधी " संवत्सर में शनि के उच्च राशि में आने से हर काम का तेजी से असर होगा। इस भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग रूक कर शांति से निर्णय लेंगे। शनिदेव न्यायप्रिय है इसलिए न्यायपालिका की व्यवस्था बदलेगी। सुखद बदलाव देखने को मिलेंगे। भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। गरीब देशों की अर्थव्यवस्था सुधरेगी। शनिदेव भारत को बदल देंगे।
 
शनि की यात्राः खगोलविज्ञान की दृष्टि से शनि 1 लाख, 20 हजार, 500 किमी व्यास वाला दूसरा बड़ा ग्रह है। दस किमी प्रति सेकंड की गति से यह ग्रह सूर्य से करीब डेढ़ अरब किमी दूर रहते हुए 29 वर्ष में एक चक्कर लगाता है। फलित ज्योतिष के अनुसार यह पृथ्वी पर और सौरमंडल में आने वाले सभी जड़चेतन पदार्थों को इस तरह प्रभावित करता है कि वह साफ दिखाई दे शास्त्रों के अनुसार शनि भगवान सूर्य और माता छाया के पुत्र हैं। इनके भाई यम देव ने शिव की दस हजार वर्षों तक तपस्या कर पितृलोक का राज्य और मरणोपंरात दंड देने का अधिकार प्राप्त किया था।

शनि को इसी लोक में प्राणियों को जीते जी उनके कर्मों का दंड पुरस्कार देने का अधिकार पहले से प्राप्त था। क्योंकि न्याय के मामले में शनि देव को बहुत कठोर दंड देने वाला न्यायाधीश माना गया है।

फलित ज्योतिष में शनि का शरीर लंबा, आंखें लाल और भूरे रंग की, दांत बड़े बड़े, केश कड़े, और आकृति डरावनी बताई गई है। ये मकर पृथ्वी तत्व और कुंभ वायु तत्व राशि के स्वामी होते हैं। मेष राशि में नीच और तुला राशि में उच्च होते हैं। शुक्र और बुध से शनि मित्रवत भाव रखते हैं। सूर्य, मंगल और चंद्रमा को अपने शत्रु मानते हैं। और गुरु के प्रति उदासीन रहते हैं। इनके दस वाहन बताए गए हैं। जिनमें अश्व, गज, हिरन कुकुर, सियार, सिंह कौआ, और गिद्ध हैं। इनमें गिद्ध को प्रधान वाहन माना है।

आध्यात्म ज्योतष में गिद्ध शब्द ता अर्थ अत्यधिक लोलुपता, वासना तृप्ति की व्यग्रता, ऐंद्रिय भोग की आतुरता और इन सबमें अतृप्ति का अनुभव हो। गिद्ध को शनि का वाहन माना है। अध्यात्म ज्योतिष में गिद्ध शब्द का अर्थ अत्यधिक लोलुपता, वासना तृप्ति की व्यग्रता, भोग की आतुरता और इन सबमें अतृप्ति का अनुभव है। गिद्ध को शनि का वाहन बनाने का उद्देश्य अतृप्त वासनाओं द्वारा शनि के मूल लक्ष्य की प्राप्ति और आध्यात्मिक दायित्व की सिद्धि है। शनि के प्रभाव से श्मशान वैराग्य होता है।

जिस किसी भी राशि पर शनि देव विचरण करते हैं, उस राशि सहित पिछली और अगली राशि पर इनकी साढ़ेसाती का प्रभाव रहता है। इस तरह एक राशि पर साढ़े सात वर्ष तक शनि का अच्छा बुरा प्रभाव होता है। वैसे सामान्य दिनों में भी शनि सभी जातकों को उनके जन्म नक्षत्रों के अनुसार दंडित और पुरस्कृत करता रहता है। लेकिन इस चक्र में लगभग तीस वर्ष के अंतर से बड़ा बदलाव आता है। 15 नवंबर से आ रहा परिर्वतन का दौर उसी तरह का है।

अपनी साढ़ेसात वर्ष की इस यात्रा के दौरान शनि ये जातक को दो हजार दिनों तक प्रभावित करते हैं। इस अवधि में 700 दिन तक कष्टकारी, इतने ही दिन दारुण दुख देने वाले और बाकी दिन अनुकूल समझे जाते हैं। जातकों से अपेक्षा की जाती है कि वे ग्रहों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपने आचार विचार को संतुलित और संयमित रखें पिछले कर्मों के दंड विधान में तो कोई कोताही नहीं है। लेकिन अपने आचार विचार को शुद्ध सात्विक रखकर दंड की कठोरता को कुछ नरम किया जा सकता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार आरंभ में 100 दिन तक साढ़ेसाती प्राणी के मुख रहती है। इन दिनों वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। मुख और गले से संबधित विकार से बचें। बाद में शनि का प्रभाव दाहिनी भुजा, सीना, पेट और बाईं भुजा पर होते हुए मस्तक तक जाता है। वहां से एकदम शरीर के निचले हिस्सों पर साढ़े साती का प्रभाव होता है। यह प्रभाव जातक के अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार दंड का विधान करता है। दंड का विधान इसलिए कि भूल चूक तो सभी से होती है।

अनजाने हुई हो तो भी उसका दंड तो मिलेगा ही, कांटे पर जानबूझकर पैर रखें या अनजाने में चुभेगा तो सही। सत्कर्म का पुरस्कार यह है कि बुरे कर्मों का दंड मिलते समय विधि का विधान उपचार और पथ्य की व्यवस्था भी करता चलता है। इसलिए शनि का प्रभाव परेशान करने के बजाय पुरस्कृत करता प्रतीत होता है।

राशियों पर प्रभाव
15 नंवबर के बाद शनि की स्थिति के अनुसार विभिन्न राशियों (जन्म के अनुसार) का हाल

मेष - सातवें शनि जीवन साथी से और ज्यादा प्रेमपूर्ण होने की प्रेरणा देते हैं। दोनों एक दूसरे के लिए भाग्यवर्धक रहेंगे। धर्म कार्यों में रुचि बढ़ेगी।
वृषभ - पर्याप्त आमदनी की संभावना है, लेकिन खर्च में सावधानी बरतें। मुकदमों और प्रशासनिक कामों में सफलता मिलेगी। संपर्क क्षेत्र बढ़ेगा।

मिथुन - कठिन परिश्रम के लिए तैयार रहें। बाधाओं को पार कर सकेंगे। आपसी व्यवहार में सद्भावपूर्ण रहें। जरूरतमंदों की मदद करते रहें।

कर्क - शनि की ढय्या भी होगी। अपने कार्य को ईमानदारी से करेंगे तो वांछित सफलता मिलेगी। शनिस्तोत्त्र अथवा शनि कवच का पाठ करें।

सिंह -जातक शनि की साढ़ेसाती से मुक्त हो रहे हैं। सभी रुकावटें दूर होंगी। संभावनाओं के नए क्षितिज खुलेंगे। अवसर का सदुपयोग करें।

कन्या - आकस्मिक धनलाभ का योग बन रहा है। अप्रत्याशित परिणाम सामने आएंगे। धर्म पर अडिग रहें। सफलता का मार्ग प्रशस्त होगा।

तुला - आपके जीवन में नई भूमिका की शुरुआत होगी। मकान, वाहन और और भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। मान प्रतिष्ठा की भारी वृद्धि होगी।

वृश्चिक - खर्च बढ़ेगा। इसी वर्ष साढ़ेसाती का आरंभ भी होगा। स्वास्थ्य पर ध्यान दें। शनिवार को पीपल की आराधना से ऊर्जा मिलेगी।

धनु- कामयाबी के मार्ग में आने वाली रुकावटें दूर होंगी। बड़े भाइयों संतान के प्रति आदर सत्कार का भाव रखें। पद और गरिमा बढेगी।

मकर - अच्छे परिर्वतन और फेरबदल की संभावना है। सफलताओं का सिलसिला शुरू होगा। माता पिता के स्वास्थ्य का ध्यान रखें।

कुंभ - धर्म और आध्यात्म की तरफ रुझान बढ़ेगा। जिम्मेदारियां बढ़ेंगी। परिवार में सामंजस्य बनाएं। परेशानियां आएंगी तो आसानी से चली जाएंगी।

मीन - शनि की ढैय्या आरंभ हो रही है। चुनौतिपूर्ण जिम्मेदारियों के लिए तैयार रहें। उन्नति के नए अवसर मिलने की संभावना है।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

नहीं थमेगा अब ये आंदोलन

नहीं थमेगा अब ये आंदोलन


टीम अन्ना के सदस्य अब यह आरोप लगा रहे हैं कि सरकार टीम अन्ना को तोड़ने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है. केजरीवाल के इस आरोप में कितनी सत्यता है, ये तो वही जानें पर मीडिया को पेड न्यूज दिए जाने की बात पर तो इतना ही कहा जा सकता है कि अब सरकार से संबंधित मीडिया की पूरी न्यूज ही कम या अधिक मगर पेड होती है. नहीं तो सूचना मंत्रालय, पब्लिसिटी बाले गाहेबगाहे मीडिया की ओर आंखे नहीं तरेरते. और मीडिया खासकर समाचार पत्रों को सूचना व जनसंपर्क अधिकारियों के साथ गलबहियां करते नहीं देखा जाता. खैर, सबके अपने स्वार्थ हैं. ये बहस लंबी है.
आज सवाल अन्ना हजारे के आंदोलन का है जिसने जनता में सरकार के विरोध की स्वस्फूर्त चिंगारी पैदा कर दी थी. एक बात पक्की है कि अन्ना हजारे द्वारा शुरू किया गया आंदोलन अब थमने वाला नहीं है. यह चिंगारी जो जनता में सुलगी है, वो जलती रहेगी. आज रात करीब ८.१५ बजे की बात है. मैं रात्रि भोजन के पश्चात टहलने निकला था. कुछ दवाओं की जरूरत थी तो एक दवा दुकान पर रुक गया. ग्राहकों के कारण मेरा नंबर आने में विलंब था. इस बीच दुकान के बगल में रहने वाली कुछ महिलाओं को आपस में बात करते देखा. बार-बार अन्ना हजारे का नाम आने पर स्वाभाविक रूप से उधर ध्यान गया. उनकी बातों का कोई सार नहीं था लेकिन बात हो तो रही थी अन्ना हजारे के आंदोलन की. बात हो रही थी सरकार कहां गलत है. मेरा चौंकना लाजमी था. जिस स्थान की बात मैं कर रहा हूं, वहां एक वृद्धा और दो अन्य लगभग ५५ साल की महिलाओं का इस तरह देश की राजनीति पर विचार-विमर्श करना वाकई चौंकाने वाला था. जिन महिलाओं को आज तक महानगर पालिका के चुनाव के समय भी चर्चा करते नहीं देखा, उन्हें आज देश की राजनीति पर चर्चा करते देख रहा हूं. ऐसा ही आश्चर्य तब होता है जब घर में अपनी माताजी को इन दिनों काला धन, भ्रष्टाचार, रामदेव बाबा, अन्ना हजारे जैसे मुद्दों पर चर्चा करते देखता हूं.  तो भी आश्चर्य होता है.  पहले जो लोग मिलते थे, वो देश का हाल-चाल पूछ लिया करते थे, क्योंकि वे एक पत्रकार से यही अपेक्षा रखते थे. आज जब वही लोग मिलते हैं तो न सिर्फ इस आंदोलन की गहराई जानने को इच्छुक रहते हैं, बल्कि ये लोग अपने विचार से भी अवगत कराते हैं. मानो वे देश की मीडिया को अपना विचार बता रहे हों.
इसलिए अब इस शंका की कोई संभावना नहीं है कि यह आंदोलन चलेगा या नहीं. आंदोलन तो चलेगा. भले ही लोग सड़क पर न उतरें मगर नदी के प्रवाह का अंडर करंट कोई नहीं रोक सकता. मीडिया में भी इस तरह खबरें तब तक छाई रहेंगी, जब तक मामला शांत नहीं दिखेगा. यह बात अलग है कि अब इस आंदोलन में अन्ना हजारे या उनकी टीम की क्या भूमिका रहती है. सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का सबसे पसंदीदा विषय आज भी आंदोलन और उससे जुड़े मुद्दों पर. जितने कमेंट्स पर होते हैं, उतने अन्य में नहीं. इसमें उन कमेंट्स को शरीक नहीं किया जा सकता, जो वाह-वाह, क्या खूब, बहुत खूबसूरत जैसे शब्दों से सजे होते हैं और मात्र संबंधों की प्रगाढ़ता के लिए किए जाते हैं. मैंने बार-बार यह महसूस किया है कि अन्ना हजारे को मिला समर्थन अन्ना का नहीं था बल्कि यह सरकार की हिटलशाही, अलोकतांत्रित कार्यप्रणाली, राजनेताओं की मनमानी, भ्रष्टाचार की अति जैसी मुद्दों के खिलाफ था. इसे भी कुछ लोगों ने संविधान को बदलने की साजिश करार देकर बदनाम करने का कुचक्र रचा था. अपने समर्थकों तक तो उनका प्रयास सफल रहा था लेकिन वृहद पैमाने पर वो कुछ नहीं कर पाए थे.
दरअसल इस आंदोलन को अन्ना हजारे का आंदोलन मानने की भूल करना ही गलत है. सरकार एक ही भूल बार-बार किए जा रही है. वो अन्ना हजारे की टीम पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है. सरकार अब भी दिल से यह मानने को तैयार नहीं है कि यह आंदोलन आम आदमी का है. यह देश की प्रताड़ित जनता का है. आजादी के बाद यह पहला आंदोलन है जिसमें समाज के सभी वर्ग, उम्र, जाति, संप्रदाय के लोगों ने भाग लिया. इस आंदोलन ने उन लोगों में भी एक बार फिर चैतन्य पैदा किया है जो गत एक दशक से जनांदोलनों से विमुख हो गए थे. वे सभी लामबंद हो रहे हैं. जिस युवा वर्ग को हम राजनीति से पूरी तरह विमुख मान चुके थे, उसने इसमें अपना विस्मयकारी योगदान दिया. जिस विपक्ष को सोया हुआ मान लिया गया था, वो अब मुखर है. भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी कहीं भी हमला बोलने से परहेज नहीं कर रहे हैं. मीडिया इससे संबंधित समाचारों को प्रमुखता से प्रकाशित कर रहा है. स्वामी अग्निवेश बिग बास में शामिल हो रहे हैं. यह सब उसी जनता को इनकैश करने के लिए हो रहा है जो अन्ना के आंदोलन का समर्थन कर रही है.

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

Shri Ram Dhun

Shri Ram Dhun

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
के ज़िन्दगी तेरी जुल्फों
की नरम छांव में गुजर न पाती
तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरे जीस्त का मुकद्दर है
तेरी नजर की शुआओं में खो भी सकती थी

अजब न था के मैं बेगान-इ-आलम हो कर
तेरे ज़माल की रानाइओ मे खो रहा था
तेरा गुदाज़ बदन तेरे नीम बार आँखे
इन्ही फसानो में मैं खो रहा था

पुकारती मुझे जब तल्खायीं ज़माने की
तेरे लबो से हालावत के घूंट पी लेता
हयात चीखती फिरती बारहना सर, और मैं
घनेरी जुल्फों के साए मे जी लेता

मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
के तू नहीं, तेरा गम ,तेरी जुस्तुजू भी नहीं
गुजर रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरजू भी नहीं

न कोई राह, न मंजिल ,न रौशनी का सुराग
भटक रही है अंधेरो में ज़िन्दगी मेरी
इन्ही अंधेरो में रह जाऊंगा कभी खोकर
मै जानता हूँ मेरी हम नफस, मगर युहीं
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है,,,,,,,

- साहिर लुधियानवी

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

कहकहे




कहकहे लगाते हैं
ठठा के हंसते हैं
मुझे मेरी मजबूरी
याद दिलाते हैं

फिर भी नहीं कर पाते
मजबूर मुझे
झकझोर भी नहीं पाते
हैं मुझे

कहीं कहीं फौलाद
का कवच चढ़ा है
क्योंकि मारने वाले से
बचाने वाला बड़ा है

अपनी शानोशौकत का
दिखावा करते हैं
अपनी बुद्धिमत्ता का
ढिंढोरा पीटते हैं

हम करें सो कायदा
पर यकीन है उन्हें
अपनी औकात पर
झूठा घमंड है उन्हें

हम भी अपनी सोच को
जिंदा रखते हैं
वो जिन्हें बदलने को
मजबूर करते हैं

काश उन्हें कायदे से
कायदे का भान हो जाए
झूठा घमंड हमेशा
के लिए टूट जाए......