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शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

मां दुर्गा का चतुर्थ स्वरूप कूष्माण्डा


।। दत्त गुरु ओम्, दादा गुरु ओम्।।


मां दुर्गा अपने चतुर्थ स्वरूप में कूष्माण्डा के नाम से जानी जाती हैं. नवरात्र के चौथे दिन आयु, यश, बल व ऐश्वर्य को प्रदान करने वाली भगवती कूष्माण्डा की उपासना-आराधना का विधान है.

अपनी मंद हंसी द्वारा अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से अभिहित किया गया है. जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर अंधकार ही अंधकार परिव्याप्त था तब इन्हीं देवी ने अपने ईषत हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी. अत: यही सृष्टि की आदि स्वरूपा आदि शक्ति मानी जाती हैं. इनके पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व था ही नहीं. इनकी आठ भुजाएं हैं. अत: ये अष्टभुजा देवी के नाम से विख्यात हैं. इनके सात हाथों में क्रमश: कमण्डल, धनुष बाण, कमल, पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं. आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है. इनका वाहन सिंह है.


अपनी मंद, हल्की हंसी द्वारा ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के रूप में पूजा जाता है. संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ कहते हैं. बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है. इस कारण से भी मां कूष्माण्डा कहलाती हैं.


सर्वप्रथम मां कूष्मांडा की मूर्ति अथवा तस्वीर को चौकी पर दुर्गा यंत्र के साथ स्थापित करें इस यंत्र के नीचे चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं. अपने मनोरथ के लिए मनोकामना गुटिका यंत्र के साथ रखें. दीप प्रज्ज्वलित करें तथा हाथ में पीले पुष्प लेकर मां कूष्मांडा का ध्यान करें.


ध्यान मंत्र


वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्.

सिंहरूढा अष्टभुजा कुष्माण्डा यशस्वनीम्॥

भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्.

कमण्डलु चाप, बाण, पदमसुधाकलश चक्र गदा जपवटीधराम्॥

पटाम्बर परिधानां कमनीया कृदुहगस्या नानालंकार भूषिताम्.

मंजीर हार केयूर किंकिण रत्‍‌नकुण्डल मण्डिताम्.

प्रफुल्ल वदनां नारू चिकुकां कांत कपोलां तुंग कूचाम्.

कोलांगी स्मेरमुखीं क्षीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ॥


स्त्रोत मंत्र


दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनीम्.

जयंदा धनदां कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

जगन्माता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्.

चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यसुंदरी त्वंहि दु:ख शोक निवारिणाम्.

परमानंदमयी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥


कवच मंत्र


हसरै मे शिर: पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्.

हसलकरीं नेत्रथ, हसरौश्च ललाटकम्॥

कौमारी पातु सर्वगात्रे वाराही उत्तरे तथा.

पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम.

दिग्दिध सर्वत्रैव कूं बीजं सर्वदावतु॥


भगवती कूष्माण्डा का ध्यान, स्त्रोत, कवच का पाठ करने से अनाहत चक्र जाग्रत हो जाता है, जिससे समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं तथा आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है.

माँ दुर्गा का तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा

।। दत्त गुरु ओम्, दादा गुरु ओम।।


माँ दुर्गा की तृतीय शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि विग्रह के तीसरे दिन इन का पूजन किया जाता है। माँ का यह स्वरूप शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी लिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनका शरीर स्वर्ण के समान उज्जवल है, इनके दस हाथ हैं। दसों हाथों में खड्ग, बाण आदि शस्त्र सुशोभित रहते हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने वाली है। इनके घंटे की भयानक चडंध्वनि से दानव, अत्याचारी, दैत्य, राक्षस डरते रहते हैं। नवरात्र की तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है। इस दिन साधक का मन मणिपुर चक्र में प्रविष्ट होता है। मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक को अलौकिक दर्शन होते हैं, दिव्य सुगन्ध और विविध दिव्य ध्वनियाँ सुनायी देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं । माँ चन्द्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं । इनकी अराधना सद्य: फलदायी है। इनकी मुद्रा सदैव युद्ध के लिए अभिमुख रहने की होती हैं, अत: भक्तों के कष्ट का निवारण ये शीघ्र कर देती हैं । इनका वाहन सिंह है, अत: इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों की प्रेत-बाधादि से रक्षा करती है । दुष्टों का दमन और विनाश करने में सदैव तत्पर रहने के बाद भी इनका स्वरूप दर्शक और अराधक के लिए अत्यंत सौम्यता एवं शान्ति से परिपूर्ण रहता है ।

इनकी अराधना से प्राप्त होने वाला सदगुण एक यह भी है कि साधक में वीरता-निर्भरता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होता है। उसके मुख, नेत्र तथा सम्पूर्ण काया में कान्ति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक, माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चन्द्रघंटा के साधक और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शान्ति और सुख का अनुभव करते हैं। ऐसे साधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का दिव्य अदृश्य विकिरण होता है। यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखलायी नहीं देती, किन्तु साधक और सम्पर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भलीभांति कर लेते हैं साधक को चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि-विधान के अनुसार पूर्णत: परिशुद्ध एवं पवित्र करके उनकी उपासना-अराधना में तत्पर रहे । उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं । हमें निरन्तर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सदगति देने वाला है। माँ चंद्रघंटा की कृपा से साधक की समस्त बाधायें हट जाती हैं।

ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

कवच

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

कैक्टस के फूल


खिलखिलाएं तो रेगिस्तान में बहार जाती है
चंद कैक्टस के फूलों की बयार जाती है
फूल हैं, वैसे ही हैं जैसे होते हैं दूसरे फूल
वीरान मरु में सौंदर्य की किरण होती है


सर पर सूरज की तीखी किरणें
पैरों पर रेगिस्तान की तपती रेत
परवाह नहीं होता हे उसे इनका
उसकी अदाएं नाजुक ही रहती हैं

इन फूलों को सहारा देती है वो डाल
हरित वर्ण मगर लबरेज कांटों से
फूलों को इस तरह संजोए अपने पाश में
मानो प्रकृति का कड़वा सच कहती है

जिंदगी भी है इस कैक्टस के मानिंद
उसके पास सूर्य भी है चंदा भी है,
हवाएं भी हैं, हैं अलग अंदाज में
मगर फितरत उनकी सबसे जुदा होती हैं

कोई शिकायत नहीं प्रकृति से
कोई शिकवा नहीं भाग्य की लकीरों से
उसकी खासियत ही होती है ये
बिन पानी वह सून नहीं होती है


बुधवार, 28 सितंबर 2011

मां दुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी

।। दत्त गुरु ओम्, दादा गुरु ओम्।।


दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

मां दुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है।

ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं।

पूर्व जन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया।

एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए।

कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी! आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।

इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है।

शारदीय नवरात्र- पहला दिन

दत्त गुरु ओम्, दादा गुरु ओम्।।

शारदीय नवरात्र की आज से शुरूआत हो गई है.नवरात्र का आज पहला दिन है.नवरात्र के नौ दिनों में आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है.

मां के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है. नवरात्र के नौ दिनों मे मां दुर्गा के जिन नौ रूपों का पूजन किया जाता है.

देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप : शैलपुत्री (28 सितम्बर)

नवदु्र्गाओं में सर्वप्रथम गिरिराज हिमवान की पुत्री शैलपुत्री का नाम आता है. श्वेत एवं दिव्यस्वरूपा वृषभ पर आरूढ़ हिमवान की पुत्री आदि महाशक्तिरूपा सती पूर्व जन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं.

जब दक्ष ने एक यज्ञ के आयोजन में सभी देवताओं को आमंत्रित किया लेकिन आदिदेव शंकर जी को नहीं बुलाया तो सती शंकर जी से आज्ञा लेकर अपने पिता के घर गईं.

सती अपने पिता दक्ष प्रजापति के ऊपर अपने पति शंकर जी को न बुलाए जाने पर अत्यंत क्रोधित हुईं. पिता दक्ष प्रजापति ने सती के सामने ही शंकर जी को कुछ अपमानजनक शब्द बोले जिसे सती अपने पति शंकर जी का अपमान सहन न कर सकीं.

अपमानित सती ने अपने पिता दक्ष की भर्त्सना की एवं दहकते यज्ञ कुंड में अग्नि की ज्वाला में अपनी योगमाया की शक्ति का आवाहन कर के अपने प्राण त्याग दिए.

वहीं सती कालांतर में पार्वती के रूप में पुन: हिमालय की पुत्री बनकर शंकर जी की अरधागिनी बनीं. यही पार्वती देवी ने इन्द्रादि देवताओं के अंहकार को नष्ट करने के लिए उनको शक्तिहीन कर दिया. तब ब्रहमा, विष्णु एवं महेश त्रिदेवों को लेकर सभी देवता पार्वती देवी की शरण में गए एवं दीन भाव से उनकी स्तुति की.

देवताओं द्वारा की गई स्तुति से प्रसन्न होकर पार्वती जी ने पुन: उन्हें अस्त्र-शस्त्र के साथ उनकी शक्ति को वापस किया. इन्हीं देवी पार्वती को देवी शैलपुत्री के नाम से पुकारा गया.

ध्यान मंत्र

वंदे वांछित लाभायचन्द्रार्धकृतशेखराम् ।

वृषारुढ़ां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम् ।।

अर्थात् मनोवांछित लाभ के लिए मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली, वृष पर आरूढ़ होने वाली, शूलधारिणी, यशस्विनी शैलपुत्री दुर्गा जी की मैं वंदना करता हूं. इस प्रकार ध्यान करते हुए शैलपुत्री देवी के मंत्र ‘ऊं’ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊं शैलपुत्री देव्यै नम:’ का नित्य एक माला जाप करने से हर प्रकार की शुभता प्राप्त होती है.

पंडितों के अनुसार इस बार का शारदीय नवरात्र बहुत शुभ है. 9 दिनों के पूर्ण नवरात्रों में न तो किसी तिथि का क्षय है और न वृद्धि. नवरात्र का समापन बुधवार 5 अक्टूबर को होगा. गुरूवार को यानी 06 अक्टूबर को विजय दशमी का पर्व मनाया जाएगा. इसी दिन दशहरा है.

सोमवार, 19 सितंबर 2011

पानी पर अधिकार किसकाः उद्योगों का या खेतों का

जल संपत्ति नियमन प्राधिकरण (सुधार) विधायक को लेकर राज्य सरकार एक बार फिर सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्ष के निशाने पर आई. या यूं कहें कि सरकार एक बार फिर बैकफुट पर चली गई. 13 और 14 अप्रैल के दरम्यान मध्य रात्रि में इस विधेयक को चालाकी से राज्य सरकार ने विधानसभा में तो पारित करा लिया, लेकिन इसके बाद उठा विरोध शांत कराने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा. विधानसभा से विधान परिषद पहुंचते तक विपक्ष और सरकारी पक्ष के वे विधायक जो इसके विरोध में थे, सख्त हो गए. सरकार को पता था कि अब यह विधेयक पारित कराना उतना आसान नहीं होगा तो मुख्यमंत्री ने विधान परिषद में दो महत्वपूर्ण घोषणाएं कर दीं. पहला यह कि पानी की प्राथमिकता पेयजल के बाद कृषि की होगी. दूसरा यह कि पानी वितरण का अधिकार उच्चाधिकार समिति से हटाकर मंत्रिमंडल को सौंप दिया गया. अब विधेयक में इस संशोधन को पारित कराने के लिए इसे एक बार फिर विधानसभा के पटल पर रखना होगा.

राज्य में पानी के वितरण का अधिकार पहले उच्चाधिकार समिति के पास हुआ करता था. 2005 में इसे महाराष्ट्र जल संपदा नियमन प्राधिकरण को दे दिया गया. पर सरकार की उक्त समिति की दबंगई जारी रही. जब मामले न्यायालय में पहुंचने लगे और विरोध के स्वर मुखरित होने लगे. तब सरकार ने इस साल जनवरी में बाक़ायदा अध्यादेश लाकर समूचा अधिकार समिति को दे दिया. अब इस अध्यादेश को क़ानून बनाने के लिए इसे विधानसभा में पारित करा लिया गया. सिंचाई परियोजनाओं के पानी पर उद्योगों से पहले किसानों का अधिकार होता है. अगर यह क़ानून विधान परिषद में भी पारित हो जाता तो इसका सबसे ज़्यादा नुक़सान विदर्भ और मराठवाड़ा को होता, जहां पहले ही किसानों की हालत खस्ता है. पानी की स्थिति का़फी खराब है. सवाल यह उठता है कि आ़खिर उद्योगों को पानी देने के लिए सरकार किसानों की बलि क्यों लेना चाहती है. उद्योगों के लिए आधारभूत संरचना तैयार करने की ज़िम्मेदारी सरकार की है. इसके लिए सिंचाई के पानी का उपयोग और फिर देश की अर्थ व्यवस्था की प्रमुख आधार कृषि को बर्बाद करने का क्या तुक है?

13 अप्रैल को जब महाराष्ट्र्र विधानसभा में महिलाओं को स्थानीय स्वराज्य संस्था में 50 फीसदी आरक्षण देने का ऐतिहासिक विधेयक मंजूर हुआ तो लगा कि सरकार का ध्यान जनता के कल्याण की ओर है. लेकिन उसके डेढ़ घंटे बाद ही सरकार का असली चेहरा सामने आ गया. जल संसाधन मंत्री सुनील तटकरे ने जल संपत्ति नियमन प्राधिकरण (सुधार) विधेयक सदन पटल पर रखा और इसे मंजूर भी कर लिया गया. यह सारी कवायद हुई आधी रात को. आधी रात को भी ऐसे समय में यह विधेयक मंजूर किया गया जब विपक्ष के गिने-चुने सदस्य ही सदन में उपस्थित थे. ऐसे में भाजपा विधायक देवेंद्र फ़डणवीस के इस दावे पर यक़ीन करना लाजिमी हो जाता है कि सरकार इस विधेयक को पारित कर खेती के लिए आरक्षित पानी का उपयोग उद्योगों के लिए करना चाहती है. वैसे भी इंडिया बुल्स की इकाई सोफिया पावर लिमिटेड, अमरावती को पानी की उपलब्धता को लेकर का़फी हो हल्ला हो चुका है और अब यह मामला उच्च न्यायालय में है. अगर यह विधेयक विधान परिषद में भी मूल रूप में पारित हो जाता तो सिंचाई परियोजनाओं से पानी की आपूर्ति का अधिकार राज्य सरकार की उच्च स्तरीय समिति को मिल जाता. इस समिति के अध्यक्ष जल संसाधन मंत्री होते और इस समिति में उद्योग मंत्री, कृषि मंत्री सहित वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया जाता. मज़े की बात यह है कि इस समिति द्वारा तय किए गए पानी के आवंटन को न्यायालय में चैलेंज नहीं किया जा सकता था. जबकि इसके पूर्व जल प्राधिकरण को यह निर्णय लेने का अधिकार दिया गया था जिसके निर्णय को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती थी.महाराष्ट्र में पानी की जटिल होती जा रही समस्या के निवारण की जगह सरकार बचे-खुचे पानी पर एकाधिकार करने पर ज़्यादा ध्यान दे रही है. यह सवाल उठना लाजिमी है कि ऐसा क्या कारण है कि सरकार को आनन-फानन इस विधेयक को पारित कराने की जल्दबाजी हो गई.

वैसे इस संबंध में विपक्ष के आरोपों में भी खास दम नज़र नहीं आता है क्योंकि यह विधेयक कई दिनों पहले ही विधानसभा में रखा जा चुका था. उस दिन की सदन की कार्यसूची में भी यह विषय शामिल था. इस विधेयक के साथ ही कार्यसूची के काम आगे ले जाने के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों की स्वीकृति आवश्यक है. सत्ता पक्ष ने यह सहमति नहीं दिखाई. जबकि विरोधी पक्ष ने भी सावधानी नहीं बरती. क्या कारण था कि भाजपा के देवेंद्र फ़डणवीस, शेतकरी कामगार पक्ष के धैर्यशील पाटील, मीनाक्षी पाटील, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रवीण दरेकर जैसे कुछ ही विधायक सदन में मौजूद थे? पहले भी राज्य के जल संसाधनों से पानी वितरण का अधिकार मंत्रियों के पास था. लेकिन सरकार ने सन 2005 में बाक़ायदा क़ानून बनाकर महाराष्ट्र जलसंपदा नियमन प्राधिकरण की स्थापना की. समान वितरण, अलग-अलग उपयोग के लिए पानी की उचित दर निर्धारित करने का अधिकार इस प्राधिकरण को दिया गया. अब इस विधेयक के आ जाने से पानी पर जन भागीदारी बढ़ाने के मिशन पर ही प्रश्न चिह्न लग गया है. प्राधिकरण की स्थापना का मूल उद्देश्य ही यह था कि पानी का समान वितरण हो, पानी की बर्बादी रुके, इसे प्रदूषण मुक्तरखा जाए. प्राधिकरण कोई भी निर्णय लेने के पहले जनता दरबार के माध्यम से इस पर सुनवाई करता था. अब यह जन सहभागिता का मामला ही खत्म हो जाएगा. इस सुनवाई के बाद भी अगर निर्णय से अगर असहमति हो तो न्यायालय में इसे चुनौती दी जा सकती थी. आरोप उद्योगों को प्राथमिकता देने का था, अमरावती में इंडिया बुल्स कंपनी की ताप विद्युत परियोजना सोफिया पावर लिमिटेड को पानी देने का था. वैसे तो 11 जनवरी 2011 को अध्यादेश जारी कर पानी वितरण का सर्वाधिकार जल संपत्ति नियमन प्राधिकरण से हटाकर उच्चाधिकार प्राप्त समिति को दे दिया गया. विधायक और स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के नेता राजू शेट्टी तो सरकार के इस कृत्य को सीधे-सीधे पानी पर डाका डालना करार देते हैं. उनका सा़फ आरोप है कि अब तक जिस प्रकार मंत्रियों-अधिकारियों के इर्द-गिर्द बालू माफिया, तेल माफिया, ज़मीन माफिया के लोग सक्रिय रहते हैं, उसी प्रकार अब पानी माफिया भी सक्रिय जाएगा. अब किसानों को मात्र पानी के लिए मंत्रियों के पीछे दौड़ना होगा. वर्षों से राज्य में यह परंपरा रही है कि पानी आवंटन में पहले पेयजल, फिर सिंचाई और बाद में उद्योग-धंधों को प्राथमिकता दी जाए. कांग्रेस कोटे के मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटील इसका सीधा विरोध तो नहीं करते हैं लेकिन कहते हैं कि कृषि बर्बाद कर उद्योग-धंधे बढ़ाने के प्रयासों का वे विरोध करते हैं.

एक ओर सरकार के पास सिंचाई योजनाओं को पूरा करने के लिए निधि नहीं है. अपर वर्धा प्रकल्प को तो केंद्र की सहायता से यह कहकर पूरा कराया गया कि इसके पानी का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाएगा. इस पर से आलम यह है कि सन 2003 से जनवरी 2010 के बीच राज्य की हेटावणे, अंबा, सूर्या, अपर वर्धा, गंगापुर, उजणी मिलाकर 38 सिंचाई परियोजनाओं का 1500 मीलियन क्यूबिक मीटर पानी कृषि के अलावा अन्य कार्यों के लिए दे दिया गया. इससे अनुमान है कि लगभग साढ़े छह लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि की सिंचाई बाधित हुई. इसमें से 90 फीसदी ज़मीन की सिंचाई 2007 से 2009 के बीच बाधित हुई. इसमें से 54 फीसदी उद्योगों तथा 46 फीसदी शहरों में पेयजल या अन्य कार्यों के लिए था. इन सभी जल आवंटनों को कानूनी जामा पहनाने के लिए ही यह विधेयक विधानसभा से पारित किया गया था.

अब लोकाभिमुख पानी संघर्ष मंच ने इसके खिलाफ आंदोलन करने की चेतावनी दी है. मंच ने सवाल किया है कि अगर उद्योगों को पानी की गारंटी दी जा रही है तो फिर कृषि के लिए पानी की गारंटी क्यों नहीं है. मंच की मांग है कि इस विधेयक को पहले एक सर्वदलीय समिति के पास भेजा जाना चाहिए था. उसके बाद ही कोई क़ानून पारित किया जाना चाहिए था. इस मंच ने राज्य भर में तेज़ आंदोलन की चेतावनी भी दी है.

मंत्रीयों की चुप्पी

आश्चर्य तो इस बात का है कि जब जनवरी में सरकार ने अध्यादेश जारी कर पानी वितरण का अधिकार उच्चाधिकार समिति को सौंपा था, उसी समय मंत्रियों और विधायकों ने इसका मुखर विरोध क्यों नहीं किया. कहीं ऐसा तो नहीं था कि तेरी भी चुप-मेरी भी चुप की तर्ज पर सब कुछ कर लेना तय हो चुका था. अब विधान परिषद में इसके पारित हो जाने के बाद भी पानी वितरण में जन भागीदारी पर सवाल का जवाब तो जन प्रतिनिधियों को देना ही होगा.

प्रश्न जिनके जवाब सरकार को देने होंगे

  • उन निर्णयों का क्या जो महाराष्ट्र जल संपत्ति नियमन प्राधिकरण के गठन के बाद सन 2005 से 2010 के बीच जल वितरण के निर्णय उच्चाधिकार समिति ने लिए?
  • पानी वितरण का अधिकार किसे होना चाहिए?
  • पानी वितरण के तरीके क्या होने चाहिए?
  • पानी पर पहला अधिकार किसका है?
  • जब प्राधिकरण की स्थापना कर दी गई है तो उच्चाधिकार समिति को यह अधिकार क्यों दिया गया?
  • कृषि ज़रूरी है या उद्योगों की स्थापना?
  • संतुलित विकास की यह कौन सी परिभाषा है?
  • पानी पर जन भागीदारी की अवधारणा का क्या हुआ?
  • सिंचाई योजनाएं क्यों पूरी नहीं हो पा रही हैं?
  • सिंचाई के पानी की वैकल्पिक व्यवस्था क्या है?

विदर्भः सावधान यह सुसाइड जोन है

कर्ज से दबे किसानों के पास खेती के अलावा ऐसा कोई दूसरा काम नहीं जिससे वह अपना क़र्ज़ उतार सकें. कपास की खेती उन्हें वर्षों से रुला रही है. किसानों को ख़ुदकुशी से बचाने के लिए सरकार ने उन्हें कपास की जगह सोयाबीन की खेती करने की सलाह दी. मजबूर किसानों ने सरकारी सलाह मानते हुए बड़ी उम्मीद के साथ कपास की जगह सोयाबीन का दामन थामा. एक उम्मीद की किरण दिखाई दी, लेकिन किसानों को एक बार फिर मायूसी ही हाथ लगी. हालात इतने ख़राब हैं कि विदर्भ की धरती सुसाइड ज़ोन बनती जा रही है और यहां किसानों की आत्महत्या रुकने का नाम नहीं ले रही है. कभी बारिश की बेरुख़ी तो कभी फसलों पर रोगों का प्रकोप, तो कभी कृषि उत्पाद का बहुत कम भाव मिलना परेशानी का कारण बना हुआ है. कुल मिलाकर हालात साल दर साल ख़राब ही होते जा रहे हैं.

किसानों की ख़ुदकुशी के मामले में महाराष्ट्र का विदर्भ बदनाम है. यहां क़र्ज़ के बोझ के चलते रोज़ाना किसान अपनी ज़िंदगी ख़त्म कर लेते हैं. सालों से चल रहा ये सिलसिला आज भी क़ायम है. सरकार ने इसे रोकने की कोशिश की, लेकिन परिणाम शून्य ही रहा है.

साल 2007 में विदर्भ में 1556 किसानों ने आत्महत्या की. आंकड़ों की तऱफ नज़र डालें तो 2004 से 2010 तक 8004 किसान काल के गाल में समा गए. किसानों की ख़ुदकुशी की संख्या में इज़ा़फा भी सरकारी पैकैज में बढ़ोतरी के साथ हुआ है. दशक के आंकड़ों पर नज़र डालें तो साल दर साल हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. यह हालत उस विदर्भ की है, जहां 22 लाख से ज़्यादा किसान हैं. इनमें से 90 फीसदी क़र्ज़ के बोझ तले दबे हैं. यहां किसान सरकारी बैंकों के अलावा सेठ साहूकारों से भी क़र्ज़ लेते हैं. किसानों की मूल समस्याओं पर न तो राज्य और न ही केंद्र सरकार ने कभी गंभीरता से काम किया है. अब साहूकारों के क़र्ज़ पर पाबंदी लग गई तो माइक्रो फाइनांस के नाम पर बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां इस धंधे में कूद गईं हैं. जानकारों को डर है कि आने वाले दिनों में कृषि पर रिटेल की तरह ही कॉरपोरेट समूहों का क़ब्ज़ा हो जाएगा.

विदर्भ में आज सबसे अधिक ज़रूरत ग्रामों के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को पुनर्स्थापित करने की है. इसके तहत खाद्य सुरक्षा, निःशुल्क स्वास्थ्य सुरक्षा, असिंचित ज़मीन वाले किसानों को वैकल्पिक आय के साधन के साथ ही आत्महत्या कर रहे परिवारों के बीच प्रशासन की पुख्ता पहुंच जैसे मुद्दों पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है. बारिश अधिक हो जाए या कम, या फिर प्रकृति की मेहरबानी के बावजूद फसल रोगों के प्रादुर्भाव से नष्ट हो जाए. ऐसे में किसानों के लिए आय के वैकल्पिक उपाय योजना पर ध्यान दिए जाने की भी ज़रूरत है. आंकड़े बताते हैं कि विदर्भ में किसानों को फसल के लिए मिलने वाली क़र्ज़ की राशि भी कम हुई है. सन 2006 में जहां किसानों को 1800 करोड़ रुपए का क़र्ज़ दिया गया था, वहीं सन 2010 में यह आंकड़ा महज़ 1160 करोड़ रुपए पर सिमट कर रह गया. नगद फसल की ओर भी किसानों का रुझान सरकारी तौर पर बढ़ाया गया है. सन 2000 में जहां नगद फसल 70 फीसदी और अनाज 30 फीसदी क्षेत्रफल में लगाया गया था, वहीं 2010 में अनाजों का क्षेत्रफल घटकर महज़ 5 फीसदी रह गया. नगद फसल पूरी तरह प्रकृति पर आश्रित रहती हैं, क्योंकि तमाम प्रयासों के बावजूद विदर्भ में 20 प्रतिशत से अधिक सिंचाई की व्यवस्था नहीं हो सकती है. ऐसे में सिंचाई की ज़रूरत वाली फसलों को प्रोत्साहित करना भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सेंध लगाने जैसा ही है. इसके साथ ही विदर्भ में सबसे बड़ी ज़रूरत जल संवर्धन को एक आंदोलन का रूप प्रदान करने की है. गांवों में खेत तालाब और गांव तालाब को गहरा करने जैसे विकल्प सस्ते भी हैं और प्रभावशाली भी. कुछ वर्षों पूर्व गांव के तालाब को गहरा करने का अभियान पूरे राज्य के लिए शुरू किया गया था, लेकिन समय के साथ इसका हश्र भी अन्य शासकीय योजनाओं जैसा ही हो गया.

वर्षवार किसानों की आत्महत्या
2004 256
2005 666
2006 1886
2007 1556
2008 1680
2009 1054
2010 706
कुल 8004
मनरेगा के तहत कुछ लोगों को रोज़गार तो मिल गया, परन्तु यहां भी ठेकेदारों की मिलीभगत से सब कुछ काग़ज़ों पर ही सिमट कर रह गया. तालाब को गहरा करने के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो पाई. जानकार बताते हैं कि यदि जल संवर्धन के प्रयासों को बढ़ावा दिया गया तो गांवों में सुजलाम, सुफलाम की स्थिति आ सकती है. खाद और बीज की क़ीमतों पर भी नियंत्रण नहीं है. परंपरागत बीजों और खाद का चलन ख़त्म हो गया है. खाद और बीज उत्पादक कंपनियों की मार्केटिंग इतनी प्रभावशाली रही कि रसायनयुक्त बीजों और खाद ने परंपरागत कृषि पर क़ब्ज़ा जमा लिया. मिट्टी के क्षरण को रोकने के साथ ही ज़ीरो बजट वाली पारंपरिक खेती को प्रोत्साहित करने की अपेक्षा महंगे खाद, बीज को प्रोत्साहित किया जाना समझ से परे है. राज्य और केंद्र दोनों ही सरकारों को इस संबंध में ठोस नीति बनानी चाहिए. किसानों को आर्थिक पैकेज की घोषणा केंद्र और राज्य द्वारा लगातार की जा रही है. 2004 में 1075 करोड़, 2005 में 3750 करोड़, 2008 में 71 हज़ार करोड़, जबकि 2009 में 6208 करोड़ रुपए का पैकेज दिया गया. इसके साथ ही किसानों की आत्महत्या की संख्या भी घटती-बढ़ती रही है. गौ पालन को बढ़ावा देने की बात कृषि के साथ वैकल्पिक व्यवसाय के रूप में की जाती है, लेकिन यहां ऐसा नहीं हो पाया. सन 2000 में जहां विदर्भ के किसानों के पास 26 लाख गायें थीं, वहीं 2010 में यह संख्या घटकर 6 लाख पर पहुंच गई. बैंकों द्वारा किसानों के कृषि क़र्ज़ तो कम कर दिए गए, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि मोटर साइकिलों की संख्या और शराब का सेवन 10 गुना से ज़्यादा हो गया. सन 2000 में शराब का सेवन 2 लाख लीटर था, वहीं सन 2010 में यह बढ़कर 24 लाख लीटर हो गया. मोटर साइकिल के मामले में भी यही स्थिति है. सन 2000 में जहां 80 हज़ार मोटर बाइक थी, वहां सन 2010 में इसकी संख्या बढ़कर 8 लाख हो गई. सरकारी आंकड़े भी कहते हैं कि राज्य में 1999 के 66 लाख बीपीएल परिवारों की तुलना में सन 2010 में यह संख्या घटकर 16 लाख परिवार पर सिमट गई. किसानों की आत्महत्या भी बढ़ी, ग़रीबी रेखा के नीचे लोगों की संख्या घटी, मोटर साइकिलों की संख्या बढ़ी, शराब का सेवन बढ़ा, यानी हर जगह आंकड़ों के साथ छेड़छाड़. किसानों की हालत सुधारने की दिशा में कार्य करने वाली स्वयंसेवी संस्था विदर्भ जनांदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी इन सभी समस्याओं के लिए सरकार और किसानों के रहनुमा नेताओं को दोषी मानते हैं. तिवारी का मानना है कि ऐसे समय जब विदर्भ में 20 फीसदी से अधिक सिंचाई की सुविधा संभव ही नहीं है, नगद फसल को बढ़ावा देना ग़लत है. नगद फसलें गन्ना, कपास आदि के लिए सिंचाई ज़रूरी है. सिंचाई के साथ ही इन फसलों की लागत मूल्य भी अधिक होती है, जबकि यहां ऐसी फसलों को ही बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो बारिश के पानी के भरोसे ही अच्छी पैदावार दे सकें. अनाज की जगह नगद फसलों को प्रोत्साहित करना ही किसानों को मौत का निमंत्रण देना है.

फिर चाहिए समाजवाद और लोकतंत्र

भारतीय लोकतंत्र में एक दौर चला था, खिचड़ी सरकारों का. खिचड़ी इसलिए क्योंकि बाद में गठबंधन शब्द अधिक गरिमामय और प्रतिष्ठित या यूं कहें टिकाऊ हो गया. तो खिचड़ी सरकारों के दौर में मीडिया के ही प्रबुद्ध वर्ग ने आवाज़ उठाई थी देश में द्विदलीय प्रणाली की. खैर, द्विदलीय प्रणाली तो नहीं हो सकी लेकिन यूपीए और एनडीए नामक दो सशक्त गठबंधन ज़रूर बन गए, जिसमें तमाम छोटी पार्टियां समाहित हो गईं. इन तमाम पार्टियों के अपने निहित स्वार्थ हैं. एक का नेतृत्व कमोबेश पूरी तरह कांग्रेस और दूसरी का पूरी तरह भाजपा के हाथ में आ गया. अब हम कह सकते हैं कि अब हमारा लोकतंत्र द्विदलीय सिद्धांत की राह पर चल पड़ा है. जो किसी के साथ नहीं हैं, उनके पीछे सीबीआई है. लेकिन इसका अभी तो आगाज़ है और आगाज़ की खामियां हमें अंजाम दिखा रही हैं. भले ही वामपंथ का क़िला ढह गया हो, लेकिन देश की हालिया घटनाएं अब हमें एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि क्या फिर एक बार हमें राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण जैसे सशक्त समाजवादी हस्ताक्षर और ज्योति बसु, हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे सशक्त वामपंथी हस्ताक्षर की आवश्यकता है. महाराष्ट्र में इसकी सबसे ज़्यादा आवश्यकता महसूस हो रही है, क्योंकि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है. जब समूचा देश साम्राज्यवाद की अंधी दौड़ में शामिल हो चुका है तो मुंबई का उसका केंद्र बनना स्वाभाविक है.

खैर, बात महाराष्ट्र की करते हैं. थोड़ा इतिहास में जाते हैं. 1959 का वह समय सबको याद होगा जब एबी वर्धन अकेले विदर्भ से वामपंथी खेमे से चुनाव जीते थे. महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों मराठवाड़ा, खानदेश, मध्य, दक्षिण और पश्चिम महाराष्ट्र में वामपंथ और समाजवाद की अच्छी खासी उपस्थिति दर्ज थी. यह वह समय था जब संयुक्त महाराष्ट्र समिति ने चुनाव जीता था. यह समाजवादी राज्य निर्मिति का आंदोलन था. अगर संयुक्त महाराष्ट्र समिति चुनाव जीत जाती तो परिदृश्य कुछ और ही होता. केरल के बाद महाराष्ट्र पहला राज्य होता जहां वामपंथ की सरकार होती. यह हो न सका. विदर्भ ने कांग्रेस का साथ दिया. उस कांग्रेस का साथ दिया जिसने कालांतर में विदर्भ के साथ सबसे अधिक विश्वासघात किया. जब हम आज के संयुक्त महाराष्ट्र में वामपंथ की बात करते हैं तो हम भूल रहे हैं कि इसका इतिहास सन 1960 से पहले का नहीं है. सीपी एंड बेरार से जो आठ ज़िले अलग कर महाराष्ट्र में शामिल किए गए उस समय बापू जी अणे ने कहा था कि महाराष्ट्र को तीन राज्यों में विभक्त कर दिया जाए. विदर्भ, मुंबई और महाराष्ट्र, लेकिन संयुक्त महाराष्ट्र का गठन हो गया. खैर, बात वामपंथ की हो रही है. सीपी एंड बेरार से अलग हुए ज़िलों में भी संयुक्त महाराष्ट्र के लिए वामपंथी और समाजवादी आंदोलन का़फी तीव्र हुए. कई वामपंथी, समाजवादी, विचारक, समाजसेवी नेता हुए जिन्होंने इन आंदोलनों का नेतृत्व किया. यह बात अलग रही कि 1959 के चुनाव में विदर्भ से स़िर्फ ए.बी. वर्धन ही विजयी हो पाए. बापू जी अणे ने महाराष्ट्र के विभाजन की जो वकालत की थी, उसमें सांस्कृतिक, जातिगत विविधता की बात थी. सच भी था. विदर्भ सीपी एंड बेरार से अलग हुआ था. मराठवाड़ा निज़ाम से अलग हुआ था. पश्चिम अलग और मध्य महाराष्ट्र अलग और खानदेश अलग, मुंबई की संस्कृति तो सबसे अलग. इन सभी क्षेत्रों में वामपंथी और समाजवादी आंदोलनों का अच्छा खासा प्रभाव रहा. अगर ये अलग राज्य नहीं बन पाए तो उसका कारण था, उस समय चली भाषाई आधार की लहर. यह आंदोलन किसी राजनेता ने नहीं चलाया था. इसमें समाजवादी, वामपंथी, पत्रकार, बुद्धिजीवी जैसे लोग थे. यह मास मूवमेंट था. माडखोलकर ने संयुक्त महाराष्ट्र का प्रस्ताव बेलगाम में रखा था. दुर्भाग्य की बात है कि वही बेलगाम आज भी महाराष्ट्र में नहीं है. उस समय वामपंथ को समर्थन क्यों मिला? क्योंकि यह परंपरागत सत्ताधारी वर्ग के खिला़फ, श्रमिकों, दलितों, शोषितों का आंदोलन था. यह समाजवादी राज्य की निर्मिति का आंदोलन था. संयुक्त महाराष्ट्र में लगभग 50 साल कामकाजी वर्ग के बीच समाजवादी वामपंथ ही हावी रहा. 1964 में सीपीएम की स्थापना हुई. वैसे ट्रेड यूनियन आंदोलन में आईटीयूसी पहली संगठन है. मुंबई का पोर्ट ट्रस्ट, मिल मज़दूर, कोयला श्रमिकों की आवाज़ उठाने वाला यह पहली यूनियन थी. आज जो लोग आराम से टीए, डीए और अच्छी तनख्वाह पा रहे हैं, उसकी बुनियाद में इन्हीं यूनियन नेताओं का बहा हुआ पसीना है. महाराष्ट्र से वामपंथ के जुड़ाव का एक और बड़ा उदाहरण है 22 जून 1940 में नागपुर में फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना. सवाल यह उठता है कि महाराष्ट्र में इतनी व्यापक पृष्ठभूमि होते हुए भी वामपंथ और यहां तक कि समाजवाद भी पनप क्यों नहीं पाया? आ़खिर क्या कारण था इसके पीछे. अगर संयुक्त महाराष्ट्र के उसी आंदोलन का जज्बा फिर से जगाना हो तो क्या-क्या रास्ते निकल सकते हैं. एकमत से यह विचार तो सामने ज़रूर आया कि वामपंथ और समाजवाद का एकीकरण हुए बिना आज मज़बूत हो चुकी साम्राज्यवादी ताक़तों से लड़ना मुश्किल है. एक ओर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में एक दिन में 100 मर्सिडीज कार की बुकिंग होती है और वहीं से बामुश्किल 80 कि.मी. दूर बच्चे कुपोषण के शिकार होते हैं. आ़खिर इस असमानता को समाप्त करने का क्या कोई विकल्प भारतीय लोकतंत्र में बचा है?

प्रगतिशील लेखक संघ के माध्यम से सामाजिक क्रांति लाने में जुटे विदर्भ साहित्य संघ के डॉ. श्रीपाद भालचंद्र जोशी का कहना है कि मार्क्सवादी सोच का राजनीतिक अनुवाद भारत में नहीं हो पाया. इसका कारण यह था कि वामपंथ की राजनीति में जातिगत व्यवस्था, धर्म के आधार पर व्यवस्था का कोई स्थान नहीं है. वामपंथी आंदोलन धन पर भी आधारित नहीं रहा. यह मज़दूरों, मध्यम वर्ग के लोगों का चेहरा है. महाराष्ट्र संतों की भूमि रही है. संतों ने भी सामाजिक समानता और सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन की बात कही. संत ज्ञानेश्वर ने स्थापित मान्यताओं को बदला. संतों ने समसामयिक सामाजिक चेतना का आंदोलन कर सामाजिक समता के विचार समाज में स्थापित किए. इसी कारण यहां कार्ल मार्क्स को समझने की ज़्यादा ज़रूरत महसूस नहीं हुई. आज भी महाराष्ट्र में शेतकरी कामगार पक्ष अस्तित्व में है. यह कभी वामपंथ का बड़ा हिस्सा हुआ करता था. अब क्लासिकल मार्क्सवाद से ऊपर उठकर साइंटिफिक सोशलिज्म की शिक्षा युवा पीढ़ी को दी जानी चाहिए. आज हावी होती जा रही साम्राज्यवादी राजनीति से निजात पाना ज़रूरी हो गया है. प्रमुख मार्क्सवादी विचारक रघुवीर सिंह खन्ना का मानना है कि सत्ताधारियों ने सदियों पहले से ही हमारी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को छिन्न-भिन्न करने के लिए पंडों को आगे कर दिया था. महाभारत, रामायण और संत परंपरा में कहीं भी सामाजिक विषमता की बात नहीं की गई. पंडों ने अपनी दुकानदारी चलाने के लिए धर्म को तोड़ मरोड़ कर पेश किया. मार्क्स को रशिया या चीन की तरह ही अपनाना भारत के लिए कहां तक उचित है. मार्क्स ने भी कहा था कि देश की संस्कृति के अनुरूप जो प्रासंगिक हो, उसे ही अपनाया जाना चाहिए. भगत सिंह को इतने वर्षों बाद माना गया कि वे वामपंथी थे. हमें अपनी सोच में सुधार करना होगा. वामपंथ में हम कामरेड शब्द का इस्तेमाल करते हैं. इसकी जगह अगर भाई शब्द का इस्तेमाल करें तो क्या फर्क़ पड़ेगा. वैसे भी कामरेड फ्रेंच शब्द है. माओ ने चीन की संस्कृति को लेकर चीन में परिवर्तन की बात कही. हम भी महाराष्ट्र में संत परंपरा को अपना सकते हैं, क्योंकि उन्होंने भी वही किया जो वामपंथ करना चाहता है. लोहिया अध्ययन केंद्र के सचिव और प्रमुख समाजवादी विचारक हरीश अड्यालकर का मानना है कि समाजवाद सीधे लोगों से बात करता है. जयप्रकाश नारायण भी मार्क्सवादी ही थे. जब वह पढ़ाई पूरी कर भारत पहुंचे और महात्मा गांधी के संपर्क में आए तो उन्हें गांधी का मार्ग ज़्यादा उपयुक्त लगा. उन्होंने महसूस किया कि यहां के लोगों का जीवन अलग क़िस्म का है. यहां लोग जातियों, उपजातियों में बंटे हुए हैं. बता दें कि अड्यालकर कई वर्षों से ट्रेड यूनियन आंदोलन भी जुड़े हुए हैं. उनका कहना है कि यहां स़िर्फ मज़दूरों से क्रांति नहीं होगी. सभी पार्टियों को एक करने का काम लोहिया ने किया. अब वामपंथ को समाजवाद से जुड़ना होगा. तभी दो गठबंधन में होते जा रहे राजनीतिक दलों के ध्रुवीकरण का कोई हल निकल पाएगा.

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

देश कौन चला रहा हैः सरकार या तेल कंपनियां


मई माह में यह रिपोर्ट साप्ताहिक चौथी दुनिया की कवर स्टोरी थी. आज फिर हुई पेट्रोल दर वृद्धि ने इसकी याद दिला दी.

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सरकार है, जो जनता के खर्च को बढ़ा रही है और जीवन स्तर को गिरा रही है. वैसे दावा तो यह ठीक विपरीत करती है. वित्त मंत्री कहते हैं कि सरकार अपनी नीतियों के ज़रिए नागरिकों की कॉस्ट ऑफ लिविंग को घटाना और जीवन स्तर को ऊंचा करना चाहती है. पर वह कौन सी मजबूरी है, जिसकी वजह से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ाए जाते हैं. पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी कहते हैं कि वह अर्थशास्त्र और लोकप्रियता के बीच फंस गए. वैसे यह अच्छा बहाना है. वह कहते हैं कि दाम इसलिए बढ़ाए गए हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल का दाम बढ़ गया है. यह एक झूठ है. वह इसलिए, क्योंकि स़िर्फ पेट्रोल को सरकार ने डी-रेगुलेट किया है. मतलब यह कि स़िर्फ पेट्रोल की क़ीमत का रिश्ता अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत से है. मिट्टी तेल, डीजल और रसोई गैस का जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से कुछ लेना-देना नहीं है तो फिर सरकार ने डीजल और रसोई गैस की क़ीमतों में क्यों इज़ा़फा किया? सरकार इस झूठ के साथ-साथ कई और झूठ फैला रही है. एक झूठ यह है कि तेल कंपनियां घाटे में चल रही हैं. मई के महीने में महंगाई की दर 9 फीसदी के आसपास थी. डीजल के दाम बढ़ते ही सारी चीज़ों के दामों में इज़ा़फा हो गया. महंगाई की दर 10 फीसदी से ज़्यादा हो जाए, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है. इस बीच प्रधानमंत्री खुद के चुने हुए पांच अ़खबारों के संपादकों से बातचीत करते हैं. वह उन्हें बताते हैं कि मार्च 2012 तक महंगाई पर नियंत्रण कर लिया जाएगा. प्रधानमंत्री ने साथ में एक शर्त भी रख दी कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत में बढ़ोत्तरी नहीं होती है.

ऐसा लगता है कि तेल कंपनियों को सरकार नहीं चलाती है, तेल कंपनियां ही सरकार को चला रही हैं. अगर ऐसा नहीं है तो क्या वजह है कि जब देश पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है तो ऐसे में तेल की क़ीमत बढ़ा दी जाती है. जबसे मनमोहन सिंह की सरकार बनी, तबसे वह पेट्रोलियम से सरकारी नियंत्रण हटाने की जुगत में लग गई. डीजल और किरोसिन के दाम बढ़ते ही देश में हाहाकार मचा गया, लेकिन एक देश की सरकार है, जो आंकड़े दिखाकर सफलता का ढिंढोरा पीट रही है, ग़रीबों का मज़ाक उड़ा रही है.

पांच राज्यों के चुनाव खत्म हुए और केंद्र की यूपीए सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा दिए. सरकार कहती है कि तेल कंपनियों को घाटा हो रहा है. इसके बाद प्रणव मुखर्जी ने राज्य सरकारों से टैक्स कम करने की अपील क्यों की? कांग्रेस शासित दो राज्यों में दाम कम भी किए गए. पता नहीं, राजनीतिक दलों को यह भ्रम कैसे हो गया है कि देश की जनता मूर्ख है. क्या सरकार ऐसे फरमान जारी करके यह साबित करना चाहती है कि वह जनता के दु:ख-दर्द के प्रति चिंतित है? असलियत तो यह है कि सरकार जनता की समस्याओं को लेकर संवेदनहीन हो चुकी है. उसकी प्राथमिकता केवल निजी कंपनियों और उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाना है.

जब पेट्रोल की क़ीमत बढ़ाई गई, तब सरकार ने देश से सबसे बड़ा झूठ बोला कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ गई है. एक बात समझ में नहीं आई कि जिस दिन पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए, उस दिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 112 डॉलर प्रति गैलन थी. आज इसकी क़ीमत लगभग 90 डॉलर प्रति गैलन है. सरकार अगर यह दलील देती है कि कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने से दाम बढ़ाए गए हैं तो अब जब इसकी क़ीमत में गिरावट आई है तो उसे देश में पेट्रोल की क़ीमत कम करनी चाहिए थी. सवाल यह उठता है कि क्या सरकार तेल उस तरह खरीदती है, जिस तरह घर में सब्ज़ियां खरीदी जाती हैं. क्या भारत हर दिन के हिसाब से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से कच्चा तेल खरीदता है. हम कच्चा तेल खरीदते हैं, उसे देश में लेकर आते हैं, जामनगर जैसी रिफाइनरी में प्रोसेसिंग के बाद उसे ट्रकों में भरा जाता है, चेकिंग वग़ैरह होती है, फिर कहीं उसे पेट्रोल पंपों में भेजा जाता है. कच्चा तेल खरीदने और उसे पेट्रोल पंपों तक पहुंचाने में कम से कम 75 दिनों का व़क्त लगता है. सवाल यह उठता है कि मान लीजिए, तीन दिन पहले कच्चे तेल का दाम बढ़ जाता है तो उसका असर 75 दिनों के बाद दिखना चाहिए. सरकार को इतनी हड़बड़ी क्यों मची है कि वह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में दाम बढ़ते ही देश में क़ीमत बढ़ा देती है, लेकिन जब दाम गिर जाते हैं तो फिर रोलबैक नहीं करती? पेट्रोल की क़ीमत बढ़ाने के साथ-साथ उसे तेल आपूर्ति करने वाली कंपनियों के साथ किए गए क़रार को भी सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि देश की जनता को यह पता चले कि सरकार ने किस रेट पर कच्चा तेल खरीदने का सौदा तय किया है.

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जब कच्चे तेल के दामों में वृद्धि होती है तो सरकार तुरंत पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ा देती है, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दामों में गिरावट आती है तो सरकार उसे देश में लागू क्यों नहीं करती.

समझने वाली बात यह है कि क्या भारत सरकार तेल को घर के सामान की तरह खरीदती है. दुकानदार कहता है कि आज दाम बढ़ गए हैं तो साबुन के दाम दो रुपये ज़्यादा हो गए हैं. जितने भी तेल के सौदे होते हैं, उन्हें फाइनेंस के टर्म में कमोडिटी डेरीवेटिव्स कहते हैं, उसे हम फ्यूचर्स कहते हैं. कहने का मतलब यह है कि जब सौदेबाज़ी होती है, वह किसी सट्टे की तरह होती है. बेचने वाला और खरीदने वाला अनुमान लगाता है. दोनों ही अनुमान लगाते हैं कि अगले सात महीनों में पेट्रोल का दाम क्या होने वाला है. खरीदने वाले की मजबूरी यह है कि उसे पता है कि पूरे मुल्क की ज़रूरत क्या है. भारत के अनुभव से यह साबित हो चुका है कि जब तक कच्चे तेल की क़ीमत 90 डॉलर प्रति गैलन रहे, तब तक भारत की इकोनॉमी पर कुछ भी फर्क़ नहीं पड़ता है. ऐसा इसलिए, क्योंकि जब अमेरिका में गिरावट आई, तब वे 40 डॉलर प्रति गैलन से कच्चे तेल की क़ीमत 90 डॉलर तक लेकर चले गए. यह वायदा कारोबार की वजह से हुआ. वायदा कारोबार करने वालों ने एक गिरोह खड़ा कर लिया. ये लोग असल में तेल नहीं खरीदते, बल्कि काग़ज़ खरीदते हैं और जब वास्तव में तेल लेने का समय आता है तो ये उसे बेच देते हैं. अक्सर होता यह है कि एक निर्धारित समय पर डिमांड अचानक से बढ़ जाती है और तेल के दाम बढ़ जाते हैं. हालत यह हो गई कि जो तेल 40 डॉलर प्रति गैलन बिक रहा था, इस वायदा कारोबार की वजह से उसकी क़ीमत 140 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई. तेल की क़ीमत तब बढ़ती है, जब इसकी खपत बढ़ती है. दो सौ साल तक कच्चे तेल की क़ीमत 40 डॉलर प्रति गैलन से कम रही. सवाल यह उठता है कि पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या हुआ कि इसकी क़ीमत आसमान छूने लगी. कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने का कारण खपत में वृद्धि नहीं है, बल्कि वायदा कारोबार है. जबसे अमेरिका के उद्योगपति वायदा कारोबार में शामिल हुए, पेट्रोलियम का बाज़ार उनके हाथों बंधक बन गया.

अगर सरकार भ्रष्टाचार से लड़ना चाहती है तो सबसे पहले उसे पेट्रोलियम मंत्रालय को दुरुस्त करना होगा. देश में पेट्रोल, केरोसिन और डीजल का कारोबार माफिया चलाते हैं. सरकार को जवाब देना चाहिए कि तेल की चोरी और कालाबाज़ारी के चलते हर साल 70,000 करोड़ रुपये का नुक़सान होता है, उसे खत्म करने के लिए उसने क्या किया है.

चलिए एक हिसाब लगाते हैं कि आ़खिर पेट्रोल की सही क़ीमत क्या हो. जिस समय पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए, उस समय अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 112 डॉलर प्रति बैरल थी यानी 5085 रुपये के क़रीब. एक बैरल में 158.76 लीटर होते हैं. तो इसका मतलब है कच्चे तेल की क़ीमत 32 रुपये प्रति लीटर बनती है. तेल कंपनियों के मुताबिक़, कच्चे तेल को रिफाइन करने में 52 पैसा प्रति लीटर खर्च होता है और अगर रिफाइनरी की कैपिटल कॉस्ट को इसमें जोड़ जाए तो तेल की क़ीमत में क़रीब 6 रुपये और जोड़ने पड़ेंगे. इसके अलावा ट्रांसपोर्ट का खर्च ज़्यादा से ज़्यादा 6 रुपये और डीलरों का कमीशन 1.05 रुपये प्रति लीटर. इन सबको अगर जोड़ दिया जाए तो एक लीटर पेट्रोल की कीमत 45.57 रुपये होती है. लेकिन दिल्ली में 63.4 रुपये, मुंबई में 68.3 रुपये और बंगलुरू में 71 रुपये प्रति लीटर की दर से पेट्रोल बिक रहा है. अब सवाल उठता है कि यह पैसा हम क्यों खर्च कर रहे हैं, यह पैसा कहां जा रहा है? इसका जवाब है कि हम टैक्स में दे रहे हैं. यह बहुत ही कम लोगों को पता है कि केंद्र और राज्य सरकार पेट्रोल से कितना टैक्स वसूलती है. कुछ राज्यों में तो 50 फीसदी से ज़्यादा टैक्स लिया जा रहा है. और तो और, यह टैक्स तेल के बेसिक दाम पर लगता है. इसका मतलब यह है कि तेल के दाम बढ़ाने से सरकार को फायदा होता है. फिर सरकार यह घड़ियाली आंसू क्यों बहा रही है कि तेल कंपनियों को नुक़सान हो रहा है. इस टैक्स को तर्कसंगत करने की ज़रूरत है. इससे सरकारी कंपनियों को फायदा होगा, वरना यही समझा जाएगा कि सरकार निजी कंपनियों को लूट मचाने की खुली छूट दे रही है. सवाल तो यह उठता है कि क्या आज तक मुकेश अंबानी या दूसरी अन्य तेल कंपनियों ने यह कहा कि उन्हें घाटा हो रहा है, तेल कंपनियों को घाटे की वजह से बंद करना पड़ सकता है. हक़ीक़त यह है कि निजी कंपनियां ज़्यादातर माल विदेशी बाज़ार में बेचकर मुना़फा कमा रही हैं. आज अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की जो क़ीमत है, उसके मुताबिक़ पेट्रोल का दाम 35 रुपये प्रति लीटर से एक भी पैसा ज़्यादा नहीं होना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत मई 2011 में 112 डॉलर प्रति गैलन थी, जो अब घटकर 90 डॉलर के आसपास हो गई है. आने वाले दिनों में इसकी क़ीमत में और भी गिरावट होने की संभावना है. फिर भी देश में पेट्रोल की क़ीमत गिरने वाली नहीं है. पेट्रोल की क़ीमत में गिरावट तो दूर, तेल कंपनियों के दबाव में सरकार डीजल, केरोसिन और रसोई गैस की क़ीमत भी बढ़ाने को मजबूर हो गई. इसके बाद अगर कोई यह आरोप लगाए कि भारत की सरकार तेल कंपनियों के हाथों की कठपुतली बन गई है तो इसका क्या जवाब होगा. इसके बावजूद बड़ी निर्लज्जता से यह दलील भी जाती है कि तेल कंपनियों को ऩुकसान हो रहा है, ताकि कोई सरकार के फैसले पर सवाल न खड़ा कर सके. तो क्या सरकार ने तेल कंपनियों को हुआ घाटा पूरा करने के लिए पेट्रोल का दाम बढ़ा दिया?

सवाल स़िर्फ क़ीमत बढ़ाने के फैसले का नहीं है. अगर केंद्र सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के बारे में सोचती है तो सबसे पहले उसे पेट्रोलियम मंत्रालय को दुरुस्त करना होगा. देश में पेट्रोल, केरोसिन और डीजल का कारोबार माफिया चलाते हैं. सरकार को इस बात का जवाब देना चाहिए कि तेल की चोरी और कालाबाज़ारी की वजह से हर साल 70,000 करोड़ रुपये का नुक़सान होता है, उसे खत्म करने के लिए उसने क्या किया है. यह सवाल इसलिए उठाना ज़रूरी है, क्योंकि कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र में तेल माफिया ने एक एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को ज़िंदा जला दिया था. तेल की सप्लाई से लेकर पेट्रोल पंप के आवंटन तक की जो पूरी प्रक्रिया है, उसमें पारदर्शिता लाने के लिए सरकार ने क्या किया है. क्या तेल माफिया इसलिए बेलगाम हैं, क्योंकि उन्हें नेताओं का संरक्षण हासिल है. या यूं कहें कि सरकार इसलिए खामोश है, क्योंकि तेल के कारोबार पर देश के राजनीतिक नेताओं का कंट्रोल है. तेल की क़ीमत बढ़ाने से पहले सरकार को इस सेक्टर में मौजूद कालाबाज़ारी को खत्म करने की पहल करनी चाहिए.

पेट्रोल और डीजल का महंगाई से गहरा रिश्ता है. इनके दाम बढ़ते ही ट्रांसपोर्टेशन कास्ट बढ़ जाती है, जिससे सारी चीज़ें महंगी हो जाती हैं. जब देश में पेट्रोलियम का उदारीकरण हुआ तो उस व़क्त देश पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा था. ऐसे समय में उदारीकरण करना सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाता है, अर्थशास्त्र के सारे तर्क भी झुठला देता है. जबसे कच्चा तेल वायदा कारोबारियों की गिरफ्त में आया, तबसे इसकी क़ीमत में भूचाल आ गया, इसकी क़ीमत में कभी स्थिरता नहीं आई. यह अपने आप में एक वजह है कि पेट्रोलियम के उदारीकरण को लागू न किया जाए. लेकिन सरकार पर तेल कंपनियों का, खासकर निजी कंपनियों का दबाव था. सरकार ने नया तरीक़ा निकाला, उसने रंगराजन कमेटी बना दी. इस कमेटी से सरकार को उम्मीद थी कि यह पेट्रोलियम की क़ीमतों और करों के उदारीकरण का सुझाव देगी, लेकिन रंगराजन कमेटी ने उदारीकरण की सलाह नहीं दी. सरकार ने दूसरी कमेटी बना दी. इस बार योजना आयोग के पूर्व सदस्य किरीट पारिख को एक्सपर्ट ग्रुप का प्रमुख बनाया गया. इस बार उदारीकरण का सुझाव दिया गया. सरकार ने तुरंत इस सुझाव को मान लिया. सरकार की तऱफ से दलील दी गई कि तेल कंपनियों को नुक़सान हो रहा है, इसलिए पेट्रोल के दाम को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से जोड़ना ज़रूरी हो गया है. अब सवाल यह है कि सरकार ने ऐसा क्यों किया. सबसे सीधा जवाब तो यही है कि सरकार ने जनता को राहत देने के बजाय निजी तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाना उचित समझा. खासकर उन निजी तेल कंपनियों को, जिन्हें पेट्रोलियम सेक्टर में घुसने और विस्तार करने का हर मौक़ा दिया गया. सरकार की क्या मजबूरी है कि तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाना उसने अपना परम कर्तव्य मान लिया है?

देश की सरकार वर्ल्ड बैंक के इशारे पर काम करने में कोई गुरेज़ नहीं करती, लेकिन उसकी ग़रीबी रेखा की परिभाषा को नहीं मानती. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक़, जिस आदमी की रोजाना आमदनी एक डॉलर से कम है, उसे ग़रीबी रेखा के नीचे माना जाए. एक डॉलर का मतलब 42 रुपये के लगभग की आमदनी. इस परिभाषा के मुताबिक़ भारत के 75 फीसदी लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं, जिनका ज़्यादातर पैसा ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी भोजन पर खर्च होता है. भारत सरकार तो अर्थशास्त्रियों की सरकार है. ग़रीब जनता पर जब महंगाई की मार पड़ती है तो वह क्या करे, कैसे ज़िंदा रहे? दाम बढ़ाने से पहले सरकार को भारत के इन 75 फीसदी लोगों की परेशानी नज़र नहीं आई. भारत में महंगाई दर 9.06 फीसदी है, जो अमेरिका की तुलना में दोगुनी है और जर्मनी से चार गुनी. इसी महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़कर रख दी है, वह केवल किसी तरह अपनी ज़िंदगी जीने को मजबूर है. डीजल और केरोसिन के दाम बढ़ते ही देश की ग़रीब जनता में हाहाकार मच जाता है. क्या सरकार को यह पता नहीं है कि देश के 75 फीसदी लोगों का 80 फीसदी खर्च स़िर्फ खाने-पीने पर होता है. सरकार ने तेल की क़ीमत बढ़ाकर जनता को महंगाई की मार झेलने के लिए बेसहारा छोड़ दिया है. सरकार अगर महंगाई से लड़ना चाहती है तो हर सरकारी विभाग को एक समग्र योजना पर काम करना होगा. सबसे पहले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना होगा. तेल के उत्पादन और वितरण में पारदर्शिता लाने की ज़रूरत है. समस्या यह है कि सरकार भ्रष्टाचार, राजनीति और उद्योग के भंवर में फंस गई है. अपनी ग़लतियों की वजह से वह इस तरह फंसी है, जैसे कोई मकड़ी अपने ही जाल में फंस जाती है. वह जितना हाथ-पैर चलाती है, मुश्किल उतनी ही बढ़ जाती है.

सरकार पर रिलायंस को फायदा पहुंचाने का आरोप

आजकल सरकार बेचैन है. रिलायंस इंडस्ट्रीज को फायदा पहुंचाने का आरोप लग रहा है. आरोप बेबुनियाद नहीं है. आरोप का आधार सीएजी रिपोर्ट है. वैसे यह आधिकारिक रूप से संसद के सामने पेश नहीं हुई है, इसकी खबर मीडिया में लीक हो गई है. सरकार पर आरोप यह है कि उसने जान-बूझकर रिलायंस कंपनी को फायदा पहुंचाया और इससे देश को बहुत बड़ा आर्थिक नुक़सान हुआ. यह नुकसान 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से भी बड़ा है. रिलायंस कंपनी पर सरकार ने दरियादिली का इज़हार कुछ ऐसे किया कि कृष्णा-गोदावरी बेसिन के गैस की क़ीमत तय करने के लिए सचिवों का एक समूह बना. पिछले कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर इसके अध्यक्ष बनाए गए. आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की तीन चिट्ठियों को आधार बनाया गया था. रेड्डी का सुझाव था कि सरकारी कंपनी एनटीपीसी से रिलायंस को 2.97 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू गैस मिलती थी. यह दर वैश्विक प्रतिस्पर्धा के ज़रिए तय की गई थी, सो इसे ही बाज़ार दर माना जाए. इस समूह ने यह भी कहा कि गैस की क़ीमत अगर एक डॉलर भी बढ़ती है तो रासायनिक खाद सेक्टर का खर्च बढ़ेगा, जिससे सरकार पर कई हज़ार करोड़ रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी का बोझ आएगा. पर मंत्री समूह ने इन सारी दलीलों को खारिज कर गैस की क़ीमत 4.2 डॉलर तय की. इस तरह रिलायंस को फायदा पहुंचाया गया. सरकार को कितना नुक़सान हुआ, इसका आकलन करने में सीएजी ने हाथ खड़े कर दिए हैं. सीएजी का कहना है कि नुक़सान का आंकड़ा इतना बड़ा होगा कि उसका हिसाब लगाना मुश्किल है. ज़ाहिर है, संसद के अगले सत्र में संचार के साथ-साथ पेट्रोलियम घोटाला भी एक बड़ा मुद्दा बनेगा. अगर यह मुद्दा नहीं बना तो आप स्वयं ही समझ लीजिए कि सरकार के साथ-साथ देश के दूसरे राजनीतिक दलों को कौन चला रहा है.

राष्ट्रीय साप्ताहिक चौथी दुनिया से साभार. आलेखः श्री मनीष कुमार, संपादक (कोआर्डिनेशन)